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एआई बताएगी खांसी की आवाज से फेफड़ों की बीमारी का पता

खर्चा कम, समय रहते इलाज करवा सकेंगे मरीज

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 30, 2024
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AI will tell about lung disease by the sound of cough
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। अब एक नई एआई तकनीक से खांसी की आवाज सुनकर फेफड़ों की बीमारी का पता लगाया जा सकेगा। यह तकनीक खांसी की आवाजों का विश्लेषण करके यह पहचान सकती है कि किसी व्यक्ति को फेफड़ों की बीमारी है या नहीं।

इससे बीमारी का जल्दी पता चल सकेगा और मरीज समय रहते इलाज करवा सकेंगे। यह तकनीक खासकर उन लोगों के लिए बहुत मददगार होगी जो सही समय पर डॉक्टर के पास नहीं जा पाते।

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गूगल ने की विकसित
गूगल ने एक नई तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का नाम एचईएआर (हेल्थ अकाउस्टिक रिप्रेजेंटेशन्स) है। इसका एआई मॉडल खांसी की आवाजों का विश्लेषण कर यह पहचान सकता है कि किसी व्यक्ति को टीबी या क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी गंभीर बीमारी है या नहीं। यह तकनीक उन जगहों पर बहुत उपयोगी साबित हो सकती है जहां लोगों को समय पर डॉक्टर या इलाज नहीं मिल पाता।

एचईएआर मॉडल की खासियत
इसे 300 मिलियन से भी ज्यादा ऑडियो क्लिप्स और करीब 100 मिलियन खांसी की आवाजों से प्रशिक्षित किया गया है। इसके कारण, यह मॉडल खांसी की आवाज से फेफड़ों की बीमारी का पता लगाने में सक्षम है। इस तकनीक का इस्तेमाल डॉक्टर और शोधकर्ता जल्दी और आसानी से बीमारी का पता लगाने के लिए कर सकते हैं।

भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी
गूगल ने अपनी इस तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए भारत की एक स्वास्थ्य सेवा कंपनी साल्सिट टेक्नॉलॉजीज के साथ साझेदारी की है। इस कंपनी ने स्वासा नाम का एक टूल बनाया है, जो खांसी की आवाज सुनकर फेफड़ों की सेहत का आकलन करता है। अब इस टूल में एचईएआर तकनीक को जोड़ा जा रहा है, जिससे टीबी जैसी बीमारियों का शुरुआती चरण में ही पता चल सकेगा।

टीबी से लड़ाई में मदद
टीबी एक गंभीर बीमारी है, जिसे सही समय पर इलाज से ठीक किया जा सकता है लेकिन कई देशों में, जहां सस्ती और आसान स्वास्थ्य सेवाएं हर किसी को नहीं मिल पातीं, वहां टीबी का समय पर पता लगाना मुश्किल होता है।

स्वासा और एचईएआर
जैसी तकनीकें इस समस्या को हल करने में मदद कर सकती हैं। ये उपकरण कम लागत में और जल्दी बीमारी का पता लगा सकते हैं, जिससे मरीज का समय पर इलाज शुरू हो सकेगा।

जरूरी बातें
एचईएआर जैसी एआई तकनीक न केवल फेफड़ों की बीमारियों का जल्दी पता लगाने में मददगार है, बल्कि यह तकनीक सस्ती और आसान स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा भी बन सकती है। इस पहल से भारत और अन्य देशों में लाखों लोगों की जान बचाई जा सकेगी और उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।

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