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ऐसा सूरज जो कभी डूबेगा नहीं!!!

by Blitzindiamedia
February 24, 2025
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A sun that will never set!!!
डा. सीमा द्विवेदी

नई दिल्ली। अभी पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के दौरे पर थे। वहां पीएम मोदी ने दुनिया के सबसे महंगे वैज्ञानिक प्रयोग ‘इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आईटीईआर)’ का दौरा किया। इस दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी उनके साथ थे। आईटीईआर दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक है जिसके तहत ‘मिनी सन’ यानी धरती पर ‘छोटा सूरज’ बनाया जा रहा है जो असीमित मात्रा में बिजली पैदा करेगा।

यह प्रोजेक्ट कई देशों के सहयोग से मिलकर बन रहा है जिसमें भारत अहम योगदान दे रहा है। सूरज में जिस प्रक्रिया से ऊर्जा उत्पन्न होती है, प्रोजेक्ट का मकसद उसी प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न करना है।

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आईटीईआर प्रोजेक्ट के तहत दुनिया का सबसे बड़ा टोकामक भी बनाया जा रहा है। टोकामक डोनट के आकार की डिवाइस होती है जो चुंबकीय क्षेत्रों का इस्तेमाल कर न्यूक्लियर फ्यूजन रिसर्च के लिए प्लाज्मा की संख्या को सीमित करती है। इस प्रोजेक्ट के तहत बनाए जा रहे पावर प्लांट से 500 मेगावाट न्यूक्लियर एनर्जी का उत्पादन किया जाएगा।

क्या है आईटीईआर प्रोजेक्ट?
2006 में फ्रांस के राष्ट्रपति भवन एलिसी पैलेस में सात देश आईटीईआर प्रोजेक्ट पर साथ काम करने को राजी हुए थे। ये देश थे- अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, रूस, चीन, भारत और दक्षिण कोरिया। आज इस प्रोजेक्ट में 30 देश अपना योगदान दे रहे हैं।

इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य है न्यूक्लियर फ्यूजन यानी परमाणु संलयन में महारथ हासिल करना। न्यूक्लियर फ्यूजन सूर्य और बाकी तारों में होने वाली एक प्रक्रिया है जिससे उनमें गर्मी पैदा होती है लेकिन पृथ्वी पर न्यूक्लियर फ्यूजन की नकल कर एक छोटा सूरज बना लेना बेहद मुश्किल काम है। अगर ऐसा कर लिया जाए तो असीमित मात्रा में ऊर्जा मिल सकती है और इसमें जीवाश्म ईंन्धन की तरह ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी नहीं होगा।

पावर प्लांट हर समय रहेगा चालू
आधुनिक समय में दुनिया में जो न्यूक्लियर एनर्जी इस्तेमाल की जाती है, वह परमाणु विखंडन यानी न्यूक्लियर फ्यूजन पर आधारित है। इस प्रक्रिया में रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है जो लंबे समय तक पर्यावरण में रहता है पर न्यूक्लियर फ्यूजन में किसी तरह का कचरा नहीं निकलता है। आईटीईआर प्रोजेक्ट का सात सालों तक नेतृत्व करने वाले फ्रांस के बर्नार्ड बिगोट ने इस प्रोजेक्ट को लेकर कहा था, ‘हम यहां जो करने की कोशिश कर रहे हैं वह वास्तव में पृथ्वी पर एक छोटा सा कृत्रिम सूरज बनाने जैसा है। यह पावर प्लांट हमेशा चालू रहेगा। यह सूरज कभी नहीं डूबेगा।’

ऐसे काम करेगा धरती का ‘सूरज’?
धरती का सूरज यानी आईटीईआर प्रोजेक्ट सूरज के न्यूक्लियर फ्यूजन पर आधारित है। इस रिएक्टर में एक छोटा सूरज बनाया जा रहा है जिसमें ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए दो हाइड्रोजन परमाणुओं को अधिक वेग से एक साथ धकेला जाता है, इससे दोनों जुड़कर हीलियम परमाणु बनाते हैं।

इस दौरान न्यूट्रॉन भी बनता है जिससे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है। प्रोजेक्ट के विशेषज्ञों का मानना है कि फ्यूजन एनर्जी पैदा करना अपने आप में कोई मुश्किल काम नहीं है बल्कि इसे बनाए रखना मुश्किल काम है। इसी चीज को हासिल करने के लिए वैज्ञानिक और टेक्निकल एक्सपर्ट दशकों से मेहनत कर रहे हैं।

कितना बड़ा है आईटीईआर प्रोजेक्ट?
आईटीईआर प्रोजेक्ट काफी विशाल है जिसके बारे में जानकर हैरानी होगी। प्रोजेक्ट का आकार इतना बड़ा है जिसमें 39 बड़ी इमारतें बन जाएं। साइट पर मौजूद वैज्ञानिकों का कहना है कि न्यूक्लियर फ्यूजन के लिए प्रयोग की जाने वाली डिवाइस टोकामक का वजन 23,000 टन है।

यह वजन तीन एफिल टावर के संयुक्त वजन के बराबर है। इस रिएक्टर में दस लाख घटक शामिल हैं जो कम से कम एक करोड़ छोटे भागों में बंटे हुए हैं। रिएक्टर में लगभग 4,500 कंपनियों से जुड़े सैकड़ों वैज्ञानिक और कर्मचारी दिन-रात काम कर रहे हैं।

कितना हो रहा खर्च?
इस मेगा प्रोजेक्ट में पानी की तरह पैसा खर्च हो रहा है। शुरु में प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 5 अरब डॉलर थी लेकिन समय के साथ यह बढ़कर 22 अरब डॉलर हो गई है। अमेरिका के ऊर्जा विभाग का अनुमान है कि प्रोजेक्ट की कीमत 65 अरब डॉलर तक हो सकती है। इस खर्च को देखते हुए इस प्रोजेक्ट को दुनिया का सबसे महंगा वैज्ञानिक प्रयोग कहा जा रहा है।

माना जा रहा था कि प्रोजेक्ट 2020 में पूरा हो जाएगा लेकिन अभी तक यह पूरा नहीं हो पाया है। जुलाई 2024 में रिएक्टर पूरी तरह से असेंबल हो पाया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि 2039 तक यह प्रोजेक्ट काम करना शुरू कर देगा।

भारत का कितना योगदान?
भारत 2005 से ही आईटीईआर प्रोजेक्ट का हिस्सा रहा है और इसमें भारत की 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए 17,500 करोड़ रुपए देने का वादा किया है जो कि लागत का लगभग 10 प्रतिशत है। यूरोपीय संघ प्रोजेक्ट की लागत का 45 प्रतिशत खर्च उठा रहा है। भारत की तरफ से 25 से 30 वैज्ञानिक भी रिएक्टर के लिए हो रहे प्रयोग में योगदान दे रहे हैं।

इसके अलावा, भारत ने रिएक्टर में एक और अहम योगदान किया है और वो है रिएक्टर को ठंडा करने के लिए क्रायोस्टेट फ्रीजर। रिएक्टर को ठंडा रखने में इस्तेमाल हो रहा क्रायोस्टेट गुजरात की लार्सेन एंड टुब्रो कंपनी ने बनाया है।

माना जाता है कि यह क्रायोस्टेट दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा फ्रीजर है। यह टोकामक के अंदर सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट और वैक्यूम वेसल के बाहर लगाया जाएगा। यह रिएक्टर को 193 डिग्री सेल्सियस तक की ठंडक देगा। क्रायोस्टेट 54 यूनिट्स से मिलकर बना है जिसे 2020 में फ्रांस भेजा गया था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस क्रायोस्टेट का वजन 3,800 टन है और इसकी ऊंचाई कुतुब मीनार से आधी है।

भारत इस प्रोजेक्ट में भले ही 10 फीसद का सहयोग कर रहा है लेकिन उसे न्यूक्लियर फ्यूजन टेक्नोलॉजी में 100 फीसद तक एक्सेस मिलेगी।

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