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भारत भी बना रहा अपना ‘सूरज’, गुजरात की लैब में जुटे वैज्ञानिक

इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च में वैज्ञानिकों ने एक बड़ी चुनौती को किया हल

by ब्लिट्ज़ इंडिया
October 5, 2026
in वेस्ट
0
भारत भी बना रहा अपना ‘सूरज’, गुजरात की लैब में जुटे वैज्ञानिक

अहमदाबाद। भारत भी अपना सूरज बनाने की दिशा में काम कर रहा है। गुजरात की एक लैब में वैज्ञानिक प्रकृति की सबसे शक्तिशाली प्रक्रिया संलयन यानी फ्यूजन को फिर से साकार करने की कोशिशों में जुटे हैं। यह वह रिएक्शन है जिससे सूरज चमकता है। हाल ही में चीन के बारे में खबर आई थी कि उसने कृत्रिम सूरज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट बना लिया है। अब कृत्रिम सूरज बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानियों की कोशिश भी रंग लाई है।

सूरज जैसी ऊर्जा पाने की चुनौती
बता दें कि सूरज संलयन यानी फ्यूजन से ऊर्जा पैदा करता है। नाभिकीय संलयन की यह प्रक्रिया कभी रुकती नहीं, सतत चलती रहती है। यदि इंसान इस तकनीक की मदद से कृत्रिम सूरज बनाए तो सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा को सतत बनाए रखने के साथ ही उस पर कंट्रोल हासिल करने और उसे देर तक बनाए रखने की होती है।

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वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात के इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बड़ी चुनौती को हल कर लिया है। वैज्ञानिकों एसएसटी-1 टोकामाक मशीन में एक शक्तिशाली 82.6 गीगाहर्ट्ज जाइरोट्रॉन नाम के उपकरण को चालू किया है जो हाई फ्रीक्वेंसी माइक्रोवेव ऊर्जा की मदद से प्लाज्मा स्टेट को लंबे समय तक बेहद ऊंचे तापमान पर गर्म बनाए रखता है। यानी भारतीय वैज्ञानिक सूरज की तरह फ्यूजन यानी संलयन से असीमित ऊर्जा बनाने की दिशा में आगे बढ़ चले हैं।

क्या होता है प्लाज्मा स्टेट?
प्लाज्मा एक अवस्था होती है। ठोस, द्रव और गैस के बाद प्लाज्मा पदार्थ की चौथी अवस्था है। यह बेहद उच्च तापमान वाली स्थिति होती है। यह किसी भी पदार्थ की अति उच्च तापमान वाली और इलेक्टि्रकली चार्ज्ड अवस्था मानी जाती है। इस स्थिति में परमाणु अपने इलेक्ट्रान तक खोने लगते हैं।

फ्यूजन से बिजली बनाना बड़ी चुनौती
एसएसटी-1 यानी स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामाक भारत की वह फ्यूजन मशीन है जिसे सूर्य की तरह ऊर्जा देने की प्रक्रिया को साकार करने के लिए डिजाइन किया गया है। बता दें कि फ्यूजन रिएक्टर यानी संलयन रिएक्टर बनाना बेहद मुश्किल है। न्यूक्लियर पॉवर प्लांट में रेडियोएक्टिव ईंधन जलाने के बजाय फ्यूजन रिएक्टर में अति उच्च तापमान और दबाव के बीच हल्के परमाणुओं के नाभिक को जोड़कर ऊर्जा पैदा की जाती है।

प्लाज्मा स्टेट को बनाए रखना मुश्किल
इस प्रक्रिया में अति उच्च तापमान के कारण एटम अपना अस्तित्व खोने लगते हैं। इस खतरनाक प्रयोग का केंद्र प्लाज्मा होता है जो पदार्थ की बहुत गर्म और इलेक्टि्रकली चार्ज्ड अवस्था मानी जाती है। यदि यह रिएक्टर की सतह से टकरा जाए तो काफी नुकसान भी हो सकता है। यही कारण है कि पृथ्वी पर एक बड़ी चुनौती प्लाज्मा को रिएक्टर की दीवारों को छूने से रोकना है। वैज्ञानिकों को जटिल मैग्नेटिक सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है।

देर तक प्लाज्मा स्टेट बनाए रखना मुश्किल
ऐसे में रिएक्टर के भीतर प्लाज्मा को देर तक बनाए रखना ही बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है। भारतीय वैज्ञानिकों ने डोनट के आकार के टोकामाक मशीन के भीतर शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड पैदा करने में कामयाबी पाई है।

इसकी मदद से ही प्लाज्मा को देर तक बनाए रख पाना संभव हो सकेगा। वहीं जाइरोट्रॉन वह शक्तिशाली मशीन है जो हाई-फ्रीक्वेंसी माइक्रोवेव ऊर्जा को पैदा करती है। इस ऊर्जा को एसएसटी-1 में प्लाज्मा तक पहुंचाया जाता है। इससे अति उच्च तापमान बनाने और उसे बनाए रखने में मदद मिलती है। इसकी मदद से वैज्ञानिक गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक बनाए रख पाएंगे।

सूरज से 20 गुना ज्यादा तापमान बना चुके
बता दें कि भारत के वैज्ञानिक नाभिकीय संलयन के प्रयोगों में पहले ही 200 मिलियन डिग्री सेल्सियस से भी ऊंचे प्लाज्मा तापमान को हासिल कर चुके हैं। यह सूरज के कोर से लगभग 20 गुना अधिक गर्म है। हालांकि इतने तापमान तक पहुंचना चुनौती का केवल एक हिस्सा है।

असल चुनौती अति उच्च तापमान वाले प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर और सीमित रखना है ताकि नाभिकीय संलयन यानी फ्यूजन से पैदा हुई ऊर्जा को इस्तेमाल के लायक बनाया जा सके।

कृत्रिम ‘सूरज’ बनाना क्यों मुश्किल?
कृत्रिम ‘सूरज’ यानी नाभिकीय संलयन यानी न्यूक्लियर फ्यूजन से बिजली पैदा करना विज्ञान और इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी चुनौती है। फ्यूजन साफ-सुथरी ऊर्जा का एक बड़ा विकल्प हो सकता है। धरती पर इसके लिए ईंधन भी खूब उपलब्ध हैं। इससे कम समय तक रहने वाला रेडियोएक्टिव कचरा पैदा होता है। यही कारण है कि चीन भी इसको साकार करने में लगा हुआ है। नया गाइरोट्रॉन तुरंत एसएसटी-1 को फ्यूजन पॉवर प्लांट में नहीं बदल देगा लेकिन इसने भारतीय वैज्ञानिकों के अति उच्च तापमान वाले प्लाज्मा के अध्ययन की दिशा में आगे जरूर बढ़ा दिया है।

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