ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के अब तक 12 पदक हो चुके हैं — दो स्वर्ण, सात रजत और तीन कांस्य। 122 भारतीय खिलाड़ी अब भी एथलेटिक्स, भारोत्तोलन, मुक्केबाज़ी और तैराकी में मैदान में हैं। पदक तालिका देखकर सबसे पहले खिलाड़ियों के नाम याद आते हैं — मीराबाई चानू का लगातार तीसरा राष्ट्रमंडल स्वर्ण, ऋषिकांत सिंह का पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में रजत, वह भी स्नैच में खेलों का नया रिकॉर्ड बनाकर। यह पढ़ना ग़लत नहीं है, लेकिन अधूरा है। पिछले आठ साल में भारतीय खेल में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वह प्रतिभा का नहीं है। बेहतरीन खिलाड़ी भारत में हमेशा रहे हैं। बदलाव यह है कि अब उनके पीछे एक पूरी व्यवस्था खड़ी हो चुकी है।
इस व्यवस्था के आंकड़े एक जगह रखकर देखिए तो तस्वीर साफ़ हो जाती है। खेलो इंडिया योजना के तहत अब तक 349 खेल ढांचा परियोजनाएं मंज़ूर हुई हैं, जिन पर कुल 3,176 करोड़ रुपये लगाए जा रहे हैं। ज़मीनी स्तर पर प्रशिक्षण देने वाले 1,067 खेलो इंडिया केंद्र चल रहे हैं और अलग-अलग खेलों में 267 अकादमियों को मदद दी जा रही है। सबसे ऊपर के स्तर पर 2,745 खेलो इंडिया एथलीटों को कोचिंग, उपकरण, चिकित्सा सुविधा और हर महीने जेबख़र्च भत्ता मिलता है। प्रतिभा खोजने की व्यवस्था, जो हमेशा भारतीय खेल की सबसे कमज़ोर कड़ी रही, अब 174 टैलेंट असेसमेंट सेंटरों से चलती है, जहां 1,87,921 आकलन पूरे हो चुके हैं। खेल मंत्रालय को अब तक का सबसे बड़ा बजट मिला है — 4,479.88 करोड़ रुपये। लक्ष्य भी साफ़ रखा गया है: 2036 तक दुनिया के शीर्ष दस खेल देशों में और 2047 तक शीर्ष पांच में।
भारोत्तोलन अब भरोसे का खेल है: मीराबाई चानू का तीसरा राष्ट्रमंडल ख़िताब और ऋषिकांत सिंह का रिकॉर्ड स्नैच एक ऐसे कार्यक्रम से निकले हैं जिसमें अब कई भार वर्गों में खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं, सिर्फ़ एक बड़ा नाम नहीं।
पदक एक घटना है, पाइपलाइन एक व्यवस्था। भारत ने बीते दस साल चुपचाप दूसरी चीज़ बनाने में लगाए, ताकि पहली चीज़ हैरानी न रह जाए।
एक नज़र में
• ग्लासगो में भारत: 29 जुलाई तक 12 पदक — 2 स्वर्ण, 7 रजत, 3 कांस्य
• दल: 122 खिलाड़ी; खेल 23 जुलाई से 2 अगस्त तक
• खेल ढांचा: 349 परियोजनाएं मंज़ूर, 3,176 करोड़ रुपये का निवेश
• ज़मीनी नेटवर्क: 1,067 खेलो इंडिया केंद्र, 267 अकादमियां, 2,745 सहायता प्राप्त खिलाड़ी
• प्रतिभा खोज: 174 आकलन केंद्र, 1,87,921 आकलन पूरे
• मंत्रालय का बजट: 4,479.88 करोड़ रुपये — अब तक का सर्वाधिक
• लक्ष्य: 2036 तक शीर्ष 10, 2047 तक शीर्ष 5 खेल देशों में
बुधवार का कार्यक्रम इसी व्यवस्था की एक और परीक्षा है, और ठीक उन्हीं खेलों में जहां भारत परंपरागत रूप से सबसे कमज़ोर रहा है। पुरुषों की लंबी कूद के फ़ाइनल में मुरली श्रीशंकर और लोकेश सत्यनाथन उतरेंगे, और शाम को महिलाओं के गोला फेंक के फ़ाइनल में मनप्रीत कौर। कूद और फेंक वाले खेल ठीक वही हैं जिनमें प्रतिभा खोज की आधुनिक व्यवस्था से सबसे ज़्यादा फ़र्क़ पड़ना चाहिए, क्योंकि इनमें जो चीज़ें मायने रखती हैं — रफ़्तार, ताक़त, शरीर की बनावट, ताक़त लगाने की गति — उन्हें किसी आकलन केंद्र में पंद्रह साल की उम्र में ही नापा जा सकता है। इन दो फ़ाइनल के नतीजे भारोत्तोलन के पदकों से ज़्यादा बताएंगे कि पाइपलाइन कितनी काम कर रही है।
आंकड़ों में जो असली चुनौती दिखती है वह है रजत को स्वर्ण में बदलना। दो स्वर्ण के मुक़ाबले सात रजत का मतलब है कि भारत अब लगातार फ़ाइनल तक पहुंच रहा है — यह मुश्किल और धीमा आधा हिस्सा हल हो चुका है — लेकिन आख़िरी क़दम बाक़ी है। और वही क़दम सबसे महंगा है। वह ख़रीदा जाता है विदेशों में ज़्यादा प्रतियोगिताएं खिलाकर, बड़े खेलों से पहले डेढ़ साल विदेश में प्रशिक्षण शिविर लगाकर, और खेल विज्ञान की मदद — बायोमैकेनिक्स, पोषण, थकान की निगरानी, मनोविज्ञान — लगातार देकर, सिर्फ़ किसी बड़े आयोजन से ठीक पहले नहीं। इसलिए ग्लासगो का सबसे उपयोगी नतीजा पदक तालिका नहीं, बल्कि वह सूची होगी जिसमें उन खिलाड़ियों के नाम हैं जो एक प्रयास से चूक गए। हर नाम के साथ यह दर्ज हो कि कमी कहां रह गई, उसी हिसाब से पैसा और तैयारी लगे — तो 2036 का लक्ष्य महज़ इच्छा नहीं, एक समय-सारणी बन जाएगा।













