ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।हर साल लाखों नौजवान सिर्फ़ नीट-यूजी की परीक्षा देते हैं, और मेडिकल सीटें उसका एक छोटा-सा हिस्सा हैं। इसमें सरकारी नौकरियों की भर्ती परीक्षाएं जोड़ लीजिए तो हर साल करोड़ों परिवारों की उम्मीद एक ही चीज़ पर टिकी होती है: कि पर्चा साफ़-सुथरा रहेगा। इसीलिए परीक्षा की साख कोई दफ़्तरी मामला नहीं है। यह वह तराज़ू है जिससे इतना बड़ा देश मौक़े बांटता है। केंद्र ने अभी जो तीन क़दम उठाए हैं, उन्हें एक साथ पढ़िए तो बात किसी विवाद को संभालने की नहीं, एक संस्था को नए सिरे से बनाने की दिखती है।
पहला क़दम क़ानून का है। इस सत्र में लोक सभा में पेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 ने 2024 के क़ानून की सज़ाएं और सख़्त कर दी हैं। पर्चा लीक करने या ओएमआर शीट से छेड़छाड़ करने पर कम से कम सज़ा तीन साल से बढ़ाकर पांच साल कर दी गई है, ज़्यादा से ज़्यादा दस साल। और जहां पूरा गिरोह या कोई संस्थान शामिल हो, वहां न्यूनतम सज़ा पांच साल से बढ़ाकर सात साल। दूसरा क़दम प्रशासनिक है — राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के 47 अधिकारियों को हटाया गया है। और तीसरा क़दम, जो शायद पांच साल बाद सबसे ज़्यादा मायने रखेगा, वह है यूआईडीएआई के पूर्व अध्यक्ष नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय टास्क फ़ोर्स, जिसे पूरी परीक्षा व्यवस्था का ढांचा नए सिरे से सुझाना है।
यह पहले लॉजिस्टिक्स की समस्या है, क़ानून की बाद में: एक ही सुबह हज़ारों केंद्रों तक पर्चे पहुंचाने की पूरी शृंखला में हर हाथ-बदल एक कमज़ोर कड़ी है, जिसे भरोसे से नहीं, डिज़ाइन से मज़बूत करना पड़ता है।
सज़ा लीक के बाद काम आती है। डिज़ाइन तय करता है कि लीक करने लायक़ कुछ बचे ही नहीं। भारत अब दोनों कर रहा है — और असर सिर्फ़ दूसरे का बढ़ता जाता है।
एक नज़र में
• विधेयक: सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 — लोक सभा में पेश
• व्यक्तिगत अपराध: न्यूनतम सज़ा 3 से बढ़ाकर 5 साल; अधिकतम 10 साल
• संगठित गिरोह: न्यूनतम सज़ा 5 से बढ़ाकर 7 साल
• मूल क़ानून: सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024
• प्रशासनिक कार्रवाई: एनटीए के 47 अधिकारी हटाए गए
• टास्क फ़ोर्स: अध्यक्ष नंदन नीलेकणि, पूर्व अध्यक्ष, यूआईडीएआई
• पृष्ठभूमि: नीट-यूजी 2026 मई में रद्द, अगले महीने दोबारा कराई गई
नीलेकणि को यह ज़िम्मा देने का मतलब किसी एक व्यक्ति पर भरोसा नहीं, एक तरीक़े पर भरोसा है। आधार से सबसे बड़ा सबक़ यही निकला था कि भारत जैसे पैमाने पर कोई व्यवस्था तभी चलती है जब उसे पतले, जांचे-परखे डिजिटल ढांचे की तरह बनाया जाए — और तब लड़खड़ाती है जब वह हाथ-दर-हाथ चलने वाली कड़ियों की लंबी क़तार बन जाए। परीक्षा भी ठीक इसी क़िस्म की समस्या है: बहुत सारी गोपनीय चीज़ें, बहुत सारी जगहों पर, एक ही तय घड़ी में पहुंचानी होती हैं। इसलिए असली सुधार वे होंगे जिनकी सुर्ख़ियां नहीं बनतीं — केंद्र पर ही एन्क्रिप्टेड पर्चा खुलना, सवालों का इतना बड़ा बैंक कि कोई एक ‘पर्चा’ चोरी करने लायक़ बचे ही नहीं, छेड़छाड़ पकड़ने वाली पैकिंग, बायोमेट्रिक पहचान, और हर शिकायत के बाद नहीं बल्कि हर केंद्र का स्वतंत्र ऑडिट।
आगे का रास्ता यह है कि यह सारी मेहनत उन लोगों को दिखे भी जिनके लिए हो रही है। अभी छात्र और अभिभावक व्यवस्था के बारे में तभी जानते हैं जब वह गड़बड़ा जाती है। होना यह चाहिए कि पहले से, आसान भाषा में यह सार्वजनिक हो कि पर्चा किस-किस हाथ से गुज़रता है, केंद्र की जांच कैसे होती है, शिकायत कहां करनी है और जवाब कितने दिन में मिलेगा। हर बड़ी राष्ट्रीय परीक्षा की सालाना ‘साख रिपोर्ट’ — कितने केंद्रों का ऑडिट हुआ, कितनी गड़बड़ियां पकड़ी गईं, कितने मुक़दमे दर्ज हुए, औसतन कितने दिन में निपटे — प्रकाशित करना उस भरोसे को लौटाने का सबसे सीधा तरीक़ा है। क़ानून आ गया है, कार्रवाई हो चुकी है, और तकनीकी समझ टास्क फ़ोर्स के पास है। अब बस अपना हिसाब खुलकर दिखाने की आदत डालनी है।












