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कोर्ट का ‘सुप्रीम’ फैसला, वकील नहीं आते उपभोक्ता कानून के दायरे में

17 साल पुराना कंज्यूमर फोरम का फैसला पलटा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 17, 2024
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। क्या वकीलों द्वारा दी जाने वाली सेवाएं उपभोक्ता अधिनियम के दायरे में आती हैं? क्या किसी वकील पर इसलिए उपभोक्ता अधिनियम के तहत एक्शन हो सकता है कि उसने अपने क्लाइंट का पक्ष ठीक से कोर्ट के सामने नहीं रखा। इन तमाम सवालों पर विराम लगा कर सुप्रीम कोर्ट ने 17 साल पुराने कंज्यूमर कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा, ‘वकीलों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत आने वाली सेवा की परिभाषा से बाहर रखा जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि वकीलों का पेशा अनूठा है। सेवाओं में कमी के लिए वकीलों को नहीं माना जा सकता जिम्मेदार। कंज्यूमर कोर्ट ने तब एक मामले में वकील को जिम्मेदार ठहराते हुए अपना फैसला सुनाया था।

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ऐसे तो मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि सभी पेशेवरों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को भी इसके दायरे में लाया जाता है तो अधिनियम के तहत स्थापित आयोगों में मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि उपभोक्ता अधिनियम के तहत प्रदान किया गया उपाय सस्ता और कम समय वाला है। यह देखते हुए कि कानूनी पेशे की तुलना किसी अन्य पारंपरिक पेशे से नहीं की जा सकती, बेंच ने कहा कि इसका नेचर कमर्शियल नहीं है बल्कि वकालत सेवा से संबंधित नोबल प्रोफेशन है।

– सेवाओं में कमी के लिए वकीलों को नहीं माना जा सकता जिम्मेदार

जस्टिस डिलीवरी सिस्टम में वकीलों की भूमिका अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जस्टिस डिलीवरी सिस्टम में वकीलों की भूमिका अनिवार्य है। हमारे संविधान को जीवंत बनाए रखने के लिए न्यायशास्त्र का विकास केवल वकीलों के सकारात्मक योगदान से ही संभव है। वकीलों से उम्मीद की जाती है कि वे न्याय की रक्षा के लिए निडर और स्वतंत्र हों। नागरिकों के अधिकार, कानून के शासन को कायम रखने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भी वकीलों की भूमिका अहम है।

कंज्यूमर कोर्ट ने क्या कहा था?
यह आदेश बार और अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें कंज्यूमर कोर्ट (एनसीडीआरसी) के 2007 के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने अपील की अनुमति भी दे दी है। उस समय यह फैसला सुनाया गया था कि वकील और उनकी सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के दायरे में आती हैं। राष्ट्रीय कंज्यूमर कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि वकीलों द्वारा प्रदान की जाने वाली कानूनी सेवाएं 1986 अधिनियम की धारा 2(1)(ओ) के दायरे में आएंगी।

अधिनियम की धारा 2(1)(ओ) “सेवा” शब्द को परिभाषित करती है, जिसका अर्थ है किसी भी विवरण की सेवा, जो संभावित उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराई जाती है और इसमें शामिल है।

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