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बच्चे, जवान, अधेड़ सबकी ‘मम्मी’ हैं अंजना राजगोपाल

by ब्लिट्ज़ इंडिया
April 19, 2024
in महिला, महिला-खेल
0
Anjana Rajagopal is everyone's 'mother', children, young and middle-aged.
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। गोल चेहरा, करुणा से भरी आंखें, सफेद बाल, माथे पर बड़ी सी बिंदी, क्रीम कलर की सूती साड़ी पहने महिला। पैरों में चप्पल नहीं हैं, खाली पांव ही ‘बाल कुटीर’ में टहल रही हैं। एक ओर पाठशाला लगी है जहां तीन टीचर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। कुछ छोटे बच्चे जिनके पढ़ने की उम्र नहीं है वो धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। मम्मी-मम्मी कहते उस महिला के आंचल से लिपट जा रहे हैं। मम्मी बड़े दुलार, नेह से बच्चों को बांहों में भर ले रही हैं। नोएडा में बाल कुटीर में क्या बच्चे, क्या जवान और क्या अधेड़ सब उन्हें मम्मी ही बुला रहे हैं। ये मम्मी हैं अंजना राजगोपाल।

केरल के कोझिकोड की रहने वाली हैं अंजना राजगोपाल। हालांकि वह पली-बढ़ीं कर्नाटक के बेलारी में। अंजना के 6 भाई-बहन हैं। 3 बहनें और 3 भाई। सभी भाई उनसे छोटे हैं। उनका परिवार बेलारी से दिल्ली शिफ्ट कर गया। दो बहनों की शादी हो चुकी थी। मम्मी की तबीयत खराब रहती, ऐसे में अंजना ने नौकरी करने का फैसला लिया। एक अखबार के स्टोर डिपार्टमेंट में काम शुरू किया। एक बार ऑफिस जाते समय प्यारेलाल भवन के सामने 10 साल के एक दिव्यांग बच्चे को देखा, जिसे एक व्यक्ति पीट रहा था। तब अंजना को बहुत खराब लगा। उन्होंने विरोध किया कि आप इसे क्यों मार रहे? पता चला उस बच्चे का कोई नहीं था। वह उसे अपने घर ले आईं। तब किराये के घर में रहती, उस बच्चे को अपने पास रखकर उसे पढ़ाया, लिखाया। उसका नाम रजत है जो अब 45 साल का हो गया है। आज भी साथ ही रहता है।

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परिवार शिरडी साईं बाबा का भक्त, इसलिए साईं कृपा संस्था बनाई
मांबाप के गुजरने के बाद उन्होंने साईं कृपा संस्था में बच्चों को रखना शुरू किया। पहले दो दिव्यांग बच्चे आए, फिर संख्या बढ़ने लगी। अपनी सैलरी से बच्चों की देखभाल करती। लेकिन बच्चे ज्यादा आने लगे तो ‘क्राई’ संस्था ने मदद की। बच्चों के प्रति लगन को देखकर प्रदान संस्था ने दिल्ली, बॉम्बे, बेंगलुरु, पुणे के लोनावला भेजा ताकि बच्चों की स्थिति को समझ पाऊं। शुरू में बच्चों को संभालने में मुश्किलें होतीं। कई बच्चे एग्रेसिव नेचर के होते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं। लेकिन एक दो सप्ताह में वो नॉर्मल हो जाते हैं। अनाथ बच्चों की देखभाल में पूरा समय नहीं निकाल पा रही थी इसलिए अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी। जब घर-परिवार और दोस्तों को पता लगा तो उन्होंने मुझे कहा कि नौकरी छोड़ तुम अनाथ बच्चों के लिए ये सब क्या कर रही हो? क्या तुम पागल हो गई हो, एक दिन मुसीबत में फंसोगी।

लोग खिड़कियां, दरवाजे बंद कर लेते
मैंने दृढ़ संकल्प लिया कि मैं इनके लिए काम करूंगी। जब बच्चों के लिए चंदा मांगने जाती, लोग खिड़कियां, दरवाजे बंद कर लेते। लोग बोलते कि अच्छा काम कर रही हो लेकिन डोनेशन देने के नाम पर पीछे हट जाते।

चैरिटी शोज करती, एक फाउंडेशन ने बच्चों के लिए घर खरीद कर दिया
बच्चों की देखभाल डोनेशन पर ही निर्भर होती। तब आज की तरह ऑनलाइन सिस्टम नहीं था। कंपनियों और दूसरी संस्थाओं के पास जाना होता। उन्हें अपने काम के बारे में बताती। चैरिटी शोज करती और फंड जुटातीं। आज तो क्राउड फंडिंग का ट्रेंड है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में शोज करके फंड इकट्ठा किया। इससे संस्था का काम बढ़ता गया। तब एक फाउंडेशन के लोग बच्चों को मैथ्स और साइंस पढ़ाते। उन्होंने एक पूरी बिल्डिंग खरीद कर दी। 35 सालों में सरकार से कोई मदद नहीं मिली। पब्लिक ने ही हमेशा सपोर्ट किया। बाल कुटीर में पले-बढ़े कई बच्चे आज बड़े होकर नौकरी कर रहे हैं।
बाल कुटीर में अब तक 3,000 से अधिक बच्चों को शेल्टर मिला। नवजात से लेकर 10-12 साल के बच्चे तक आते। पहले जब अस्पताल में कोई बच्चा छोड़ जाता तो वो मेरे सेंटर पर पहुंचा दिया जाता। डॉक्टर ही ऐसे बच्चे को दे जाते हैं। ऐसे नवजात बच्चों की भी देखभाल करती। बच्चों को दूध पिलाना, उन्हें नहाना-धुलाना, ए बी सी से लेकर ककहरा तक सब सिखाना सेंटर पर होता हैं। बच्चों की फैमिली खोजने की कोशिश की जाती है। जब कोई नहीं मिलता है तब उन्हें रखते हैं। बड़े होने पर बच्चों को अच्छे स्कूलों में दाखिला कराया जाता है। कई स्कूल यहां के बच्चों को लेने से मना करते थे। तब नांग्ला वाजिदपुर में श्री साईं शिक्षा संस्थान नाम से स्कूल की शुरूआत की जहां गांवों के गरीब बच्चे भी पढ़ते हैं।

– 3,000 बच्चों को पाला, उन्हें काबिल बनाया
– 25,000 से अधिक महिलाओं को सिखाई सिलाई-कढ़ाई

नोएडा में ही श्री साईं बाल संसार स्कूल खोला जहां भीख मांगने वाले बच्चों को पढ़ाया जाता। इस स्कूल की एक शाखा साईं वात्सल्य वाटिका भी खोली जो स्पेशल चाइल्ड के लिए है। 2010 में साईं वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर की शुरुआत की जहां आज कंप्यूटर, इंग्लिश स्पोकन, सिलाई कढ़ाई, जूट के थैले बनाना, बेकरी, ब्यूटीशियन का काम सिखाया जाता है। अब तक 25,000 से अधिक महिलाओं को सेंटर से सिलाई-कढ़ाई का काम सिखाया गया है।

अनाथ बच्चे पढ़-लिखकर नौकरी कर रहे
इन अनाथ बच्चों ने अपनी प्रतिभा के दम पर न केवल डिग्री ली बल्कि आज वो नौकरी में भी हैं। बीबीए, फैशन डिजाइनिंग, मास कॉम जैसे प्रोफेशनल कोर्सों में उन्होंने पढ़ाई की। यहां की एक बच्ची राधिका ने यूके के बेलफास्ट यूनिवर्सिटी से उच्च अंकों के साथ मास्टर्स किया है। ये बच्चे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े हैं।

शादी के लिए रिश्ते आते, मैं मना कर देती
मैं अपने काम में रमते जा रही थी। अनाथ बच्चे ही मेरी दुनिया बन गए। लेकिन घर-परिवार मुझ पर शादी करने के लिए प्रेशर डालता। सभी बहनों की शादी हो गई। मेरे लिए रिश्तेदार रिश्ता लेकर आते। मेरे सब भाई छोटे थे इसलिए तब कोई जोर नहीं डाल पाया। मैं रिश्तेदारों को मना कर देती। आज मेरी उम्र 70 वर्ष के करीब हो गई है।

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