गैस सिलेंडर की अगली बुकिंग के लिए गांव में 45 दिन का इंतजार खत्म अब शहर और गांव, दोनों के लिए 25 दिन
नई दिल्ली, 10 सितंबर। गांव के रसोईघर को अब शहर से बीस दिन ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने घरेलू गैस की दोबारा बुकिंग का अंतर सबके लिए 25 दिन कर दिया है। यह आदेश तुरंत लागू है।
मंत्रालय की 10 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। इसमें साफ लिखा है कि यह नियम गांव के उपभोक्ताओं पर भी उतना ही लागू होगा।
पहले क्या था, यह जानना जरूरी
मंत्रालय के मुताबिक फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने पर बुकिंग का समय तय किया गया था। शहर में 25 दिन और गांव में 45 दिन। यह मांग संभालने का अस्थायी इंतजाम था।
मंत्रालय ने अब कहा है कि गैस की मौजूदा आपूर्ति की हालत ठीक है। जब यह इंतजाम शुरू हुआ था, उसके मुकाबले बुकिंग का बकाया काफी घट चुका है। इसी वजह से अंतर घटाया गया है।
जो बीस दिन हटे हैं, वे कागज पर नहीं हैं। गांव के जिस घर में बीच चक्र में गैस खत्म हो जाती है, उसके पास पाइप वाली गैस का कोई विकल्प नहीं होता। चूल्हा फिर लकड़ी या उपले पर लौटता है, और उसका खर्च खाना बनाने वाले के फेफड़े चुकाते हैं।
देश के आम घर को इससे जो मिला वह बराबरी है। गांव का घर अब उसी कैलेंडर पर बुकिंग करेगा जिस पर शहर का घर करता है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के छह साल पैदावार 39.6 फीसदी बढ़ी, निर्यात 58.3 फीसदी, और पोरबंदर के एक मछुआरे को 48 लाख की मदद।
नई दिल्ली, 10 सितंबर। पोरबंदर के प्रवीणभाई बाबूलाल मसानी बीस साल से मछली के कारोबार में हैं। उन्हें पता था कि धंधे को बर्फ का कारखाना चाहिए। पर बर्फ का कारखाना नाव से महंगा पड़ता है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से उन्हें 2021-22 में 48 लाख रुपये की सब्सिडी मिली। उन्होंने रोज 30 टन बर्फ बनाने वाला कारखाना लगाया। अब उनके बंदरगाह से निकलने वाली नावें इतनी बर्फ लेकर जाती हैं कि पकड़ी हुई मछली खराब हुए बिना लौटती है।
यह योजना 10 सितंबर को छह साल पूरे कर रही है। पत्र सूचना कार्यालय की उसी दिन जारी पृष्ठभूमि रिपोर्ट में छह साल का हिसाब दर्ज है।
मछली की पैदावार 2019-20 के 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गई। निर्यात 2019-20 के 46,663 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 73,890 करोड़ रुपये पर पहुंचा। योजना में 58 लाख लोगों को रोजगार के मौके दर्ज हैं।
ब्लिट्ज़ ने वह हिसाब लगाया जो रिपोर्ट में नहीं है। पैदावार 56.11 लाख टन बढ़ी, यानी 39.6 फीसदी। यह हर साल करीब 6.9 फीसदी की रफ्तार बैठती है। निर्यात 27,227 करोड़ रुपये बढ़ा, यानी 58.3 फीसदी। और यह क्षेत्र करीब तीन करोड़ लोगों की रोजी चलाता है, तो 58 लाख उसका करीब पांचवां हिस्सा हुआ।
पैसे का ढांचा दिलचस्प है। योजना का कुल खाका 20,750 करोड़ रुपये का है। पर 11 अगस्त 2026 तक मंजूर परियोजनाएं 21,394.88 करोड़ रुपये की हैं। इसमें केंद्र का हिस्सा 9,510.89 करोड़ रुपये है।
इससे दो बातें निकलती हैं जो रिपोर्ट नहीं कहती। केंद्र का हिस्सा मंजूर लागत का 44.45 फीसदी है। बाकी 11,883.99 करोड़ रुपये राज्य, एजेंसियां और लाभार्थी लगा रहे हैं। मंजूर लागत योजना के अपने खाके से आगे निकल चुकी है, 103.11 फीसदी पर।
बाकी रिकॉर्ड यह है
2026-27 के बजट अनुमान में 2,500 करोड़ रुपये, जो योजना के लिए अब तक का सबसे ज्यादा है। शीत-शृंखला और विपणन ढांचे के लिए 2,797 करोड़ रुपये मंजूर। 544.86 करोड़ रुपये की परियोजनाओं से 2,195 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों को मदद, यानी हर संगठन पर करीब 24.8 लाख रुपये।
देश को इससे जो मिला वह सस्ता प्रोटीन और विदेशी मुद्रा है। तटीय घर के लिए मछली सबसे सस्ता पशु प्रोटीन है। और पोरबंदर का बर्फ कारखाना पकड़ी हुई मछली बिकने और सड़ने के बीच का फर्क है।
ब्लिट्ज़ डेटा कार्ड
- योजना का खाका:
- 20,750 करोड़ रुपये · बजट अनुमान
- 2026-27: 2,500 करोड़ रुपये · मंजूर
- परियोजनाएं: 21,394.88 करोड़ रुपये ·
- केंद्र का हिस्सा: 9,510.89 करोड़ रुपये ·
- पैदावार 2019-20: 141.64 लाख टन ·
- 2024-25: 197.75 लाख टन
- निर्यात 2019-20: 46,663 करोड़ रुपये · 2025-26: 73,890 करोड़ रुपये
- रोजगार: 58 लाख · शीत-शृंखला: 2,797 करोड़ रुपये
तुलना, पैमाने पर
निर्यात 2019-20 — 46,663 करोड़
निर्यात 2025-26 — 73,890 करोड़
अंतर: 58.3% ज्यादा।
ब्लिट्ज़ का हिसाब
197.75 − 141.64 = 56.11 लाख टन ज्यादा मछली, यानी 39.6% और हर साल करीब 6.9%।
9,510.89 ÷ 21,394.88 = केंद्र का हिस्सा 44.45%; बाकी 11,883.99 करोड़ राज्य, एजेंसी और लाभार्थी का।
21,394.88 ÷ 20,750 = 103.11%, यानी मंजूरी खाके से आगे। तीनों आंकड़े रिपोर्ट में नहीं हैं।
भारत को क्या मिला
तटीय घर का सबसे सस्ता प्रोटीन, और ऐसे संसाधन से 73,890 करोड़ रुपये की कमाई जो खुद को दोबारा भर लेता है।
मूल स्रोत: पीआईबी बैकग्राउंडर, सत्यापित pib.gov.in पर, 10 सितंबर को पढ़ा गया।
एम्स गुवाहाटी में पहली बार खुले दिल की सर्जरी एक ही दिन में सात साल के बच्चे और 47 साल की महिला का ऑपरेशन
गुवाहाटी, 10 सितंबर — असम के जिस परिवार के बच्चे के दिल में छेद हो, उसके लिए ऑपरेशन का मतलब अब तक सफर था। दिल्ली, चेन्नई या वेल्लोर। और अक्सर सफर का खर्च ऑपरेशन से ज्यादा बैठता था।
8 सितंबर को यह घर पर ही हो गया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की 10 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति के मुताबिक एम्स गुवाहाटी ने एक ही दिन में दो खुले दिल के ऑपरेशन किए। मरीज असम के ही थे — सात साल का एक बच्चा और 47 साल की एक महिला। दोनों के दिल में जन्म से छेद था।
यह संस्थान के हृदय शल्य कार्यक्रम की शुरुआत है। ऑपरेशन एम्स गुवाहाटी के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर कर्नल डॉ. अशोक पुराणिक के नेतृत्व में हुए। हृदय, वक्ष एवं संवहनी शल्य विभाग की अगुवाई प्रोफेसर विनीत महाजन ने की। साथ में निश्चेतना और हृदय रोग विभाग, परफ्यूजनिस्ट, तकनीकी स्टाफ और नर्सिंग टीम रही।
खुले दिल के ऑपरेशन में दिल-फेफड़े की मशीन चाहिए होती है। ऑपरेशन के दौरान वह कुछ देर के लिए दोनों अंगों का काम संभाल लेती है। विज्ञप्ति के मुताबिक इन दोनों ऑपरेशन में इस्तेमाल हुई मशीन आईसीआईसीआई फाउंडेशन की सीएसआर पहल से दान में मिली थी।
संस्थान आगे इस कार्यक्रम को बढ़ाकर कोरोनरी बाईपास सर्जरी और दूसरी उन्नत हृदय शल्य प्रक्रियाओं तक ले जाने की तैयारी में है।
पूर्वोत्तर को इससे जो मिला वह दूरी की कमी है। गुवाहाटी का यह कार्यक्रम असम और आसपास के राज्यों के काम आएगा। मरीज के साथ जाने वाले परिवार की जो मजदूरी सफर में जाती थी, वह अब बचेगी।

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
नई दिल्ली, 10 सितंबर — भारत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। पत्र सूचना कार्यालय की 10 सितंबर की पृष्ठभूमि रिपोर्ट के मुताबिक यह भारत की चौथी अध्यक्षता है।
अध्यक्षता का विषय है — ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊपन के लिए निर्माण’।
समूह में अब ग्यारह देश हैं। ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात। रिपोर्ट के मुताबिक इनके पास दुनिया की 49.5 फीसदी आबादी, कुल उत्पादन का 40 फीसदी और वैश्विक कारोबार का 26 फीसदी है।
इन तीन आंकड़ों को साथ रखिए तो सम्मेलन का असली विषय दिख जाता है। रिपोर्ट यह कहती नहीं है। ब्रिक्स देश दुनिया का दो-पांचवां हिस्सा बनाते हैं, पर कारोबार सिर्फ एक चौथाई करते हैं।
ब्लिट्ज़ ने अनुपात निकाला
इनके कारोबार का हिस्सा उत्पादन के हिस्से का 0.65 है और आबादी के हिस्से का आधा भर। चौदह अंक का फासला है इन देशों के बनाने और आपस में बेचने के बीच। यह कमजोरी नहीं, बिना खुदी हुई खान है — वह कारोबार जो ये देश आपस में कर सकते हैं और नहीं कर रहे।
थोड़ा इतिहास भी। रिपोर्ट के मुताबिक ‘ब्रिक’ शब्द 2001 में एक निवेश बैंक के आर्थिक पर्चे में गढ़ा गया था। उसमें अनुमान लगाया गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन पांच दशक में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में होंगे। 2010 में दक्षिण अफ्रीका जुड़ा और ब्रिक ब्रिक्स बन गया।
भारत को अध्यक्षता से जो मिला वह एजेंडा तय करने का हक है। जो देश सवाल तय करता है, बैठक उसी के सवालों पर चलती है।
वैश्विक ड्राईलैंड कांग्रेस आज दिल्ली में शुरू जुटे 800 से ज्यादा विशेषज्ञ
भाकृअनुप-इक्रिसैट साझेदारी के पचास साल पूरे
नई दिल्ली, 10 सितंबर — वैश्विक ड्राईलैंड कांग्रेस 2026 नई दिल्ली के राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर में 10 से 12 सितंबर 2026 तक चलेगी। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 9 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। विषय है — ‘दक्षिण-दक्षिण सहयोग से शुष्क भूमि की खेती में बदलाव’।
इसका संचालन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान मिलकर कर रहे हैं। यह दोनों संस्थानों की पचास साल पुरानी साझेदारी का मौका भी है।
विषय कितना बड़ा है, यह विज्ञप्ति के एक वाक्य में है। शुष्क भूमि दुनिया की करीब 45 फीसदी जमीन घेरती है। उस पर दो अरब से ज्यादा लोग रहते हैं। इनमें बहुत से छोटे किसान हैं, जो बदलते मौसम, घटती उपजाऊ ताकत, पानी की कमी और बदलते बाजार से जूझते हैं।
यानी शुष्क भूमि की खेती किसी कोने का विषय नहीं है। दुनिया का चौथा हिस्सा इसी तरह खाता है।
एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से आए 800 से ज्यादा वैज्ञानिक, नीति बनाने वाले, किसान प्रतिनिधि और विकास साझेदार छह विषयों पर काम करेंगे। ये हैं — प्रजनन, जलवायु सहनशीलता, पोषण और बाजार, खेती की पद्धतियां, बीज व्यवस्था, तथा महिला और युवा भागीदारी।
आखिरी दिन ‘दिल्ली घोषणापत्र’ अपनाया जाएगा। उसी दिन दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस भी मनाया जाएगा। मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान होंगे।
भारत को इससे जो मिला वह मेजबानी का हक है। दिल्ली के नाम वाला घोषणापत्र वह मानक है जो भारत ने लिखवाया, थमाया हुआ नहीं मिला।
भाषिणी की टीम महाराष्ट्र मंत्रालय पहुंची एक राज्य-स्तरीय विचार सामने रखा
नई दिल्ली, 10 सितंबर डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन ने महाराष्ट्र मंत्रालय में राज्य के भाषा विभाग के साथ एक कार्यशाला की। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की 10 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है।
विषय था सरकारी सेवाओं में बहुभाषी और आवाज से चलने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। टीम ने बोली पहचानने, बोली से लिखने, लिखे से बोलने, अनुवाद करने और आवाज से बातचीत करने की तकनीक दिखाई।
जो नागरिक सरकारी व्यवस्था से बोलकर बात कर सके, उसके लिए पढ़ना-लिखना अब दरवाजा नहीं रह जाता। यही इस काम का असल मतलब है।
कार्यशाला का मुख्य विषय आंकड़े रहे। स्थानीय स्तर पर काम करने वाली भाषा तकनीक के लिए अच्छी और प्रतिनिधि भाषा सामग्री चाहिए। विज्ञप्ति के मुताबिक इस पर बात हुई कि भाषा विशेषज्ञ, सरकारी संस्थान, शिक्षा जगत और समुदाय इसमें कैसे जुड़ें। नागरिकों के लिए रास्ता भाषादान है, जो भाषिणी का क्राउडसोर्सिंग मंच है।
दूसरा धागा विभागवार भाषा तकनीक का था। हर सरकारी विभाग की अपनी शब्दावली होती है। जो अनुवाद इंजन राजस्व विभाग के शब्द नहीं जानता, वह राजस्व विभाग के फॉर्म पर काम नहीं करेगा।
बैठक में महाराष्ट्र के लिए प्रस्तावित ‘महाभाषिणी’ विचार पर भी बात हुई। पर्यटन और परिवहन जैसी सेवाओं का नाम खास तौर पर लिया गया।
देश के नागरिक को इससे जो मिलेगा वह ऐसी सेवा है जो उसी भाषा में जवाब दे जिसमें सवाल पूछा गया। वाक्य छोटा है, बदलाव बहुत बड़ा।
नीति आयोग के सदस्य ने अगले दौर के सुधार का नाम रखा-नियम मुक्ति निशाने पर लाइसेंस, मंजूरी और हर साल का नवीनीकरण
नई दिल्ली, 10 सितंबर। — कारोबारी के लिए नियम का खर्च नियम नहीं होता। नवीनीकरण होता है। वही मंजूरी हर साल दोबारा, उसी काउंटर पर, फीस और इंतजार के साथ होती है।
नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने 10 सितंबर को ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ में इसी पर बात की। नीति आयोग की उसी दिन की विज्ञप्ति के मुताबिक उन्होंने कहा कि अगले दौर के सुधार की पहचान नियम-मुक्ति होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जोर छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों पर हो। लाइसेंस, मंजूरी और अनुमति का वह पूरा ढांचा हटे जो अलग-अलग रूपों में अब भी चलता है, और जिसमें बार-बार नवीनीकरण कराना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कानूनों, नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की व्यवस्थित समीक्षा जरूरी है, और यह काम एक उच्च स्तरीय समिति कर रही है।
सबसे दूर तक जाने वाली बात अधिकार क्षेत्र की थी। उन्होंने कहा कि कई अहम सुधार राज्यों और नगर निकायों के दायरे में आते हैं। एक नियम-मुक्ति कार्य बल इस सोच को राज्य और शहर के स्तर तक ले जा रहा है।
राज्यों को पूंजी निवेश के लिए विशेष सहायता की योजना और अर्बन चैलेंज फंड का हवाला देते हुए उन्होंने केंद्र के तरीके को ‘प्रतिस्पर्धा वाला सहकारी संघवाद’ कहा। यानी योजना का प्रोत्साहन सुधार के पड़ावों से जुड़ा, और परियोजनाएं चुनौती के जरिये चुनी हुई।
दुकानदार जो नवीनीकरण भरता है वह अक्सर नगर निगम का नियम होता है, केंद्र का नहीं। इसीलिए दिल्ली पर रुक जाने वाला सुधार जमीन पर महसूस नहीं होता।
पिछले दस साल पर उन्होंने कहा कि जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता और उदार विदेशी निवेश व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था का ढांचा बदला। रक्षा, अंतरिक्ष और अब परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्र निजी उद्यम के लिए खुले।
देश को इससे जो मिलेगा वह वक्त है। हर वह नवीनीकरण जो कंपनी को नहीं भरना पड़ेगा, उसके कर्मचारियों का एक हफ्ता फाइल से निकालकर काम में लगाएगा।
हरित भारत मिशन में दस साल तक कार्बन का आकलन सिर्फ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने किया
नई दिल्ली, 10 सितंबर — हरित भारत मिशन पर निष्पादन ऑडिट की रिपोर्ट संसद में रखी जा चुकी है। यह भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट संख्या 4, वर्ष 2026 है। इसे 12 अगस्त 2026 को सदन में रखा गया।
महालेखा परीक्षक की अपनी 13 अगस्त 2026 की विज्ञप्ति बताती है कि ऑडिट ने क्या देखा। ऑडिट ने 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मिशन की योजना, अमल और निगरानी देखी। ये वही हैं जिनके लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2015-16 से 2024-25 के बीच लक्ष्य मंजूर किए थे।
उस दस्तावेज का ज्यादातर हिस्सा लक्ष्य से पीछे रहने का ब्योरा है, और महालेखा परीक्षक उसे साफ शब्दों में रखते हैं। 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले वन आवरण की गुणवत्ता में सुधार करीब 1.14 लाख हेक्टेयर पर दर्ज हुआ, यानी 91.87 फीसदी कम। और वन आवरण में बढ़ोतरी करीब 34 हजार हेक्टेयर पर, यानी 97.57 फीसदी कम। रिपोर्ट संसद के सामने है, जहां मंत्रालय का जवाब भी प्रक्रिया का हिस्सा है। ब्लिट्ज़ इसमें किसी नतीजे को तय मानकर नहीं छाप रहा।
पर उसी विज्ञप्ति का एक वाक्य दूसरी तरफ इशारा करता है, और वही ले जाने लायक है। 2015 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी राज्य ने कार्बन अवशोषण का कोई आकलन नहीं किया। सोलह में से दो, यानी 12.5 फीसदी। यह हिस्सा विज्ञप्ति में गिना हुआ नहीं है।
यह बात जितनी छोटी लगती है, उससे बड़ी है। बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने का पूरा तर्क कार्बन अवशोषण ही है। बिना नाप के कार्यक्रम को यह तो पता रहता है कि कितने पौधे जमीन में गए, पर यह नहीं कि उससे हुआ क्या।
यह नाप फ्लक्स टावर से होती है। यह जंगल और उसके ऊपर की हवा के बीच कार्बन डाइऑक्साइड की अदला-बदली मापता है। महालेखा परीक्षक ने दर्ज किया है कि इन दो राज्यों में लगे टावर रखरखाव की योजना न होने से बेकार पड़े रहे, जबकि उन पर 3.50 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे।
पैसे पर विज्ञप्ति कहती है कि योजना के पहले चार साल के लिए मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 12वीं योजना से 2,000 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। साथ में 13वें वित्त आयोग के अनुदान से राज्यों के हिस्से के लिए 400 करोड़ रुपये। दस साल के अमल में बजट सहायता से मिले 1,149.14 करोड़ रुपये, यानी 47.88 फीसदी।
ब्लिट्ज़ ने यह अंकगणित दोबारा जांचा।
2,400 करोड़ में से 1,149.14 करोड़ ठीक 47.88 फीसदी बैठता है, और दोनों हिस्से जोड़ने पर वही कुल बनता है जो छपा है।
देश को इस रिपोर्ट से जो मिला वह एक चलता हुआ उदाहरण है। दो राज्यों ने दिखा दिया कि मिशन में कार्बन नापा जा सकता है। बाकी चौदह के पास अब नकल करने लायक तरीका है, और बचने लायक एक सबक भी।0














