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288 गीगावॉट के बाद का सवाल: भारत शाम की बिजली कहां रखेगा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 27, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।30 जून 2026 तक भारत की स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 288.58 गीगावॉट पहुंच गई, जो 2014 में 76.38 गीगावॉट थी। 8.78 गीगावॉट परमाणु बिजली जोड़ दें तो कुल ग़ैर-जीवाश्म क्षमता 297.36 गीगावॉट हो जाती है। इसमें सौर ऊर्जा सबसे आगे है — 162.15 गीगावॉट, जो 2013-14 के 2.82 गीगावॉट से 57 गुना ज़्यादा है। पवन ऊर्जा 57.44, बड़ी पनबिजली 57.24 और जैव ऊर्जा 11.75 गीगावॉट पर है। सिर्फ़ इस साल के पहले छह महीनों में 30.6 गीगावॉट जुड़े, यानी पिछले साल से 25 फ़ीसदी ज़्यादा।

ये आंकड़े एक बड़ी औद्योगिक कामयाबी बताते हैं, और साथ ही यह भी कि अब सवाल बदल चुका है। बिजली बनाने की क्षमता खड़ी करना पहली चुनौती थी और भारत ने उसे काफ़ी हद तक हल कर लिया — पैनल सस्ते हुए, नीलामी में प्रतिस्पर्धा बढ़ी, और अब देश जिस रफ़्तार से सौर संयंत्र लगाता है, वह गिनी-चुनी क़ौमों के बस की बात है। दूसरी चुनौती अलग किस्म की है। सूरज दिन में बिजली देता है; भारत में बिजली की सबसे ज़्यादा मांग शाम ढलने के बाद होती है, जब पंखे, बत्ती, कूलर और रसोई एक साथ चलते हैं। 162 गीगावॉट सौर क्षमता वाली व्यवस्था के पास बिजली की कमी नहीं — ग़लत समय पर ज़्यादा बिजली की समस्या है।

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बनाने की समस्या हल हो रही है: 30 जून तक नवीकरणीय क्षमता 288.58 गीगावॉट, सौर 162.15 गीगावॉट। अगली अड़चन यह है कि बिजली कब उपलब्ध है, कितनी नहीं।

धूप से बिजली बनाना भारत ने दुनिया के कई देशों से तेज़ सीख लिया। बचा हुआ सवाल छोटा है और ज़िद्दी भी — वह शाम को कहां रखेगा?

लंबी नज़र

• नवीकरणीय क्षमता: 288.58 गीगावॉट (2014 में 76.38)
• ग़ैर-जीवाश्म कुल: 297.36 गीगावॉट, इसमें 8.78 गीगावॉट परमाणु
• मिश्रण: सौर 162.15 · पवन 57.44 · बड़ी पनबिजली 57.24 · जैव 11.75 गीगावॉट
• रफ़्तार: पहले छह महीनों में 30.6 गीगावॉट, 25% बढ़त; 2030 तक 500 गीगावॉट का लक्ष्य

अड़चनें बिना घबराए गिनाना ज़रूरी है, क्योंकि हर एक का इलाज मालूम है। बिजली भंडारण — बैटरी, पंप्ड हाइड्रो और इनके लिए बाज़ार व्यवस्था — उत्पादन के मुक़ाबले काफ़ी पीछे है। पारेषण लाइनें वहां बनानी पड़ती हैं जहां धूप और हवा है, जो अक्सर वहां नहीं जहां कारख़ाने हैं, और लाइन की मंज़ूरी में सौर संयंत्र बनने से ज़्यादा वक़्त लगता है। कई राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों की माली हालत लंबे अनुबंध करने की उनकी क्षमता घटाती है। और बदलती रहने वाली बिजली चलाने के लिए ग्रिड को कोयले वाली व्यवस्था से कहीं बेहतर पूर्वानुमान और संतुलन चाहिए।

आगे का रास्ता अब साफ़ है और भारत उस पर चल भी रहा है। पंप्ड स्टोरेज परियोजनाएं देश के पहाड़ी इलाक़ों की क़ुदरती बनावट का इस्तेमाल करती हैं और दशकों चलती हैं। बैटरी की क़ीमत उसी ढलान पर घट रही है जिस पर कभी सौर पैनल घटे थे, और घरेलू सेल निर्माण इस कड़ी को छोटा करेगा। समय-आधारित बिजली दरें सिंचाई पंप, कारख़ानों की प्रक्रियाओं और गाड़ियों की चार्जिंग को धूप वाले घंटों में खिसका देती हैं — यह सबसे सस्ता भंडारण है, क्योंकि इसमें कोई मशीन नहीं लगती। और मांग से पहले बनाई गई पारेषण लाइनें आज महंगी लगती हैं, कल बर्बाद होती बिजली से सस्ती पड़ती हैं। भारत ने पहला अध्याय पूरा किया — साबित किया कि वह असाधारण रफ़्तार से साफ़ बिजली बना सकता है। दूसरा अध्याय कम चमकदार और ज़्यादा निर्णायक है: इन 288 गीगावॉट में से हर एक शाम सात बजे भी काम आए।

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