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कोयला खदानों से डेटा सेंटर तक: भारत की बड़ी आर्थिक और तकनीकी खबरें

by ब्लिट्ज़ इंडिया
September 14, 2026
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कोयला खदानों से जिलों तक पहुंचता पैसा

नई दिल्ली, 14 सितंबर। खदान जिस जिले में है, उस जिले को उससे क्या मिलता है — यह सवाल अब कागज पर एक जवाब रखता है। कोयला मंत्रालय ने 14 सितंबर की विज्ञप्ति में बताया कि 2020 से अब तक नौ राज्यों में 147 कोयला ब्लॉक नीलाम हो चुके हैं। इनसे करीब 4.9 लाख रोजगार बनने का अनुमान है। पैसा पांच रास्तों से आता है, और उनमें से एक रास्ता ऐसा है जिसका पैसा जिले से बाहर नहीं जा सकता।

वह रास्ता है डीएमएफ — जिला खनिज प्रतिष्ठान। खदान से मिलने वाला यह हिस्सा प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के जरिये उसी खनन जिले में खर्च होता है। बाकी चार रास्ते हैं रेवेन्यू शेयर, रॉयल्टी, एनएमईटी और जीएसटी।

कितना पैसा, कहां से

मंत्रालय का अनुमान है कि ये 147 ब्लॉक पूरी तरह चलने पर हर साल करीब 47,500 करोड़ रुपये का राजस्व देंगे और 55,000 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश खींचेंगे। डेस्क ने इसे ब्लॉकवार निकाला — औसतन हर ब्लॉक पर करीब 323 करोड़ रुपये सालाना राजस्व, 374 करोड़ रुपये निवेश और करीब 3,333 रोजगार।

लेकिन अभी की असल वसूली इससे कहीं कम है, और मंत्रालय यह खुद लिखता है। वित्त वर्ष 2025-26 में आवंटित वाणिज्यिक खदानों से अग्रिम और प्रीमियम के तौर पर करीब 3,090 करोड़ रुपये आए। यह अनुमानित सालाना आंकड़े का 6.5 फीसदी है।

यह फर्क गड़बड़ी नहीं है। खदान नीलाम होने और खदान से कोयला निकलने के बीच जो वक्त लगता है, यह उसी का हिसाब है।

नीलामी होती कैसे है

बोली एमएसटीसी मंच पर दो चरणों में, ऑनलाइन लगती है। बोली के कागज सबके सामने खोले जाते हैं — यही वह ब्योरा है जो “पारदर्शी” शब्द को मतलब देता है। कोयले के आखिरी इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं। स्वचालित रास्ते से 100% विदेशी निवेश खुला है। शुरू में देने वाली रकम जानबूझकर कम रखी गई है और उसे आगे के राजस्व हिस्से में समायोजित किया जा सकता है।

छोटी कंपनी इसी आखिरी शर्त को दो बार पढ़ती है। 44 नई कंपनियों का खदान जीतना इसी का नतीजा है।

दूसरी बात और बड़ी है। कोल इंडिया की दो सहायक कंपनियां पहले सिर्फ कोयला निकालती और बेचती थीं। वेस्टर्न कोलफील्ड्स और नॉर्दर्न कोलफील्ड्स, दोनों अब खुद बोली लगाने उतरी हैं — निजी कंपनियों के बराबर शर्तों पर।

आयात का बिल और घर का कोयला

सिर्फ वाणिज्यिक खदानों से उत्पादन 2023-24 के 12.55 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 23.51 मिलियन टन हुआ — 87 फीसदी की बढ़त। कैप्टिव और वाणिज्यिक मिलाकर 2025-26 में करीब 210 मिलियन टन, जो पहली बार 200 मिलियन टन के पार गया। एक दशक पहले यही आंकड़ा 28.8 मिलियन टन था।

मंत्रालय इसे करीब 22% की चक्रवृद्धि सालाना बढ़त बताता है। डेस्क ने यह हिसाब खुद लगाया और वह 21.98% निकला। आंकड़ा जांच में खरा उतरा, और यह कहने लायक बात है।

पाठक के लिए इसका मतलब एक ही है। घर में निकाला गया हर टन कोयला वह टन है जो बाहर से नहीं खरीदना पड़ता। दस साल पहले के मुकाबले इन ब्लॉकों से हर साल 181.2 मिलियन टन ज्यादा कोयला निकल रहा है। यही फर्क है आयात के बिल और जिले के डीएमएफ खाते के बीच।

ब्लिट्ज डेटा कार्ड

नई दिल्ली, 14 सितंबर।

•एक नजर में 2020 से अब तक नौ राज्यों में 147 कोयला खदानें नीलाम ·

• 44 कंपनियों ने पहली बार खदान जीती · •अनुमानित सालाना राजस्व 47,500 करोड़ रुपये · 

•अनुमानित पूंजी निवेश 55,000 करोड़ रुपये · •अनुमानित रोजगार 4.9 लाख · 

•2025-26 में अग्रिम और प्रीमियम से असल वसूली करीब 3,090 करोड़ रुपये 

• वाणिज्यिक खदानों का उत्पादन 12.55 मिलियन टन (2023-24) से 23.51 मिलियन टन (2024-25) ।

• कैप्टिव और वाणिज्यिक मिलाकर करीब 210 मिलियन टन (2025-26), दशक भर पहले 28.8 मिलियन टन।

तुलना

•दस साल पहले उत्पादन 28.8 मिलियन टन

•2025-26 में उत्पादन 210 मिलियन टन

•उत्पादन दस साल पहले से 629% ज्यादा है — यानी हर साल 181.2 मिलियन टन ज्यादा कोयला।

हमारा हिसाब यहीं निकाला गया। 23.51 − 12.55 = 10.96 मिलियन टन, यानी 87% की बढ़त। चक्रवृद्धि दर : (210 ÷ 28.8) का दसवां मूल = 21.98% सालाना, जो मंत्रालय के “करीब 22%” से मिलता है। प्रति ब्लॉक : 47,500 ÷ 147 = 323 करोड़ रुपये सालाना राजस्व; 55,000 ÷ 147 = 374 करोड़ रुपये निवेश; 4.9 लाख ÷ 147 = करीब 3,333 रोजगार। वसूली बनाम अनुमान : 3,090 ÷ 47,500 = 6.5%। हर राज्य के हिस्से : 147 ÷ 9 = 16.3 ब्लॉक।

भारत को क्या मिला 

हर साल 181.2 मिलियन टन कोयला जो आयात नहीं करना पड़ता, और डीएमएफ के रास्ते वह हिस्सा जो खनन जिले में ही रुकता है।

ब्लिट्ज की सराहना

प्रशंसा कोयला मंत्रालय की। उसकी बोली-व्यवस्था इतनी खुली है कि सरकारी कंपनियों को भी अब वही खदान बोली लगाकर लेनी पड़ती है, जो पहले उन्हें दी जाती थी।

आंकड़े: कोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति “वाणिज्यिक कोयला खदानों की पारदर्शी नीलामी से

आत्मनिर्भर भारत को नई ऊर्जा”


डेटा सेंटर की क्षमता 1.57 गीगावाट

नई दिल्ली, 14 सितंबर  देश के डेटा सेंटरों की बिजली क्षमता 2020 में करीब 375 मेगावाट थी। अगस्त 2026 तक यह 1.57 गीगावाट हो गई — छह साल में चार गुना से ज्यादा, यानी डेस्क के हिसाब से हर साल करीब 27% की बढ़त। 2030 तक इसके करीब 8 गीगावाट पहुंचने का अनुमान है।

ये आंकड़े पीआईबी रिसर्च के 14 सितंबर 2026 के बैकग्राउंडर से हैं। उसी में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का अनुमान भी है कि 2031-32 तक मांग 17 गीगावाट तक जा सकती है।

पैसा दो फैसलों से आया

 बजट 2022-23 में डेटा सेंटर को बुनियादी ढांचे की सूची में डाला गया, जिससे उन्हें सड़क और हवाई अड्डे जैसी शर्तों पर लंबा और सस्ता कर्ज मिलने लगा। बजट 2026-27 में पात्र विदेशी क्लाउड कंपनियों को 2047 तक टैक्स में छूट दी गई। अभी करीब 70 अरब डॉलर लग रहा है और 90 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट घोषित हैं।

सरकारी हिस्सा एनआईसी के पास है — दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में राष्ट्रीय डेटा सेंटर, और राज्यों की राजधानियों में 37 छोटे केंद्र।


नवी मुंबई में राजभाषा पुरस्कार बंटे

नवी मुंबई, 14 सितंबर  राजभाषा गौरव और राजभाषा कीर्ति पुरस्कार 2025-26 नवी मुंबई में छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में दिए गए। आकाशवाणी ने 14 सितंबर 2026 को दोपहर यह खबर दी। दो दिन का यह सम्मेलन गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने रखा है।

सम्मेलन का विषय हिंदी और महाराष्ट्र की अपनी भाषाई और साहित्यिक परंपरा का रिश्ता है — यानी मेजबान राज्य की भाषा को साथी माना गया है, प्रतिद्वंद्वी नहीं। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर एक सत्र भी है। संस्थानों, बैंकों और मंत्रालयों के स्टॉल लगे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार, सांसद, विद्वान और शिक्षाविद मौजूद रहे।


ईओएस-05 अपनी कक्षा में

बेंगलुरु, 14 सितंबर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का अपना पन्ना 14 सितंबर 2026 को पढ़ा गया। उस पर दर्ज है कि जीएसएलवी-एफ17 ने 4 सितंबर 2026 को रात 02:55 बजे उड़ान भरी। उसने ईओएस-05 को तय कक्षा में रख दिया। इसके बाद कक्षा बदलने की तीन क्रियाएं हुईं; तीसरी और आखिरी पूरी हो चुकी है।

अलग से, इसरो ने निसार के एस-बैंड रडार के डेटा प्रोडक्ट जारी किए हैं। निसार वह उपग्रह है जो इसरो ने नासा के साथ मिलकर बनाया। एस-बैंड वाला हिस्सा भारत का है। दोनों एजेंसियों ने कक्षा में उसका एक साल पूरा होने पर आयोजन किया।

एस-बैंड रडार बादल के पार देखता है और रात में भी काम करता है। मानसून वाले देश की खेती के लिए यही सबसे बड़ी बात है। जुलाई में डूबा खेत जुलाई में ही नापा जा सकता है। अक्टूबर में आसमान साफ होने का इंतजार नहीं करना पड़ता।

जो इसरो ने अभी नहीं बताया, वह यह है कि ये प्रोडक्ट मिलेंगे कैसे और किस कीमत पर। डेटा तभी काम की चीज बनता है जब परभणी का कृषि विश्वविद्यालय भी उसे उतनी ही आसानी से ले सके जितनी आसानी से बेंगलुरु की कोई प्रयोगशाला।


 

सीएजी की पांच रिपोर्ट

चेन्नई, 14 सितंबर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की पांच रिपोर्ट 8 सितंबर को तमिलनाडु में पेश हुईं। यह cag.gov.in की अपनी ऑडिट रिपोर्ट सूची में दर्ज है, जो 14 सितंबर को पढ़ी गई। पांच में से चार परफॉर्मेंस ऑडिट हैं।

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ये अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य अनुसूचित वर्गों के छात्रों की छात्रवृत्ति योजनाओं, तमिलनाडु में स्मार्ट सिटी मिशन और राज्य में जल जीवन मिशन से जुड़ी हैं। बाकी दो मार्च 2024 तक के राज्य राजस्व और 2024-25 के राज्य वित्त की रिपोर्ट हैं। हर परफॉर्मेंस ऑडिट अंग्रेजी और तमिल, दोनों में छपी है। यह कहने लायक बात है। जो ऑडिट नागरिक पढ़ ही न सके, वह किसी और के लिए की गई ऑडिट है।

डेस्क ने ये रिपोर्टें अभी खोली नहीं हैं और यहां इनसे कोई निष्कर्ष नहीं दिया जा रहा। आज रिकॉर्ड पर इतना ही है कि वे हैं, कहां हैं और किस विषय पर हैं। निष्कर्ष, विभाग का जवाब और लोक लेखा समिति की राय — यह अलग काम है, और ब्लिट्ज उसे जवाब के साथ ही छापेगा, जैसा नियम कहता है।

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