ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत में प्रतियोगी और अकादमिक परीक्षाएं करोड़ों युवाओं के लिए केवल रोजगार या उच्च शिक्षा का जरिया नहीं हैं बल्कि यह उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान का एकमात्र रास्ता हैं। जब इन परीक्षाओं के पेपर लीक होते हैं, तो केवल एक प्रश्नपत्र नहीं बिकता, बल्कि लाखों परिवारों के सपने, उनकी वर्षों की मेहनत और देश की पूरी व्यवस्था पर से भरोसा टूट जाता है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) और यूजीसी-नेट को लेकर पूरे देश में भारी हंगामा हुआ। संसद से लेकर सड़कों तक विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरा जो कि लोकतंत्र में एक सजग विपक्ष का स्वाभाविक कर्तव्य भी है लेकिन जब यही संकट गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे कर्नाटक, पंजाब और झारखंड में सामने आता है तो विपक्ष की यह मुखरता अचानक एक सुविधाजनक मौन या लचर बहानों में बदल जाती है। राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से चुनी गई यह चयनात्मक संवेदनशीलता और दोहरा मानदंड युवाओं के भविष्य के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ है।
राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश बनाम राज्यों में चुप्पी
नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के आरोपों पर विपक्ष का आक्रामक होना पूरी तरह तर्कसंगत था। राष्ट्रीय स्तर की इस परीक्षा में लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर था और केंद्रीय एजेंसियों की विफलता पर सवाल उठना लाजिमी था लेकिन नैतिक और राजनीतिक संकट तब खड़ा होता है जब ठीक वैसी ही या उससे भी अधिक गंभीर धांधलियां कर्नाटक, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों में होती हैं और वहां विपक्ष या तो मौन साध लेता है या फिर पूरी घटना को दबाने की कोशिश करता है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि विश्वसनीयता केवल सवाल उठाने से नहीं, बल्कि एक समान मापदंड अपनाने से आती है।
उदाहरण के लिए, झारखंड में ‘झारखंड सामान्य स्नातक योग्यताधारी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा’ (जेएसएससी-सीजीएल) का पेपर लीक होना एक बहुत बड़ी त्रासदी थी। इसके बाद उपजे आक्रोश और राज्य सरकार की ढिलाई ने लाखों युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया। इसी तरह, पंजाब और कर्नाटक में भी सरकारी भर्तियों और शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और लीक के गंभीर मामले सामने आए हैं। कर्नाटक में केपीटीसीएल भर्ती और पुलिस सब-इंस्पेक्टर घोटाले ने पूरे तंत्र की कमियों को उजागर किया था। इन राज्यों में जब छात्र सड़कों पर लाठियां खा रहे थे, तब राष्ट्रीय स्तर पर पेपर लीक को ‘राष्ट्रीय संकट’ बताने वाले नेता अपने ही राज्यों की व्यवस्था पर आत्ममंथन करने के बजाय बगलें झांकते नजर आए।
दोषारोपण की राजनीति और संघीय ढांचे का बहाना
विपक्ष के इस दोहरे मानदंड के पीछे विशुद्ध रूप से चुनावी और राजनीतिक हित छिपे हैं। जब मामला राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का होता है, तो विपक्ष इसे सीधे प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की नीतिगत विफलता से जोड़ देता है लेकिन जब बात उनके अपने प्रभाव या गठबंधन वाले राज्यों की आती है तो इसे ‘प्रशासनिक चूक’ या ‘स्थानीय स्तर के अपराधियों की साजिश’ बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। यह प्रवृत्ति इस कड़वे सच को उजागर करती है कि राजनीतिक दलों के लिए युवाओं का भविष्य एक साझा राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बल्कि सरकार को घेरने का एक राजनीतिक हथियार मात्र है। यदि विपक्ष वास्तव में परीक्षाओं की शुचिता को लेकर चिंतित होता तो वह अपने शासित राज्यों में एक ऐसा कड़ा और पारदर्शी मॉडल स्थापित करता जो केंद्र सरकार के लिए एक मिसाल बनता।
छात्रों के विश्वास और देश के भविष्य पर चोट
पेपर लीक की घटनाएं चाहे नई दिल्ली से संचालित हो रही हों, रांची से, बेंगलुरु से या चंडीगढ़ से; इनका शिकार होने वाला छात्र हमेशा एक ही होता है। वह छात्र किसी राजनीतिक दल का वोटर होने से पहले इस देश का नागरिक है जिसने दिन-रात एक करके पढ़ाई की है। जब विपक्षी दल इस मुद्दे पर ‘चुनिंदा आक्रोश’ दिखाते हैं तो वे अनजाने में उस पूरे आपराधिक तंत्र को ऑक्सीजन दे रहे होते हैं जो पेपर लीक के पीछे सक्रिय है। यह दोहरा रवैया छात्रों के मन में पूरी लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा करता है।
राजनीति से ऊपर उठें
पेपर लीक व परीक्षाओं में धांधली राष्ट्रीय महामारी का रूप ले चुकी है। यह किसी एक दल की सरकार की विफलता नहीं बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र और प्रशासनिक ढांचे की सामूहिक सड़न का परिणाम है। इसका समाधान तब तक संभव नहीं जब तक कि राजनीतिक दल इस पर राजनीति करना बंद नहीं करते। विपक्ष को समझना होगा कि विश्वसनीयता केवल सवाल उठाने से नहीं, बल्कि समान मापदंड अपनाने से आती है। यदि नीट पर मंत्री का इस्तीफा हुआ तो राज्यों में पेपर लीक पर भी उतनी ही कड़ी कार्रवाई व जवाबदेही तय हो। युवाओं को एक ऐसे ‘जीरो टॉलरेंस’ मॉडल की जरूरत है जहां पेपर लीक करने वालों को देशद्रोही की श्रेणी में रखकर सजा दी जाए, चाहे वे किसी भी राज्य में सक्रिय हों।














