ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने कहा है कि भारत को रुपए में गिरावट रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय उसे मार्केट के हिसाब से अपना स्तर तय करने देना चाहिए। वहीं हमारा मुख्य फोकस महंगाई दर को कंट्रोल में रखने पर होना चाहिए।
सान्याल ने कहा कि जब देश ने इन्फ्लेशन टारगेटिंग फ्रेमवर्क को अपनाया था, तब उसने करेंसी एक्सचेंज रेट के ऊपर मॉनेटरी पॉलिसी को चुना था।
महंगाई कंट्रोल करना प्राथमिक लक्ष्य
संजीव सान्याल ने बताया कि ओपन कैपिटल अकाउंट वाली अर्थव्यवस्थाओं में पॉलिसी मेकर्स के सामने कई चुनौतियां होती हैं। भारत का फ्रेमवर्क इस सिद्धांत पर आधारित है कि कोई भी देश एक साथ स्वतंत्र मॉनेटरी पॉलिसी चलाने और अपनी करेंसी की विनिमय दर को सख्ती से कंट्रोल करने का काम नहीं कर सकता। भारत जैसे बड़े और आंतरिक रूप से मजबूत देश के लिए रुपए की दर तय करने के बजाय महंगाई दर को लक्षित करना ही सही कदम है।
इन्फ्लेशन टारगेटिंग फ्रेमवर्क की सफलता
सान्याल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को रुपए के स्तर में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन्फ्लेशन टारगेटिंग सिस्टम ने देश में बहुत अच्छा काम किया है।
एक समय था जब भारत में महंगाई दर 8% से 12% के दायरे में रहती थी, जबकि पिछले एक दशक में यह सफलतापूर्वक घटकर 2% से 6% के दायरे में आ गई है।
विदेशी मुद्रा भंडार का सही इस्तेमाल
संजीव सान्याल ने यह भी कहा कि रुपए को बाजार के भरोसे छोड़ने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि केंद्रीय बैंक या संबंधित अधिकारी पूरी तरह चुप बैठेंगे।
उन्होंने कहा कि फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल करेंसी में होने वाले अचानक या तेज उतार-चढ़ाव की रफ्तार को धीमा करने और झटकों को संभालने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग रुपए को उसके स्वाभाविक स्तर पर पहुंचने से रोकने के लिए नहीं होना चाहिए।
कमजोर रुपए से एक्सपोर्टर्स को फायदा
सान्याल ने बताया कि रुपए का कमजोर होना अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा नुकसानदायक होता है। यदि देश में महंगाई दर कंट्रोल रहती है, तो रुपए में गिरावट से भारतीय एक्सपोर्टर्स को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है। दुनिया के कई देशों की करेंसी में काफी उतार-चढ़ाव आता रहता है, इसलिए अगर घरेलू स्तर पर कीमतें स्थिर हैं, तो कमजोर रुपया अर्थव्यवस्था के लिए रुकावट नहीं बनता।
अलग है भारत का दृष्टिकोण
मुख्य चिंता यह होनी चाहिए कि क्या करेंसी में आ रही गिरावट से महंगाई बढ़ रही है। यदि महंगाई कंट्रोल में है और जरूरत पड़ने पर ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं, तो रुपए को जबरन बचाना सही तरीका नहीं है।














