ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इंसानी अंतरिक्ष उड़ान याद प्रक्षेपण से रखी जाती है, पर तय उन जांचों से होती है जिनकी कोई तस्वीर नहीं खिंचती। इसरो ने बताया है कि गगनयान के क्रू मॉड्यूल की तीन बड़ी योग्यता जांचें सफलतापूर्वक पूरी हो गई हैं — इनमें समुद्र से मॉड्यूल की सुरक्षित बरामदगी और मॉड्यूल के अलग होने की व्यवस्था शामिल है। इनमें से कोई डाक टिकट पर नहीं छपेगी। लेकिन ये ठीक वही पड़ाव हैं जो तय करते हैं कि उड़ान उपलब्धि बनेगी या हादसा, क्योंकि ये वे पल हैं जहां यान को एक ही काम सही करना होता है और दूसरा मौक़ा नहीं मिलता।
कार्यक्रम की रफ़्तार जानबूझकर धीमी रखी गई है। पहली बिना चालक दल वाली परीक्षण उड़ान जी1 इस साल के आख़िर के आसपास प्रस्तावित है, जिसमें व्योममित्र नाम की अर्ध-मानवाकार रोबोट अंतरिक्ष यात्री की सीट पर बैठकर जीवन-रक्षक और सुरक्षा प्रणालियों को असली उड़ान में परखेगी। इसके बाद जी2 और जी3 उड़ानें होंगी। तभी, इन सबके सफल रहने पर, पहली मानवयुक्त उड़ान का नंबर आएगा — फ़िलहाल 2027 की योजना है। सफल हुई तो भारत अपने ही यान से अपने नागरिकों को कक्षा में भेजने वाला चौथा देश होगा, सोवियत संघ, अमेरिका और चीन के बाद।
उड़ान से पहले जांच: इसरो के मुताबिक़ क्रू मॉड्यूल की तीन बड़ी जांचें पूरी हुईं — समुद्र से बरामदगी और मॉड्यूल अलग होने की प्रणालियां शामिल।
पहले सीट पर रोबोट बैठेगा, ताकि किसी इंसान को यह मुश्किल तरीक़े से न पता चले। यह सावधानी नहीं है — यह इंजीनियरिंग में जान की क़ीमत समझने का तरीक़ा है।
एक नज़र में
• पूरी हुईं: क्रू मॉड्यूल की तीन बड़ी योग्यता जांचें
• जी1: पहली बिना चालक दल की उड़ान, 2026 के आख़िर के आसपास, व्योममित्र के साथ
• क्रम: जी2 और जी3 उड़ानों के बाद ही मानवयुक्त मिशन
• लक्ष्य: 2027 में मानवयुक्त उड़ान; भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बनेगा
साफ़ कहना ज़रूरी है कि तारीख़ें पहले भी आगे बढ़ी हैं और आगे भी बढ़ सकती हैं। किसी रॉकेट को इंसान ले जाने लायक़ बनाना अंतरिक्ष एजेंसी का सबसे कठिन काम है, क्योंकि हर छोटे-बड़े हिस्से को उस कसौटी पर दोबारा परखना पड़ता है जहां नाकामी सिर्फ़ महंगी नहीं, नामंज़ूर होती है। ऐसे कार्यक्रम में देरी लापरवाही की निशानी नहीं होती — अक्सर इसका मतलब यह होता है कि किसी ने ख़राबी परीक्षण कक्ष में पकड़ ली, उड़ान में नहीं।
इसका फ़ायदा अभी से मिल रहा है। इंसानी उड़ान की तैयारी सामग्री, एवियोनिक्स, बैकअप प्रणालियों और गुणवत्ता जांच में जो सुधार करवाती है, वे उपग्रहों, प्रक्षेपण सेवाओं और इसरो के इर्द-गिर्द उभर रही निजी अंतरिक्ष कंपनियों तक पहुंचते हैं। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अब वैज्ञानिक शौक़ नहीं, एक गंभीर उद्योग है। आगे का सही रास्ता यही है कि परीक्षण अभियान को पूरा पैसा मिले, तारीख़ें हार्डवेयर तैयार होने से पहले घोषित न हों, और ये बिना चमक वाले पड़ाव जुड़ते जाएं। असली मिशन यही है।












