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बारह महीनों में 28 लाख इलेक्ट्रिक गाड़ियां: अब यह प्रयोग नहीं, बाज़ार है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 29, 2026
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भारत इलेक्ट्रिक वाहन

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच देश में 28,27,126 इलेक्ट्रिक वाहन पंजीकृत हुए — यह आंकड़ा वाहन डैशबोर्ड का है और इसमें धीमी रफ़्तार वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया शामिल नहीं हैं। साल भर में क़रीब 28.3 लाख गाड़ियां वह सीमा है जिसके बाद किसी बाज़ार को “उभरता हुआ” कहना बंद कर दिया जाता है और उसके हिसाब से योजना बनाई जाने लगती है — पुर्ज़े बनाने वाली कंपनियां तय करती हैं कि कारखाना कहां लगाएं, बिजली वितरण कंपनियां भार का अनुमान लगाती हैं, और वित्त कंपनियां तय करती हैं कि पांच साल बाद एक इलेक्ट्रिक गाड़ी की क़ीमत क्या होगी। इस बाज़ार में टाटा मोटर्स 38% से ज़्यादा हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है, उसके बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया।

नई गाड़ियों की सूची से भी यही बात पुष्ट होती है कि बाज़ार चौड़ा हुआ है। जुलाई 2026 में हर क़ीमत वर्ग में गाड़ियां आईं — क़रीब 13.50 लाख रुपये में किआ साइरोस ईवी, लगभग 18.79 लाख रुपये में टाटा सिएरा ईवी, और क़रीब 23.60 लाख रुपये में टोयोटा अर्बन क्रूज़र ईबेला; साथ ही मारुति ब्रेज़ा, टोयोटा हाइलक्स और निसान टेक्टन जैसी पारंपरिक गाड़ियां भी। सबसे नीचे के वर्ग में ब्लिंक राइड आई, जो क़रीब 4.50 लाख रुपये के साथ इस समय देश में लॉन्च हुई सबसे सस्ती कार है और कंपनी के दावे के मुताबिक़ एक बार चार्ज करने पर 250 किलोमीटर चलती है। गोद लेने की रफ़्तार के हिसाब से यह क़ीमत किसी भी महंगी लॉन्च से ज़्यादा मायने रखती है।

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अगली अड़चन गाड़ी नहीं, प्लग है: साल में 28 लाख पंजीकरण के बाद चार्जिंग की उपलब्धता और बिजली ग्रिड की तैयारी किसी भी नई गाड़ी से ज़्यादा अहम हो जाती है।

कोई बाज़ार तब बड़ा होता है जब बहस गाड़ी से हटकर उसके आसपास के ढांचे पर आ जाए। भारत की इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बहस अभी-अभी वहां पहुंची है।

एक नज़र में

• पंजीकरण: जुलाई 2025 से जून 2026 तक 28,27,126 इलेक्ट्रिक वाहन (वाहन डैशबोर्ड; धीमी रफ़्तार वाले ई-दोपहिया शामिल नहीं)
• अग्रणी कंपनी: टाटा मोटर्स, 38% से अधिक हिस्सेदारी; फिर महिंद्रा एंड महिंद्रा और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया
• जुलाई की लॉन्च: किआ साइरोस ईवी (~13.50 लाख), टाटा सिएरा ईवी (~18.79 लाख), टोयोटा अर्बन क्रूज़र ईबेला (~23.60 लाख)
• सबसे सस्ती: ब्लिंक राइड, क़रीब 4.50 लाख रुपये, दावा 250 किमी रेंज
• नीति: मसौदा कैफ़े-III मानक वित्त वर्ष 2028 से 2032 तक हर साल सख़्त होंगे

एक कंपनी के पास 38% से ज़्यादा हिस्सेदारी होने का मतलब यह नहीं कि बाक़ी पिछड़ गए। इसका मतलब यह है कि यह अब भी शुरुआती बाज़ार है, जिसमें सबसे पहले गंभीरता से उतरी कंपनी ने उन ख़रीदारों को पकड़ लिया जो वैसे भी इलेक्ट्रिक गाड़ी लेने वाले थे। आगे क्या होता है — यानी नई प्रतिस्पर्धी गाड़ियां आने पर यह हिस्सेदारी कितनी तेज़ी से घटती है — यही सबसे अच्छा संकेत होगा कि क्या इलेक्ट्रिक गाड़ियां अब शुरुआती शौक़ीनों से आगे बढ़कर आम ख़रीदार तक पहुंच रही हैं। असली पर्यावरणीय फ़ायदा उसी दूसरे चरण में मिलता है।

आगे की अड़चन गाड़ियां नहीं हैं। अड़चन तीन चीज़ें हैं — चार्जिंग की उपलब्धता, पुरानी गाड़ी की क़ीमत, और बिजली ग्रिड की तैयारी — और तीनों का इलाज अलग है। चार्जिंग तालमेल की समस्या है, जिसका सबसे कारगर हल यह है कि नए शहरी निर्माण की मंज़ूरी की शर्त में चार्जिंग की व्यवस्था जोड़ी जाए, न कि हर स्टेशन पर सब्सिडी दी जाए। पुरानी गाड़ी की क़ीमत जानकारी की समस्या है, जिसे बैटरी की सेहत प्रमाणित करने के मानक बड़े हिस्से में हल कर सकते हैं। और ग्रिड की तैयारी योजना की समस्या है — बिजली वितरण कंपनियों से यह कहा जाए कि वे हर फ़ीडर पर इलेक्ट्रिक गाड़ियों से आने वाले भार का अनुमान सार्वजनिक करें, ताकि तार और ट्रांसफ़ॉर्मर शिकायत आने के बाद नहीं, मांग बढ़ने से पहले मज़बूत हों। भारत ने साबित कर दिया है कि वह इस बाज़ार की मांग उम्मीद से तेज़ खड़ी कर सकता है। अब उतना ही ध्यान उस कम दिखने वाले आधे हिस्से को चाहिए — प्लग, तार और पुरानी गाड़ियों का बाज़ार — जो तय करेगा कि अगले 28 लाख वाहन पहले वाले से जल्दी आते हैं या नहीं।

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