ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। तमिल कवि, उपन्यासकार और गीतकार आर. वैरामुत्तु को 60 वां ज्ञानपीठ पुरस्कार चिन्मय मिशन सभागार में विद्वान एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह ने प्रदान किया। 11 लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा वाला यह सम्मान उन्हें उनके 73वें जन्मदिन पर मिला।
‘साठवें ज्ञानपीठ ने मानो मुझे साठ ग्राम अमृत से भरी एक शीशी सौंप दी हो,’ वैरामुत्तु ने कहा। उन्होंने तमिल में भाषण दिया, जिसका सार हिंदी में प्रस्तुत किया गया। यह अमृत अकेले मेरा नहीं है। यह उन सभी महान साहित्यकारों का है जो मुझसे पहले आए।
14 मार्च 2026 को घोषित इस सम्मान के साथ वैरामुत्तु देश का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार पाने वाले तीसरे तमिल लेखक बन गए। उनसे पूर्व 1975 में अकिलन और 2002 में जयकांतन को यह सम्मान मिला था। दोनों उपन्यासकार थे। तमिल से वैरामुत्तु पहले रचनाकार हैं जिन्हें मुख्यतः कवि के रूप में यह सम्मान मिला है। मेरे विद्यालय ने मुझे अक्षर दिए और गरीबी ने ज्ञान का प्रकाश, उन्होंने सभा से कहा। दोनों ने मिलकर मुझे साहित्य का सेवक बना दिया।
एक जन्मदिन से जन्मा पुरस्कार
इस पुरस्कार की स्थापना उद्योगपति साहू शांति प्रसाद जैन और उनकी पत्नी रमा जैन ने भारतीय ज्ञानपीठ के माध्यम से की थी , जो 1944 में स्थापित एक सांस्कृतिक संगठन है। एक राष्ट्रीय साहित्यिक पुरस्कार का विचार उनके समक्ष रखा गया था। रमा जैन ने उसी वर्ष नवंबर में कोलकाता स्थित अपने निवास पर लेखकों को एकत्र किया और 2 अप्रैल 1962 को दिल्ली में लगभग 300 लेखकों ने बैठकर योजना को अंतिम रूप दिया।
वर्ष 1965 का पहला पुरस्कार मलयालम कवि जी. शंकर कुरुप को उनकी कृति ओडक्कु षल “बांस की बांसुरी” के लिए मिला। उन्हें 19 नवंबर 1966 को विज्ञान भवन में एक लाख रुपये प्रदान किए गए। आरंभ के सत्रह वर्षों तक ज्ञानपीठ किसी एक उत्कृष्ट कृति पर दिया जाता रहा। 1982 में अठारहवें पुरस्कार से चयन मंडल ने लेखक के संपूर्ण कृतित्व का मूल्यांकन आरंभ किया।
डूबे हुए गांव का कवि
वैरामुत्तु का जन्म 13 जुलाई 1953 को मेट्टूर में हुआ। लगभग साठ घरों की एक बस्ती, जो तब मदुरै जिले में थी और अब थेनी जिले में है। 1957 में वैगई बांध परियोजना ने उनका गांव अपने में समेट लिया और परिवार वडुगपट्टी चला आया।
यही जलमग्नता आगे चलकर उनके सर्वाधिक चर्चित उपन्यास ‘कल्लिक्क ाट्टु इदिगासम’ का विषय बनी, जिसे 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और जो अब तक 22 भाषाओं में पहुंच चुका है। उनका पहला काव्य संग्रह 1972 में आया, जब वे 19 वर्ष के थे। 1980 में निर्देशक भारती राजा उन्हें सिनेमा में लाए। साढ़े सात हजार से अधिक गीत और कविताएं लिखने के बाद आज उनके नाम सर्वश्रेष्ठ गीत के सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हैं, देश के किसी भी गीतकार से अधिक। इसके अतिरिक्त उन्हें 2003 में पद्मश्री और 2014 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
‘साहित्य के लिए एक विश्वविद्यालय’
पांच दशक की साहित्य यात्रा पर दृष्टि डालते हुए वैरामुत्तु ने सभा के समक्ष चार प्रश्न रखे- नई पीढ़ी में पठन-संस्कृति कैसे विकसित हो, भारतीय साहित्य को उसका वैश्विक स्थान कैसे मिले, तकनीक के इस युग में मातृभाषाएं कैसे जीवित रहें, और साहित्य को रोजमर्रा के जीवन से कैसे जोड़ा जाए।
उन्होंने कहा कि भारत में हर तकनीक के लिए विश्वविद्यालय है; साहित्य के लिए भी एक होना चाहिए।














