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छह महीने में 29 गीगावाट: छत पर लगे सोलर ने भारत की हरित रफ़्तार को वह गति दे दी जो 2030 के लक्ष्य के लिए चाहिए थी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 29, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत ने 2026 की पहली छमाही में रिकॉर्ड 29 गीगावाट सौर और पवन क्षमता जोड़ी है। सौर क्षमता में 43% की उछाल आई, जिसमें बड़ा योगदान पीएम सूर्य घर योजना के तहत घरों की छतों पर लगे संयंत्रों का रहा। जून 2026 तक कुल स्थापित नवीकरणीय क्षमता 288.58 गीगावाट थी — सौर 162.15 गीगावाट, पवन 57.44 गीगावाट और जल विद्युत 57.24 गीगावाट। स्थापित नवीकरणीय क्षमता के मामले में भारत अब दुनिया में तीसरे स्थान पर है।

राज्यों का हिसाब भी दिलचस्प है। पहली छमाही में गुजरात ने 7.6 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी — देश की कुल बढ़ोतरी का 29% — और राजस्थान ने 6.6 गीगावाट यानी 25%। मतलब देश की आधी से ज़्यादा सौर क्षमता दो राज्यों में बन रही है। छोटी अवधि में यह समझदारी है, क्योंकि वहां ज़मीन, धूप और बिजली निकासी का ढांचा बेहतर है। पर लंबी अवधि में यह एक जोखिम भी है, क्योंकि देश की बड़ी हिस्सेदारी एक ही ट्रांसमिशन गलियारे और एक ही मौसमी क्षेत्र पर टिक जाती है।

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दो राज्य, आधा निर्माण: 2026 की पहली छमाही में गुजरात और राजस्थान ने मिलकर देश की सौर क्षमता वृद्धि का 54% हिस्सा जोड़ा।

बिजली बनाना अब भारत के हरित बदलाव का आसान हिस्सा है। असली कमी अब ट्रांसमिशन लाइन, भंडारण के घंटे और बिल चुका सकने वाली बिजली वितरण कंपनी की है।

एक नज़र में

• पहली छमाही 2026: रिकॉर्ड 29 गीगावाट सौर और पवन क्षमता जुड़ी
• सौर वृद्धि: 43% ऊपर, पीएम सूर्य घर के तहत छत पर सोलर से गति
• कुल नवीकरणीय क्षमता: 288.58 गीगावाट (जून 2026)
• बंटवारा: सौर 162.15, पवन 57.44, जल विद्युत 57.24 गीगावाट
• राज्य: गुजरात 7.6 गीगावाट (29%); राजस्थान 6.6 गीगावाट (25%)
• पूरे साल का अनुमान: कैलेंडर वर्ष 2026 में क़रीब 47 गीगावाट
• लक्ष्य: 2030 तक 500 गीगावाट ग़ैर-जीवाश्म बिजली क्षमता

छत वाले सोलर पर अलग से ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि इससे ग्राहक ही बदल जाता है। बड़ा सौर पार्क एक प्रोजेक्ट फ़ाइनेंस का सौदा होता है — एक ख़रीदार, एक ठेका, पच्चीस साल का बिजली ख़रीद समझौता। पीएम सूर्य घर जैसे पैमाने पर छत का कार्यक्रम असल में उपभोक्ता सामान का कारोबार है: लाखों छोटे सौदे, हर एक में एक परिवार का क़र्ज़, एक इंस्टॉलर, एक जांच, नेट मीटरिंग की मंज़ूरी और बाद की सर्विस। इससे बनने वाला उद्योग बिल्कुल अलग है — स्थानीय इंस्टॉलर, छोटे क़र्ज़ देने वाली संस्थाएं, मोहल्ले की सर्विस दुकानें — और प्रति मेगावाट रोज़गार भी कहीं ज़्यादा। साथ ही गुणवत्ता एक जैसी रखना यहीं सबसे कठिन है, और साख का ख़तरा भी यहीं है।

पूरे कैलेंडर वर्ष 2026 में क़रीब 47 गीगावाट जुड़ने का अनुमान है और 2030 का 500 गीगावाट का लक्ष्य पटरी पर दिख रहा है। इसलिए अब असली अड़चनें बिजली बनाने में नहीं, उसे पहुंचाने और संभालने में हैं। तीन काम प्राथमिकता मांगते हैं: एक, पश्चिमी सौर बेल्ट से बिजली निकालने वाली अंतरराज्यीय लाइनें उसी रफ़्तार से बनें जिस रफ़्तार से संयंत्र, वरना बनी हुई बिजली बेकार जाएगी; दो, भंडारण — क्योंकि शाम की एक यूनिट की क़ीमत दोपहर की यूनिट से ज़्यादा हो चुकी है, और बैटरी तथा पंप्ड हाइड्रो की निविदाएं अब बाज़ार का सबसे दिलचस्प हिस्सा हैं; और तीन, वितरण कंपनियों की माली हालत, क्योंकि किसी भी परियोजना की कमाई आख़िरकार उसी डिस्कॉम के चेक पर टिकी है। भारत ने दिखा दिया है कि वह दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार से बिजली बना सकता है। अगले दो साल यह तय करेंगे कि वह उसे उतनी ही अच्छी तरह पहुंचा भी सकता है या नहीं।

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