हर साल 7.4 करोड़ टन ज्यादा माल ढोने की बढ़ेगी क्षमता
नई दिल्ली। बिलासपुर से कटनी की तरफ जाने वाली मालगाड़ी आज भी सवारी गाड़ियों के पीछे अपनी बारी का इंतजार करती है। लाइन एक छोटे देश के हिसाब से बिछी थी। 2029-30 के बाद यह इंतजार खत्म हो जाएगा।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 9 सितंबर 2026 को दो अलग फैसलों में रेलवे की आठ मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी। तीन पूरब में, पांच दक्षिण में। इनसे रेल नेटवर्क में करीब 1,196 किलोमीटर पटरी जुड़ेगी।
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की 9 सितंबर की विज्ञप्ति के मुताबिक पूरब का हिस्सा 10,783 करोड़ रुपये का है। इसमें खड़गपुर-झारसुगुड़ा (बागदेही) चौथी लाइन, कटनी-पेंड्रा रोड चौथी लाइन और बिलासपुर (उसलापुर)-पेंड्रा रोड तीसरी लाइन शामिल हैं। यह पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 14 जिलों से गुजरेगा और करीब 656 किलोमीटर जोड़ेगा।
दक्षिण का हिस्सा उसी दोपहर मंजूर हुआ। लागत 10,021 करोड़ रुपये, जिले 17, राज्य चार — तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना। इसमें अरक्कोनम-रेनिगुंटा तीसरी और चौथी लाइन 77 किलोमीटर, व्हाइटफील्ड-बांगरपेट तीसरी और चौथी लाइन 47 किलोमीटर, होसुर-ओमालूर दोहरीकरण 147 किलोमीटर, सलेम-करूर-डिंडीगुल दोहरीकरण 159 किलोमीटर और सिकंदराबाद (घाटकेसर) से काजीपेट तक 110 किलोमीटर की मल्टीट्रैकिंग है।
दोनों विज्ञप्तियों में कुल आंकड़ा कहीं नहीं है।
ब्लिट्ज ने दोनों को जोड़ा। 10,783 और 10,021 मिलकर 20,804 करोड़ रुपये बनते हैं। 656 और 540 मिलकर 1,196 किलोमीटर। 14 और 17 मिलकर 31 जिले, नौ राज्यों में। दोनों हिस्से ठीक-ठीक कुल जोड़ के बराबर बैठते हैं। यह अपने आप में एक जांच है — दो कागजों से पढ़े गए फैसले में यही वह जगह है जहां कोई आंकड़ा गोल होकर चुपचाप खिसक जाता है।
एक भाग दूसरे से भाग दीजिए तो हर किलोमीटर पटरी करीब 17.39 करोड़ रुपये की पड़ी। यही वह आंकड़ा है जो पाठक अपने साथ ले जा सकता है। पुरानी लाइन पर नई क्षमता इतनी में आती है, क्योंकि जमीन पहले से रेलवे की है और नया सिर्फ लोहा है।
देश को क्या मिला, यह टन में नापा जा सकता है। पूरब के काम से हर साल 2.7 करोड़ टन और दक्षिण के काम से 4.7 करोड़ टन माल ढोने की अतिरिक्त क्षमता बनेगी। दोनों मिलाकर 7.4 करोड़ टन। इन रास्तों पर कोयला, सीमेंट, लोहा-इस्पात, कंटेनर, गाड़ियां, अनाज, पेट्रोलियम और खाद चलती है।
पहुंच माल से आगे की है। दोनों विज्ञप्तियों के आंकड़े जोड़ें तो करीब 6,911 गांवों को बेहतर संपर्क मिलेगा। इनकी आबादी करीब 1.08 करोड़ है। पूरब में 4,790 गांव और 56 लाख लोग, दक्षिण में 2,121 गांव और 52 लाख। रेल वहां भी पहुंचती है जहां लोग घूमने जाते हैं — बांधवगढ़ और अचानकमार टाइगर रिजर्व, अमरकंटक, तारातारिणी मंदिर, रतनपुर महामाया, मल्हार का पुरातात्विक स्थल, और दक्षिण में तिरुपति, तिरुचनूर, कोलार गोल्ड फील्ड्स, होगेनक्कल फॉल्स, मेट्टूर बांध, कोडाइकनाल तथा यादगिरिगुट्टा।
सबसे आसानी से छूट जाने वाला हिसाब पर्यावरण का है। दोनों परियोजनाओं से तेल के आयात में करीब 20 करोड़ लीटर की कमी आएगी। कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करीब 104 करोड़ किलो घटेगा। रेलवे इसे 4.48 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर मानता है। सड़क की जगह रेल से गया हर टन माल उतना डीजल है जो बाहर से नहीं खरीदना पड़ा।
बैठक के बाद नई दिल्ली में सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मंत्रिमंडल ने सात हाई-डेंसिटी रेल गलियारों के चार लेन के काम को भी मंजूरी दी है। इनमें दिल्ली-मुंबई, मुंबई-चेन्नई, चेन्नई-कोलकाता और कोलकाता-दिल्ली शामिल हैं। आकाशवाणी समाचार की 9 सितंबर की खबर के मुताबिक उन्होंने कहा कि ये सात गलियारे रेलवे का करीब 40 फीसदी यातायात ढोते हैं और करीब दो हजार किलोमीटर का चार लेन काम पूरा हो चुका है।
किया।
रक्षा मंत्रालय की 9 सितंबर की विज्ञप्ति के मुताबिक दोनों पक्षों ने दो समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया। पहला श्रीलंकाई वायु सेना की छह एल70 तोपों के उन्नयन पर है, जो भारत सरकार के अनुदान के तहत होगा। ये तोपें पहले भारत ने ही दी थीं। दूसरा दोनों देशों के राष्ट्रीय कैडेट कोर और राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालयों के बीच सहयोग पर है।
राष्ट्रपति दिसानायके ने चक्रवात दितवाह के वक्त ऑपरेशन सागर बंधु के तहत भारत की राहत और पुनर्वास पैकेज के लिए आभार जताया। उन्होंने दोहराया कि श्रीलंका अपनी जमीन कभी भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि सबसे करीबी मित्र और पड़ोसी होने के नाते भारत ने पहली मदद को एहसान नहीं, अपना कर्तव्य माना है।
वर्ल्डस्किल्स में भारत के ग्यारह नए हुनर
नई दिल्ली। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने 9 सितंबर को बताया कि भारत 22 से 27 सितंबर तक शंघाई में होने वाली 48वीं वर्ल्डस्किल्स प्रतियोगिता में ग्यारह नई श्रेणियों में पहली बार उतरेगा। टीम स्किल इंडिया 64 में से 63 कौशलों में भाग लेगी, करीब 70 प्रतियोगियों के साथ। यह वर्ल्डस्किल्स में भारत का अब तक का सबसे बड़ा दल है।
नई श्रेणियां हैं — डेंटल प्रोस्थेटिक्स, डिजिटल इंटरएक्टिव मीडिया डिजाइन, इंटेलिजेंट सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी, लैंडस्केप गार्डनिंग, ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी, रिटेल सेल्स, मानवरहित हवाई प्रणाली, औद्योगिक यांत्रिकी, सॉफ्टवेयर परीक्षण, भारी वाहन प्रौद्योगिकी और विमान रखरखाव।
तैयारी राष्ट्रीय कौशल विकास निगम करा रहा है। साथ में उद्योग के साझेदार हैं — कर्नाटक का गवर्नमेंट टूल रूम एंड ट्रेनिंग सेंटर, नामटेक गांधीनगर, बेनेट यूनिवर्सिटी, टाइटन कंपनी लिमिटेड-तनिष्क, क्रोमा, शॉपर्स स्टॉप, रिलायंस ट्रेंड्स और सैनी हेवी इंडस्ट्री इंडिया। भारत 2015 में वर्ल्डस्किल्स में 29वें स्थान पर था और 2024 में 13वें पर पहुंचा।
पालघर में छपेगा हड्डी का ग्राफ्ट
नई दिल्ली। किसी एक मरीज की हड्डी के नाप का ग्राफ्ट बनाना पहले बनाने की समस्या है, इलाज की बाद में। भारत अब तक इसका जवाब ज्यादातर बाहर से मंगाता रहा है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने 9 सितंबर को बताया कि उसने महाराष्ट्र के पालघर की मेसर्स सेरामैट प्राइवेट लिमिटेड को इसके लिए वित्तीय मदद दी है।
कंपनी 3डी प्रिंटिंग के दो तरीकों — डिजिटल लाइट प्रोसेसिंग और एक्सट्रूजन — से कैल्शियम फॉस्फेट वाले ग्राफ्ट बनाएगी। कच्चा माल स्वदेशी होगा : हाइड्रॉक्सीएपेटाइट, बीटा-ट्राइकैल्शियम फॉस्फेट, बाइफेसिक कैल्शियम फॉस्फेट और बायोएक्टिव ग्लास। ये सब प्राकृतिक हड्डी की खनिज बनावट से मिलते-जुलते हैं। विज्ञप्ति के मुताबिक भारत में मिलने वाले ऐसे उन्नत ग्राफ्ट का बड़ा हिस्सा अभी आयात होता है।
बोर्ड के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि प्रौद्योगिकी के उपभोक्ता से विकासकर्ता बनने के लिए भारत को स्वास्थ्य सेवा के ऐसे ही खास और ऊंची कीमत वाले हिस्सों में अपनी क्षमता चाहिए।
यूपीआई अब ग्यारह देशों में चालू
मुंबई मुंबई में 8 सितंबर को शुरू हुए ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने यूपीआई को भारत की फिनटेक कहानी का निर्विवाद चैंपियन बताया। उन्होंने कहा कि यूपीआई अब ग्यारह देशों में चालू है और अगस्त महीने में 24 अरब से ज्यादा यूपीआई लेनदेन हुए। यह खबर आकाशवाणी समाचार ने 9 सितंबर को दी।
उनकी अगली मांग साफ थी — जैसे सिंगापुर के साथ हुआ है, वैसे ही साझेदार देशों की अपनी भुगतान प्रणाली से यूपीआई को जोड़ा जाए, खासकर वहां जहां भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं या कारोबार ज्यादा है। वजह घर से जुड़ी है। दुनिया में सबसे ज्यादा पैसा भारत के लोग घर भेजते हैं, और भेजने की लागत में जो कमी आएगी वह उसी परिवार के पास रहेगी जिसे पैसा मिल रहा है।
हरित हाइड्रोजन का नया सस्ता रास्ता
बेंगलुरु, 9 सितंबर। सूरज की रोशनी से पानी तोड़कर हाइड्रोजन बनाना सबसे साफ तरीका है और सबसे महंगा भी। वजह यह कि लगभग हर काम लायक प्रकाश-उत्प्रेरक या तो अकार्बनिक अर्धचालक पर टिका है या किसी बहुमूल्य धातु पर। बेंगलुरु के सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज ने उसमें से धातु निकाल दी। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का स्वायत्त संस्थान है।
विभाग की 9 सितंबर की विज्ञप्ति के मुताबिक शोधकर्ताओं ने एक प्राकृतिक अमीनो एसिड — एस्पार्टिक एसिड — को प्रकाश सोखने वाले कार्बनिक अणु पेरीलीन डायइमाइड से जोड़ा। फिर अणुओं को पानी में अपने आप जमने दिया। ये सुप्रामॉलिक्यूलर स्व-संयोजन से बहुत सुव्यवस्थित द्विआयामी नैनोशीट बन गए।
काम कैसे हुआ, यह भी समझने लायक है। अमीनो एसिड वाला सिरा मजबूत हाइड्रोजन बंधन बनाता है। पेरीलीन डायइमाइड वाला सिरा प्रकाश सोखता है और π–π स्टैकिंग कराता है। दोनों मिलकर तय करते हैं कि अणु किस तरतीब में बैठेंगे, और तरतीब तय करती है कि पदार्थ क्या कर पाएगा।
नतीजा नपा-तुला है। अणु की रासायनिक बनावट में बिना कोई बदलाव किए, स्व-संयोजित रूप ने अपने थोक रूप के मुकाबले करीब 18 फीसदी ज्यादा फोटोकरंट दिया। प्रकाश सोखने का दायरा चौड़ा हुआ, आवेश बेहतर अलग हुए, ऊर्जा का नुकसान घटा और उत्प्रेरण के लिए सतह बढ़ी।
यह शोध डॉ. गौतम घोष और डॉ. आशुतोष के. सिंह के नेतृत्व में हुआ, जिसमें सौरव मोयरा, कुमार शुभम और अथिरा चंद्रन एम. शामिल रहे। यह रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की पत्रिका जर्नल ऑफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री ए में छपा है। यह प्रयोगशाला में फोटोकरंट का माप है, हाइड्रोजन का कारखाना नहीं — इसे उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए। पर जो बात साबित हुई वह बड़ी है : एक सस्ता प्राकृतिक अमीनो एसिड सिर्फ ईंट नहीं, पूरी तरतीब का नियामक बन सकता है। यही सिद्धांत अगर बड़े पैमाने पर चला, तो भारत के लिए सौर ईंधन का रास्ता प्लैटिनम और इरीडियम के बाजार से होकर नहीं जाएगा — जिन बाजारों में भारत की कोई हैसियत नहीं है।
पौधे जिंदा रहेंगे तभी मिलेगा प्रमाणपत्र
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजमार्ग की परियोजनाओं में सड़क किनारे पौधे लगाना हमेशा से अनुबंध की शर्त रहा है। जो नहीं था, वह यह कि पैसा मिलने की शर्त भी बने। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने 9 सितंबर को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर यह कमी पाट दी।
प्राधिकरण ने अपनी बात खुद विज्ञप्ति में रखी है। डिवाइडर और एवेन्यू पर वृक्षारोपण अनुबंध का दायित्व होते हुए भी अनंतिम पूर्णता प्रमाणपत्र देते वक्त अक्सर उसे उचित महत्व नहीं मिलता था। नए दिशा-निर्देशों ने उसकी जगह एक नापने लायक सीमा रख दी है।
अब अनंतिम पूर्णता प्रमाणपत्र या अनंतिम व्यावसायिक संचालन तिथि तभी मिलेगी जब वृक्षारोपण के लिए तय रास्ते के कम से कम 80 फीसदी हिस्से पर पौधे लग चुके हों। साथ ही निरीक्षण के वक्त लगे पौधों में से कम से कम 90 फीसदी जिंदा हों। इससे कम रहने पर समय-सीमा के साथ कमी दर्ज करनी होगी, और बाकी काम पूरा होने तक अनुबंध के हिसाब से वित्तीय कटौती लगेगी।
जिम्मेदारी प्रमाणपत्र के बाद भी चलती रहेगी। ईपीसी, हाइब्रिड एन्युटी और बीओटी-एन्युटी परियोजनाओं में रखरखाव या एन्युटी का भुगतान, और बीओटी-टोल में रखरखाव का आकलन, इस पर टिकेगा कि पूरे ओएंडएम काल में 90 फीसदी पौधे जिंदा रहें। सूखे पौधों की जगह उसी उम्र और बढ़त के पौधे लगाने होंगे। प्राधिकरण खेत-स्तर पर जांच के लिए पर्यावरण और वृक्षारोपण के विशेषज्ञ की तकनीकी मदद लेगा।
जिस ढांचे का हवाला दिया गया है वह नया नहीं है — ग्रीन हाइवेज पॉलिसी 2015 और आईआरसी:एसपी:21-2009 पहले से पौधे लगाना जरूरी करते थे। प्राधिकरण ने जो जोड़ा है वह संख्या है, जिस पर प्रमाणपत्र रुक जाएगा। नीति और नियंत्रण का फर्क यही होता है।
नागरिक के लिए फायदा छाया और धूल में नपेगा : जिस सड़क पर चार साल बाद 90 फीसदी पौधे जिंदा हों, उस पर चलना और उसके किनारे रहना दोनों अलग बात है।














