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नल लग गया। अब असली सवाल यह है कि उसमें पानी रोज़ आता है या नहीं, और वह पीने लायक़ है या नहीं

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 29, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।आने वाले पच्चीस साल में भारत के सामने जितनी बड़ी चुनौतियां हैं, उनमें पानी अकेली ऐसी है जिसका कोई एक हल नहीं है और जो चुपचाप बाक़ी सब कुछ तय करती है — खेती की पैदावार, उद्योग कहां लगेगा, शहर कितना बढ़ेगा, बीमारियां कितनी होंगी, और घर की महिलाओं तथा बेटियों के कितने घंटे उस काम में जाएंगे जो एक पाइप को करना चाहिए। यही वह क्षेत्र भी है जहां भारत ने अभी-अभी अपने इतिहास का एक सबसे बड़ा बुनियादी ढांचा कार्यक्रम पूरा किया है। इसलिए यह सही मौक़ा है कि हम कवरेज के आंकड़े से आगे बढ़कर ज़्यादा कठिन सवाल पूछें।

पहले उपलब्धि, क्योंकि वह असली और बहुत बड़ी है। 3 मार्च 2026 तक क़रीब 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों — यानी चिह्नित परिवारों के 81.71% — ने नल से जलापूर्ति की जानकारी दी, जबकि 2019 में जल जीवन मिशन शुरू होते समय यह संख्या 3.23 करोड़ थी। 2026 की शुरुआत तक 2.7 लाख से ज़्यादा गांव ‘हर घर जल’ प्रमाणित हो चुके थे, यानी वहां हर घर और हर सार्वजनिक संस्थान तक नल कनेक्शन है। साथ में जांच का ढांचा भी खड़ा हुआ — जनवरी 2026 तक 2,868 जल परीक्षण प्रयोगशालाएं, जिनमें 1,704 मान्यता प्राप्त हैं। छह साल में भारत ने इतनी आबादी तक पाइप पहुंचाया है जितनी ज़्यादातर देशों की कुल आबादी नहीं है।

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कनेक्शन आसान हिस्सा है: पाइप एक बार बिछता है, जबकि साफ़ पानी रोज़ बनाना, जांचना, पंप करना और उसका ख़र्च उठाना योजना की पूरी उम्र तक चलने वाला काम है।

पाइप पूंजीगत ख़र्च है, पानी परिचालन ख़र्च। भारत ने पहला काम असाधारण पैमाने पर कर दिखाया है। अगला दशक दूसरे की परीक्षा है।

एक नज़र में

• कवरेज: 3 मार्च 2026 तक क़रीब 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवार (81.71%) नल जल से जुड़े
• शुरुआत: 2019 में 3.23 करोड़ परिवार
• प्रमाणित गांव: 2026 की शुरुआत तक 2.7 लाख से ज़्यादा ‘हर घर जल’ गांव
• जांच ढांचा: 2,868 प्रयोगशालाएं, 1,704 मान्यता प्राप्त (जनवरी 2026)
• असली अंतर: जुड़े हुए परिवारों में लगभग तीन-चौथाई को नियमित, सुरक्षित और पर्याप्त पानी मिलता है
• भूजल: नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक ने चेताया था कि देश के 54% कुओं का जलस्तर गिर रहा है

कवरेज और असल आपूर्ति के बीच का यह अंतर ही अगले दशक का काम है, और इसे साफ़ शब्दों में कहना ज़रूरी है क्योंकि यह नापा जा सकता है: कनेक्शन लगभग पूरे ग्रामीण भारत तक पहुंच चुके हैं, पर जुड़े हुए परिवारों में क़रीब तीन-चौथाई को ही नियमित, सुरक्षित और पर्याप्त पानी मिल पाता है। इसकी वजहें किसी की नीयत नहीं, ढांचे में हैं। गांव की योजना जिस स्रोत पर टिकी है — अक्सर भूजल — वह रिचार्ज से तेज़ी से खिंच रहा है; पंप चलाने के लिए बिजली चाहिए; पंप की मरम्मत, क्लोरीनेटर बदलने और लीक ठीक करने के लिए गांव की समिति के पास पैसा और तकनीकी समझ चाहिए; और किसी को इतनी बार पानी जांचना होगा कि फ्लोराइड, आर्सेनिक या बैक्टीरिया किसी बच्चे तक पहुंचने से पहले पकड़े जाएं। ये सब रोज़ चलने वाले काम हैं, और रोज़ चलने वाले कामों का कोई उद्घाटन नहीं होता।

आगे का रास्ता चमकदार नहीं है, पर पूरी तरह मुमकिन है। पहला, स्रोत को भी योजना का हिस्सा मानिए — हर योजना के साथ रिचार्ज का इंतज़ाम हो: चेक डैम, खेत तालाब, पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार, भूजल पुनर्भरण। गिरते जलस्तर पर लगा नल अस्थायी नल है। दूसरा, मांग की तरफ़ काम कीजिए, क्योंकि पानी असल में वहीं जाता है — देश के कुल जल उपयोग का सबसे बड़ा हिस्सा खेती में है, और कम पानी वाली फ़सलों, सूक्ष्म सिंचाई और पंप के लिए मीटर या अलग फ़ीडर वाली बिजली की तरफ़ प्रोत्साहन मोड़ना सबसे ज़्यादा असर देने वाला बदलाव है। तीसरा, रखरखाव का ख़र्च ईमानदारी से जुटाइए — ग़रीब परिवारों को छूट के साथ एक छोटा, पारदर्शी शुल्क, जो सिर्फ़ मरम्मत में लगे, वही योजना को सातवें साल में ज़िंदा रखता है। और चौथा, सिर्फ़ कवरेज नहीं, कार्यशीलता प्रकाशित कीजिए — गांव-दर-गांव कितने घंटे पानी आया, जांच में क्या निकला, कितने दिन बंद रहा। मुश्किल और दिखने वाला हिस्सा भारत ने उम्मीद से तेज़ पूरा किया है। जो हिस्सा नहीं दिखता, वही इसे जल सुरक्षा में बदलेगा — और उसके लिए ज़रूरी ढांचा और आंकड़े, दोनों अब देश के पास हैं।

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