ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।अरहर की खेती में सफलता केवल जल्दी बुआई पर नहीं, बल्कि उन्नत किस्मों के चयन, वैज्ञानिक तकनीकों और समय पर फसल प्रबंधन करने पर निर्भर करती है। किसान जल्दी तैयार होने वाली किस्मों की जुलाई के अंत तक बुआई करके अच्छी उपज ले सकते हैं।
खरीफ में अरहर किसानों की भरोसेमंद दलहनी फसल मानी जाती है, जो कम लागत में अच्छी आमदनी देती है। अरहर की जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु नाइट्रोजन को स्थिर करके मिट्टी को उर्वर बनाते हैं। यूपी में अरहर की खेती करीब तीन लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होती है। कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए भी यह उपयुक्त फसल है। देश में अरहर की औसत उपज मात्र 6.8 क्विंटल/हेक्टेयर है, जो वास्तविक क्षमता से कम है।
मगर, असल अंतर बुआई की तारीख से नहीं, बल्कि सही किस्म के चयन से आता है। जून या मध्य जुलाई तक बुआई न हो पाए तो जुलाई के अंत तक कम अवधि वाली उन्नत किस्में चुनकर वैज्ञानिक विधि से अरहर की खेती कर सकते हैं। इस समय बोई गई फसल सर्दियों में पाला-घने कोहरे से बच जाती है व बंपर उत्पादन मिलता है।
अभी बुआई का सर्दियों में मिलेगा फायदा
जुलाई के अंत में बोई जाने वाली अरहर की कम अवधि की किस्में जल्दी तैयार हो जाती हैं। इनके सीमित वानस्पतिक विकास से पौधा विशालकाय नहीं होता और दाने सुडौल बनते हैं। अक्तूबर में आने वाले फूल सूंडी के प्रकोप से बचे रहते हैं। नवंबर-दिसंबर तक फसल कटने से जनवरी के पाले-कोहरे का खतरा भी नहीं रहता और बंपर पैदावार मिलती है। गेहूं की बुआई के लिए समय पर खेत भी खाली हो जाता है।
कम अवधि वाली किस्मों का करें चयन
अरहर की खेती के लिए 25 से 35 डिग्री तापमान व 600 से 1000 मिमी वर्षा उपयुक्त है। 125-145 दिन में पकने वाली कम अवधि की किस्में अपनाएं। इनमें उपास-120, पूसा अगेती, पूसा-74, पूसा-84, आईसीपीएल-88039, पूसा 991 व पूसा-992 शामिल हैं। इन किस्मों की जुलाई के बाद बुआई करेंगे तो आगे चलकर ठंड के महीनों में पौधों का वानस्पतिक विकास रुक जाएगा और पैदावार में भारी कमी हो सकती है।
राइजोबियम कल्चर से करें बीज उपचार
अरहर की फसल की अच्छी पैदावार के लिए बीजोपचार बेहद जरूरी होता है। किसान बुआई से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर और पीएसबी (फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया) से जरूर उपचारित करें। साथ ही ट्राइकोडर्मा विरिडे 5 से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से प्रयोग करें। इससे पौधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है और कई मिट्टी जनित रोगों से फसल को सुरक्षा मिलती है।
फफूंदजनित उकठा रोग से ऐसे बचाएं फसल
अधिक नमी और जलभराव के कारण अरहर में फफूंदजनित उकठा रोग फैल सकता है। रोग के लक्षण दिखें तो संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें। खेत से पानी की निकासी की व्यवस्था करें। रोग नियंत्रण के लिए पौधों की जड़ों के पास कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी या थायोफेनेट मिथाइल का 1 ग्रा./ली. पानी की दर से घोल बनाकर ड्रेचिंग करें। नियमित निगरानी से इन रोगों के प्रकोप को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
सही सिंचाई से बढ़ेगी पैदावार
अरहर सामान्यतः वर्षा आधारित फसल मानी जाती है, लेकिन लंबे समय तक बारिश न हो तो फूल आने और फलियां बनने के समय एक-एक जीवनरक्षक सिंचाई अवश्य करें। फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 20 से 25 दिन बाद और दूसरी 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए। इससे पौधों की बेहतर वृद्धि होती है और उत्पादन बढ़ता है।














