44 साल बाद हॉकी में बेटियों का सोना
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर । भारत की महिला हॉकी टीम 1982 के बाद पहली बार एशियाई खेलों की चैंपियन बनी है। जापान के गिफू में खेले गए फाइनल में भारत ने चीन को 1-0 से हराया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने 2 अक्टूब की विज्ञप्ति में कहा कि यह सोना “चार दशक से ज्यादा” के बाद आया है।
गोल दसवें मिनट में लालरेमसियामी ने किया। उसके बाद पचास मिनट तक चीन की टीम बराबरी नहीं कर सकी। चीन इस स्पर्धा की मौजूदा चैंपियन थी।
एक मैच से मिला दो साल का चैन
एशियाई खेलों का हॉकी स्वर्ण ओलंपिक का सीधा टिकट है। जो टीम जीतती है, उसे क्वालीफायर नहीं खेलना पड़ता। पेरिस 2024 के लिए भारत की बेटियां रांची के क्वालीफायर में चूक गई थीं और ओलंपिक नहीं खेल पाई थीं। अब 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक में भारत एशियाई चैंपियन के तौर पर जाएगा।
इसका मतलब सीधा है। अगले दो साल टीम बनाने में लगेंगे, टिकट बचाने की दौड़ में नहीं।
दो बार फाइनल हारे, तीसरी बार जीते
महिला हॉकी 1982 में नई दिल्ली के एशियाई खेलों में पहली बार शामिल हुई थी और भारत ने तभी सोना जीता था। उसके बाद भारत दो बार फाइनल में पहुंचा और दोनों बार हारा — 1998 में दक्षिण कोरिया से, 2018 में जापान से। इस बार एक गोल काफी रहा।
प्रधानमंत्री ने जीत को “शानदार कौशल और टीमवर्क” का नतीजा बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस सफलता से देश में हॉकी की लोकप्रियता बढ़ेगी।
एक दिन में छह सोने
2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री कार्यालय ने दोपहर 1:18 से शाम 7:22 बजे के बीच दस बधाई-विज्ञप्तियां जारी कीं। यही उस दिन का हिसाब है। मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन (75 किलो), परवीन (65 किलो) और अंकुश (80 किलो) ने सोना जीता। कुश्ती में सुजीत ने 65 किलो फ्रीस्टाइल में अपने पहले ही एशियाई खेलों में सोना जीता। तीरंदाजी में अंकिता भकत, कुमकुम अनिल मोहोड और कीर्ति की महिला रिकर्व टीम ने पहली बार सोना जीता। और छठा सोना हॉकी का।
इनके साथ धीरज बोम्मादेवरा और कुमकुम मोहोड को मिश्रित रिकर्व में रजत मिला। हर्षिता तोमर और शीतल वर्मा को नौकायन की स्किफ स्पर्धा में, नेत्रा कुमानन को डिंगी में और पुरुष सेपकटकरा टीम को कांस्य मिला। सेपकटकरा में यह भारत का पहला पदक है।
गिनिए तो दिन में दस पदक
छह सोना, एक रजत, तीन कांस्य। इनमें से सात पदक बेटियों के नाम हैं।
एक नजर में
•फाइनल : भारत 1, चीन 0 — महिला हॉकी, •एशियाई खेल, आइची-नागोया 2026
•गोल : लालरेमसियामी, 10वां मिनट
•पिछला सोना : 1982, नई दिल्ली
•हारे हुए फाइनल : 1998 (दक्षिण कोरिया से), 2018 (जापान से)
•इनाम : लॉस एंजिलिस 2028 ओलंपिक का सीधा टिकट
तुलना
• 2 अक्टूबर को पीएमओ की विज्ञप्तियों में पदक : 10 — पूरा दिन
• इनमें सोना : 6 — दिन का 60%
•बेटियों के पदक : 7 — दिन का 70%
•दिन के दस में छह पदक सोने के थे, और सात बेटियों के।
हमारा हिसाब
2026 − 1982 = 44 साल। 6 + 1 + 3 = 10 पदक; 6 ÷ 10 = 60% सोना।
• बेटियों के पदक : हॉकी, दो मुक्केबाजी, तीरंदाजी टीम, मिश्रित रिकर्व (साझा), स्किफ, डिंगी = 7; 7 ÷ 10 = 70%।
भारत को क्या मिला
ओलंपिक की जगह दो साल पहले पक्की, और एक ऐसी टीम जिसने फाइनल में चैंपियन को हराया है।
ब्लिट्ज की सराहना
लालरेमसियामी और भारतीय महिला हॉकी टीम, और हॉकी इंडिया का कोचिंग स्टाफ।
आंकड़े प्रधानमंत्री कार्यालय की 2 अक्टूबर की विज्ञप्तियों (रिलीज आईडी 2318112-14, 2318262-73, 2318340) से। स्कोर द ट्रिब्यून और नेशनल हेराल्ड की 2 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
गिफू के सोने और अगलेअसोने के बीच की दूरी एक घरेलू लीग है, जिसका कैलेंडर तय हो। हॉकी इंडिया इसी महीने लॉस एंजिलिस तक के दो सीजन की महिला फिक्स्चर सूची जारी कर सकता है। तब हर खिलाड़ी को पता होगा कि उसके अगले चालीस मैच कहां हैं।
रिंग में तीन सोने, कुश्ती में एक
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। 2 अक्टूबर को भारत के छह में से तीन सोने मुक्केबाजी की रिंग से आए। लवलीना बोरगोहेन ने महिलाओं के 75 किलो फाइनल में 5-0 से जीत दर्ज की। प्रधानमंत्री कार्यालय ने 2 अक्टूबर की विज्ञप्ति में इसे “दमदार” जीत कहा। परवीन ने 65 किलो और अंकुश ने पुरुषों के 80 किलो वर्ग में सोना जीता।
चौथा सोना कुश्ती से आया। सुजीत ने पुरुषों के 65 किलो फ्रीस्टाइल में अपने पहले एशियाई खेलों में सोना जीता। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक यह इस एशियाई खेलों में भारत का पहला कुश्ती स्वर्ण है।
एक दिन में तीन मुक्केबाजी स्वर्ण किसी एक खिलाड़ी की नहीं, पूरी टीम की गहराई की बात है। लवलीना का पदक अनुभव का है; परवीन और अंकुश के पदक बताते हैं कि अगली पीढ़ी तैयार है।
एक नजर में
•लवलीना बोरगोहेन : सोना, महिला 75 किलो मुक्केबाजी, फाइनल 5-0
•परवीन : सोना, महिला 65 किलो मुक्केबाजी
•अंकुश : सोना, पुरुष 80 किलो मुक्केबाजी
•सुजीत : सोना, पुरुष 65 किलो फ्रीस्टाइल कुश्ती, पहले एशियाई खेल
•आंकड़े प्रधानमंत्री कार्यालय की 2 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्तियों (रिलीज आईडी 2318262, 2318269, 2318272, 2318273) से; pib.gov.in पर जांचे।
पंचायतों को पांच साल में 4.35 लाख करोड़
गांधी जयंती पर 2.42 लाख गांवों में ग्राम सभा बैठी और अगले साल की योजना लिखनी शुरू की; पैसा पिछली बार से 84 फीसदी ज्यादा।
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। आपके गांव की अगली योजना इसी महीने लिखी जा रही है, और उसे पूरा करने का पैसा तय हो चुका है। 16वें वित्त आयोग ने 2026 से 2031 तक ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये की सिफारिश की है। पंचायती राज मंत्रालय ने 2 अक्टूबर की विज्ञप्ति में बताया कि यह पिछले आयोग से 84 फीसदी ज्यादा है।
इसी दिन देश भर में 2.42 लाख से ज्यादा विशेष ग्राम सभाएं बैठीं। इनसे “सबकी योजना, सबका विकास” नाम का जन योजना अभियान 2026-27 शुरू हुआ। हर पंचायत अब 2027-28 की अपनी विकास योजना बनाएगी।
हर साल करीब 87 हजार करोड़
84 फीसदी बढ़त को उलटकर देखें तो पिछले आयोग की रकम करीब 2.36 लाख करोड़ रुपये बैठती है। यानी इस बार पांच साल में करीब 1.99 लाख करोड़ रुपये ज्यादा। पांच साल में बांटें तो देश की सारी पंचायतों को हर साल करीब 87 हजार करोड़ रुपये मिलेंगे।
ग्राम सभा में क्या गिनाया गया
मंत्रालय के मुताबिक सभाओं में देश के आंकड़े रखे गए। स्वामित्व योजना में 3.33 करोड़ प्रॉपर्टी कार्ड बन चुके हैं। 16 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण घरों में नल का पानी है, यानी 80 फीसदी से ऊपर। स्वच्छ भारत मिशन में 12.22 करोड़ शौचालय बने। भूजल बचाने के 1.55 करोड़ ढांचे बने। एक राष्ट्र एक राशन कार्ड में हर महीने 3.27 करोड़ लेनदेन दूसरी दुकान से होते हैं। मुफ्त अनाज 81.35 करोड़ लोगों को मिलता है।
ये देश के आंकड़े हैं। गांव में इन्हें पढ़कर सुनाने का मकसद यह है कि गांव पूछे — इनमें से हमारे पास क्या है, क्या नहीं। योजना इसी सवाल से बनती है।
पहले योजना, फिर पैसा
अभियान में योजना पैसा आने से डेढ़ साल पहले बनती है। अक्टूबर 2026 की सभाएं 2027-28 की योजना लिखेंगी। जो पंचायत पहले योजना बनाती है और बाद में पैसा पाती है, वह अपनी चुनी चीज पर खर्च करती है। जो पहले पैसा पाती है, वह जो आ गया उस पर। यही क्रम असली सुधार है।
एक नजर में
•2 अक्टूबर को विशेष ग्राम सभाएं : 2.42 लाख से ज्यादा
•16वें वित्त आयोग का अनुदान, 2026-31 : 4,35,236 करोड़ रुपये
पिछले आयोग से बढ़त : 84%
•नल वाले ग्रामीण घर : 16 करोड़ से ज्यादा, 80% से ऊपर
•स्वच्छ भारत में बने शौचालय : 12.22 करोड़
तुलना
• 16वें वित्त आयोग का अनुदान : 4,35,236 करोड़ रुपये — 100%
•पिछला अनुदान (84% से उलटकर) : करीब 2,36,500 करोड़ रुपये — 54%
•नया पांच साल का अनुदान पिछले से 84% बड़ा है।
हमारा हिसाब
4,35,236 ÷ 1.84 = 2,36,541, यानी पिछला अनुदान करीब 2,36,500 करोड़ रुपये। 4,35,236 − 2,36,541 = 1,98,695 करोड़ रुपये की बढ़त। 4,35,236 ÷ 5 = 87,047 करोड़ रुपये सालाना।
भारत को क्या मिला
गांव में पहले लिखी गई योजना, और उसे पूरा करने को हर साल करीब 87 हजार करोड़ रुपये।
ब्लिट्ज की सराहना
पंचायती राज मंत्रालय, और एक ही दिन बैठीं 2.42 लाख पंचायतों के चुने हुए सदस्य और सचिव।
आंकड़े पंचायती राज मंत्रालय की 2 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2318441) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
मंत्रालय हर पंचायत की मंजूर योजना और उसे मिली रकम एक ही जगह, पंचायतवार छाप सकता है। तब गांव का आदमी
एक नजर में
देख सकेगा कि क्या मांगा था और क्या मिला।
9वीं की छात्रवृत्ति, 31 अक्टूबर तक मौका
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। आपके घर का कोई बच्चा सरकारी या सरकारी मदद वाले स्कूल में 9वीं में है? 7वीं में 55 फीसदी नंबर लाया था और घर की सालाना कमाई 3.50 लाख रुपये से कम है? तो 31 अक्टूबर तक आवेदन कर दीजिए। शिक्षा मंत्रालय ने 1 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति में नेशनल मीन्स-कम-मेरिट स्कॉलरशिप की आखिरी तारीख बढ़ा दी है।
छात्रवृत्ति 12 हजार रुपये सालाना की है और 12वीं तक मिलती है। पैसा सीधे बच्चे के बैंक खाते में आता है। हर साल एक लाख नई छात्रवृत्तियां दी जाती हैं, राज्य की चयन परीक्षा पास करने वालों को। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों को नंबरों में 5 फीसदी की छूट है।
30 सितंबर तक पोर्टल पर 88,522 नए और करीब 1.97 लाख नवीनीकरण के आवेदन आए थे। कुल करीब 2.86 लाख। ध्यान देने वाला आंकड़ा नया वाला है। एक लाख नई छात्रवृत्तियां बंटनी हैं और नए आवेदन अभी 88,522 ही हैं। यानी एक महीना उन बच्चों को ढूंढने का है जो हकदार हैं पर जिन्होंने भरा नहीं।
स्कूल स्तर पर जांच 15 नवंबर तक और जिला स्तर पर 30 नवंबर तक होगी। आवेदन नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल पर होता है, पहले वन-टाइम रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है।
एक नजर में
•नई आखिरी तारीख : 31 अक्टूबर 2026; •स्कूल जांच 15 नवंबर, जिला जांच 30 नवंबर
•छात्रवृत्ति : 12,000 रुपये सालाना, 9वीं से 12वीं तक; हर साल एक लाख
•शर्त : 7वीं में 55% (एससी-एसटी को 50%), घर की कमाई 3.50 लाख रुपये तक
•30 सितंबर 2026 तक आवेदन : 88,522 नए, 1,97,133 नवीनीकरण
तुलना
हर साल की नई छात्रवृत्तियां : 1,00,000 — 100%
अब तक के नए आवेदन : •88,522 — उपलब्ध छात्रवृत्तियों का 89%
•नए आवेदन नई छात्रवृत्तियों से अभी 11% पीछे हैं।
हमारा हिसाब
88,522 + 1,97,133 = 2,85,655 आवेदन; 88,522 ÷ 1,00,000 = 88.5%; 1,00,000 × 12,000 रुपये = 120 करोड़ रुपये सालाना की नई छात्रवृत्तियां।
भारत को क्या मिला
उस बच्चे के लिए चार साल तक 12 हजार रुपये, जिसका घर 8वीं के बाद पढ़ाई का खर्च तौलता है।
ब्लिट्ज की सराहना
शिक्षा मंत्रालय, जिसने सिर्फ तारीख नहीं, आवेदनों की गिनती भी साथ छापी।
आंकड़े शिक्षा मंत्रालय की 1 अक्टूबर की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2317657) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
राज्यों के शिक्षा विभाग 7वीं के नतीजों से हकदार बच्चों की सूची इसी महीने हर सरकारी और सहायता-प्राप्त स्कूल को भेज सकते हैं। तब आवेदन स्कूल कराएगा, परिवार पर नहीं छूटेगा।
किसानों को कर्ज बढ़ा, जमा पर ब्याज घटा
मुंबई, 3 अक्टूबर। बैंक से कर्ज लेना आसान हुआ है, पर जमा पर ब्याज कम मिल रहा है। रिजर्व बैंक के 30 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त तक एक साल में बैंकों का कुल गैर-खाद्य कर्ज 18.8 फीसदी बढ़ा। एक साल पहले यह बढ़त 10.2 फीसदी थी।
खेती और उससे जुड़े कामों को कर्ज 17.2 फीसदी बढ़ा, पिछले साल के 7.6 फीसदी के मुकाबले दोगुने से ज्यादा रफ्तार से। उद्योग को कर्ज 18.2 फीसदी बढ़ा, सेवाओं को 24.3 फीसदी और निजी कर्ज 16.9 फीसदी। घर और गाड़ी के कर्ज दहाई अंक में बढ़ते रहे, जबकि क्रेडिट कार्ड और सोने के गहनों पर कर्ज की रफ्तार धीमी पड़ी।
जेब पर क्या असर
रिजर्व बैंक की उसी दिन की दूसरी विज्ञप्ति ब्याज दरों की है। अगस्त में नए कर्ज पर औसत ब्याज 8.61 फीसदी रहा, जुलाई में 8.52 फीसदी था। वहीं नई सावधि जमा पर औसत ब्याज 5.67 फीसदी रहा, जुलाई के 5.85 फीसदी से कम। यानी एक महीने में कर्ज 9 बेसिस पॉइंट महंगा हुआ और जमा 18 बेसिस पॉइंट सस्ती। (एक बेसिस पॉइंट = 0.01 फीसदी।)
दोनों के बीच का फासला, जिसे बैंक की कमाई का हाशिया कह सकते हैं, 2.67 से बढ़कर 2.94 फीसदी अंक हो गया। पुराने कर्ज और पुरानी जमा पर यह फासला 2.40 अंक है।
रेपो रेट से जुड़े कर्ज बढ़े
जून 2026 के अंत तक बैंकों के 68.2 फीसदी फ्लोटिंग कर्ज बाहरी बेंचमार्क, यानी ज्यादातर रेपो रेट, से जुड़े थे। मार्च में यह 67.6 फीसदी था। बैंकों के अपने एमसीएलआर से जुड़े कर्ज 29.6 फीसदी रह गए। इसका मतलब यह है कि रिजर्व बैंक जब दर घटाएगा, तो दो-तिहाई कर्जदारों की किस्त अगली रीसेट तारीख पर अपने आप घटेगी।
एक बात आंकड़ा पढ़ते वक्त याद रखनी होगी। रिजर्व बैंक ने बताया है कि इस बार
तुलना
5 सितंबर 2025 के पखवाड़े से है। वजह यह कि बैंकिंग कानून संशोधन 2025 के बाद 31 दिसंबर 2025 से पखवाड़े की परिभाषा बदली है। आंकड़े 41 बैंकों के हैं, जो कुल कर्ज का करीब 95 फीसदी देते हैं।
एक नजर में
• गैर-खाद्य कर्ज की सालाना बढ़त, अगस्त 2026 : 18.8%; एक साल पहले 10.2%
•खेती : 17.2% (पहले 7.6%)
•उद्योग : 18.2% (7.0%)
•सेवाएं : 24.3% (10.3%
•निजी कर्ज : 16.9% (11.9%)
•नए कर्ज पर औसत ब्याज : अगस्त 8.61%, •जुलाई 8.52%
•नई जमा पर औसत ब्याज : अगस्त 5.67%, •जुलाई 5.85%
•रेपो से जुड़े फ्लोटिंग कर्ज : 68.2% (जून 2026 अंत)
तुलना
•सेवाओं को कर्ज की बढ़त : 24.3% — सबसे तेज, 100%
•उद्योग : 18.2% — सेवाओं की रफ्तार का 75%
•खेती : 17.2% — 71%
•निजी कर्ज : 16.9% — 70%
•सेवाओं को कर्ज निजी कर्ज से 7.4 अंक तेज बढ़ा।
हमारा हिसाब
18.8 − 10.2 = 8.6 अंक की बढ़त। खेती : 17.2 ÷ 7.6 = 2.26 गुना। कर्ज-जमा का फासला : 8.61 − 5.67 = 2.94; जुलाई में 8.52 − 5.85 = 2.67; फर्क 0.27 अंक। पुराने कारोबार पर 8.96 − 6.56 = 2.40।
भारत को क्या मिला
खेत और कारखाने तक पहुंचता कर्ज, और ऐसा बैंकिंग ढांचा जिसमें रेपो की कटौती दो-तिहाई कर्जदारों तक सीधे पहुंचे।
ब्लिट्ज की सराहना
रिजर्व बैंक, जिसने बदली हुई
तुलना
-तारीख विज्ञप्ति में ही साफ लिखी।
आंकड़े रिजर्व बैंक की 30 सितंबर की दो विज्ञप्तियों — बैंक कर्ज का क्षेत्रवार वितरण, अगस्त 2026; और बैंकों की कर्ज-जमा दरें, सितंबर 2026 — से; rbi.org.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
बैंक हर फ्लोटिंग कर्ज के स्टेटमेंट पर अगली रीसेट तारीख छाप सकते हैं, ताकि कर्जदार को पता हो कि रेपो में बदलाव उसकी किस्त तक किस महीने पहुंचेगा।
3 लाख सब्सिडी, हर इकाई में 9 नौकरियां
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर।अपना काम शुरू करने वालों के लिए एक आंकड़ा। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) में 2014-15 से अब तक 8.12 लाख छोटे उद्यमों को मदद मिली है। एमएसएमई मंत्रालय ने 2 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति में बताया कि इन पर 24,398.61 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी सब्सिडी दी गई और करीब 73.08 लाख रोजगार बने।
ब्लिट्ज ने इसे प्रति इकाई बांटा। हर उद्यम पर करीब 3 लाख रुपये की सब्सिडी गई, और हर उद्यम में औसतन 9 लोगों को काम मिला। सब्सिडी बैंक कर्ज का वह हिस्सा है जो उद्यमी को लौटाना नहीं पड़ता। इसी से वह कर्ज मंजूर हो पाता है जिसे बैंक वरना मना कर देता।

दो कहानियां, दो कर्ज
विज्ञप्ति में दो उदाहरण हैं। स्किनकांति आयुर्वेद ने स्टेट बैंक से 25 लाख रुपये के प्रोजेक्ट से शुरुआत की। आज उसका सालाना कारोबार 30 करोड़ रुपये है, 300 कर्मचारी हैं और उनमें 95 फीसदी महिलाएं। मोहाली की एस पी क्वालिटी प्रोडक्ट्स ने बैंक ऑफ बड़ौदा से 21 लाख रुपये के प्रोजेक्ट से शुरू किया। आज कारोबार 38 करोड़ रुपये, करीब 130 कर्मचारी और 26 देशों को निर्यात।
ये दो उदाहरण 8.12 लाख में से दो हैं। 9 नौकरियों का आंकड़ा भी मंत्रालय का अनुमान है, गिनती नहीं। जो बात प्रति इकाई हिसाब पक्के तौर पर बताता है, वह लागत है — 3 लाख रुपये में एक कारोबार खड़ा करना सस्ता सौदा है। असली सवाल यह है कि इनमें से कितने तीन साल बाद चल रहे हैं।
एक नजर में
•2014-15 से मदद पाए उद्यम : 8.12 लाख
•मार्जिन मनी सब्सिडी : 24,398.61 करोड़ रुपये
•रोजगार, मंत्रालय का अनुमान : करीब 73.08 लाख
•स्किनकांति आयुर्वेद : 25 लाख रुपये का प्रोजेक्ट; 30 करोड़ रुपये कारोबार; 300 कर्मचारी, 95% महिलाएं
•एस पी क्वालिटी प्रोडक्ट्स, मोहाली : 21 लाख रुपये का प्रोजेक्ट; 38 करोड़ रुपये कारोबार; करीब 130 कर्मचारी; 26 देश
तुलना
एस पी का कारोबार : 38 करोड़ रुपये — दोनों में बड़ा, 100%
स्किनकांति का कारोबार : 30 करोड़ रुपये — एस पी का 79%
छोटे प्रोजेक्ट से शुरू होकर एस पी का कारोबार स्किनकांति से 27% बड़ा है।
हमारा हिसाब
24,398.61 करोड़ ÷ 8.12 लाख = 3.00 लाख रुपये प्रति उद्यम। 73.08 लाख ÷ 8.12 लाख = 9.0 नौकरियां प्रति उद्यम। 30 करोड़ ÷ 25 लाख = 120 गुना; 38 करोड़ ÷ 21 लाख = 181 गुना। सब ब्लिट्ज का हिसाब, मंत्रालय के आंकड़ों से।
भारत को क्या मिला
बिना गारंटी वाले पहली बार के उद्यमी के लिए बैंक कर्ज का रास्ता, करीब 3 लाख रुपये की सरकारी लागत पर।
ब्लिट्ज की सराहना
खादी और ग्रामोद्योग आयोग, जो यह कार्यक्रम चलाता है, और विज्ञप्ति में नामजद दोनों बैंक।
आंकड़े एमएसएमई मंत्रालय की 2 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2318369) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
मंत्रालय राज्यवार यह छाप सकता है कि पीएमईजीपी की कितनी इकाइयां तीन साल बाद चल रही हैं। यही आंकड़ा बैंक को अगला कर्ज तय करने देगा और पाठक को 9 नौकरियों को परखने देगा।
अनाज गोदामों में अब गैस से मरेंगे कीड़े
लुधियाना, 3 अक्टूबर। देश का गेहूं खाने वाला कीड़ा उस जहर को झेलना सीख गया है जो उसे मारने के लिए डाला जाता है। इसलिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने 30 सितंबर को एक समझौता किया है। कृषि मंत्रालय ने 1 अक्टूबर की विज्ञप्ति में बताया कि गोदामों में रखे गेहूं-चावल के लिए फ्यूमिगेशन, यानी गैस से कीट मारने, के नए तरीकों पर शोध होगा।
वजह विज्ञप्ति के अपने शब्दों में है। एल्युमीनियम फॉस्फाइड के खिलाफ कीटों की प्रतिरोधक क्षमता “प्रमुख भारतीय राज्यों में 72-100 फीसदी” तक पहुंच गई है। मतलब, जहां हालत सबसे अच्छी है वहां भी दस में से तीन से कम कीड़े पुराने रसायन से मरते हैं।

पुराना रसायन क्यों फेल हुआ
दशकों से देश का अनाज भंडार दो रसायनों पर टिका रहा — एल्युमीनियम फॉस्फाइड और मैलाथियान। बार-बार इस्तेमाल से ऐसे कीड़े पनपे जो इन्हें झेल जाते हैं। नतीजा यह कि गोदामों में बार-बार गैस देनी पड़ती है, खर्च बढ़ता है, और गैस देने वाले मजदूरों की सांस पर खतरा रहता है। यह खतरा मंत्रालय ने खुद गिनाया है।
तीन गैस, तीन तरह के गोदाम
दो साल के पहले चरण में तीन परीक्षण होंगे, और हर एक गोदाम की बनावट के हिसाब से है। धातु के साइलो में रखे गेहूं पर 99 फीसदी से ज्यादा शुद्ध नाइट्रोजन आजमाई जाएगी, क्योंकि साइलो को इतना बंद किया जा सकता है कि गैस टिके। एफसीआई और केंद्रीय भंडारण निगम के गोदामों में बोरियों में रखे गेहूं-चावल पर कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन साथ में। और हवाबंद चादर में लिपटी बोरियों पर अकेली कार्बन डाइऑक्साइड।
विज्ञान सीधा है। कीड़े सांस लेते हैं। अनाज के आसपास की हवा की जगह नाइट्रोजन या कार्बन डाइऑक्साइड भर दीजिए, तो वे सांस नहीं ले पाते। जहर के खिलाफ कीड़ा ढल सकता है, हवा के न होने के खिलाफ नहीं। इसीलिए 72 से 100 फीसदी का आंकड़ा नए रसायन की नहीं, गैस की दलील है।
परीक्षण को यह साबित नहीं करना कि तरीका काम करता है। यह साबित करना है कि देश के भंडार के पैमाने पर, इन्हीं इमारतों में और किफायती दाम पर काम करता है।
समझौते से नियम-पुस्तिका तक
पहले चरण के बाद एक साल का दूसरा चरण होगा, जिसमें अलग-अलग जलवायु वाले इलाकों में परीक्षण होंगे और हर क्षेत्र के लिए काम करने का तरीका लिखा जाएगा।
ओडिशा में माल चला, बिल बना, टैक्स नहीं
भुवनेश्वर, 3 अक्टूबर। ई-वे बिल वह कागज है जो ट्रक के साथ चलता है और बताता है कि माल पर जीएसटी का हिसाब दर्ज है। ओडिशा में अप्रैल 2018 से मार्च 2022 के बीच बाहर भेजे माल के करीब 4.19 करोड़ ई-वे बिल बने। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की ओडिशा सरकार पर राजस्व क्षेत्र की रिपोर्ट संख्या 1, 2026 ने जांचा कि यह व्यवस्था सरकार का राजस्व बचा पाई या नहीं। रिपोर्ट 28 सितंबर 2026 को राज्य विधानमंडल में रखी गई।
मुख्य बात पैरा 2.1.9.1 में है। छह कारोबारियों ने 79.81 करोड़ रुपये के माल के 2,340 ई-वे बिल बनाए, जिन पर 11.90 करोड़ रुपये का टैक्स बनता था। उन्होंने न जीएसटी रिटर्न भरा, न टैक्स दिया। माल चला गया, टैक्स नहीं आया।
जो गाड़ियां थीं ही नहीं
रिपोर्ट का सबसे तीखा पैरा गाड़ियों पर है। पैरा 2.1.9.7 के मुताबिक 14 कारोबारियों ने 80.30 करोड़ रुपये के माल के 1,113 ई-वे बिल 235 “संदिग्ध गाड़ियों” के नाम बनाए। ये गाड़ियां चोरी की, सरेंडर की हुई, रद या सस्पेंड थीं — या दोपहिया थीं। इन पर 13.78 करोड़ रुपये का टैक्स बनता था। दोपहिया के नाम पर ट्रक भर माल का बिल लिपिकीय चूक नहीं है। वह ऐसे माल का बिल है जो उस रास्ते गया ही नहीं। विभाग ने जुलाई 2024 में जवाब दिया कि ई-वे बिल पोर्टल वाहन रजिस्ट्री (वाहन) से जुड़ा है, पर कभी-कभी तालमेल में गड़बड़ी होती है।
छोटी बातें भी इसी ढर्रे की हैं। चार कारोबारियों ने रजिस्ट्रेशन रद होने के बाद 1.93 करोड़ रुपये के माल के 43 बिल बनाए। चार ने 5.59 करोड़ रुपये के माल के 96 बिल बनाए और रिटर्न में शून्य कारोबार दिखाया; विभाग ने कार्रवाई नहीं की। दो ने बिल में असली दूरी से 630 फीसदी दूरी लिखी, जिससे एक ही बिल पर कई फेरे लग सकते हैं।
पकड़ने वालों के पास क्या था
पैरा 2.1.10 में कैग उन दस्तों पर आया जिन्हें यह सब पकड़ना था। संबलपुर-राउरकेला के 162 किलोमीटर के हाईवे पर आरएफआईडी रीडर लगे ही नहीं थे। 17 में से सिर्फ 4 निवारक इकाइयों के पास सरकारी गाड़ी थी, बाकी किराये पर चलती थीं। कई प्रवर्तन इकाइयां आधे या उससे कम स्टाफ पर थीं — रायगढ़ा में 7 मंजूर पदों पर 3 अफसर, बरगढ़ में 11 पर 5। जमा रकम को इलेक्ट्रॉनिक कैश लेजर में चढ़ाने और देनदारी पटाने में 6 से 1,257 दिन की देरी मिली।
रिपोर्ट हर पैरा पर विभाग का जवाब दर्ज करती है और रिटर्न न भरने वालों पर उसे नहीं मानती। कैग का कहना है कि जांच का सिस्टम सचमुच काम करता, तो ये मामले रिटर्न न भरते ही पकड़ में आ जाते। सरकार ने दिसंबर 2023 में कहा कि हर मामले पर कार्रवाई शुरू हो गई है।
सात सिफारिशें
कैग का इलाज ज्यादातर सॉफ्टवेयर और तरीके का है। एनआईसी के साथ मिलकर वह छेद बंद किए जाएं जिनसे रिटर्न न भरने वाले और रद कारोबारी बिल बना लेते हैं। ऐसा सिस्टम बने जो बिल बनाने पर भी टैक्स न देने वाले को झंडी दिखाए। वाहन रजिस्ट्री ठीक से जोड़ी जाए। एक पैन पर कई रजिस्ट्रेशन वालों की जांच पहले हो। निवारक इकाइयों को गाड़ी-स्टाफ मिले और जो विश्लेषण रिपोर्टें पहले से हैं, उनका इस्तेमाल हो। मांग तुरंत बने और लेजर में पटे। और हर रोकी गई गाड़ी की सूचना उस कारोबारी के अपने सर्किल तक जाए। रिपोर्ट किसी इकाई की तारीफ नहीं करती, किसी व्यक्ति को दोषी भी नहीं ठहराती। जो खाई वह दिखाती है, वह दो ऐसे डेटाबेस के बीच है जिन्हें आपस में बात करनी थी।
एक नजर में
• ई-वे बिल, ओडिशा, 2018-19 से 2021-22 : 4,18,53,731
•रिटर्न न भरने वाले : 6 कारोबारी, 2,340 बिल, 79.81 करोड़ रुपये का माल, 11.90 करोड़ रुपये टैक्स (पैरा 2.1.9.1)
•संदिग्ध गाड़ियां : 14 कारोबारी, 1,113 बिल, 235 गाड़ियां, 80.30 करोड़ रुपये का माल, 13.78 करोड़ रुपये टैक्स (पैरा 2.1.9.7)
•सरकारी गाड़ी वाली निवारक इकाइयां : 17 में 4 जमा रकम लेजर में चढ़ाने में देरी : 6 से 1,257 दिन
तुलना
•2021-22 में बने ई-वे बिल : 1,32,81,646 — सबसे ज्यादा, 100%
•2018-19 में बने ई-वे बिल : 81,03,310 — शिखर का 61%
•जांच के पहले से चौथे साल के बीच बिल 63.9% बढ़े।
हमारा हिसाब
1,32,81,646 ÷ 81,03,310 = 1.639, यानी 63.9% की बढ़त। छह गिनी हुई कमियों का टैक्स : 11.90 + 0.35 + 0.10 + 0.99 + 13.78 + 0.04 = 27.16 करोड़ रुपये। रायगढ़ा : 3 ÷ 7 = मंजूर स्टाफ का 43%।
भारत को क्या मिला
उन जोड़ों की लिखी हुई सूची — ई-वे बिल से रिटर्न, बिल से वाहन रजिस्ट्री, रोकी गाड़ी से सर्किल। इन्हें जोड़ते ही यही सॉफ्टवेयर चलाने वाले हर राज्य में रिसाव बंद होगा।
ब्लिट्ज की सराहना
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, जिनकी रिपोर्ट लोगों के नहीं, सिस्टम के छेद गिनाती है।
आंकड़े कैग की ओडिशा सरकार पर रिपोर्ट संख्या 1, 2026 (निष्पादन और अनुपालन – राजस्व), 28 सितंबर 2026 को सदन में रखी, अध्याय 2 से; cag.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
राज्य जीएसटी आयुक्तालय हर तिमाही यह छाप सकता है कि उस अवधि का रिटर्न न भरने वालों ने कितने ई-वे बिल बनाए। तब कैग की सात में पहली सिफारिश को परखने का एक सार्वजनिक आंकड़ा होगा।
बुजुर्गों के उपकरण केंद्र 109 से होंगे 300
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। बुजुर्गों को सुनने की मशीन, चलने का सहारा या चश्मा मुफ्त दिलाने वाले केंद्र 109 से बढ़ाकर 300 किए जाएंगे। यह बात सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार और राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा ने 2 अक्टूबर को दिल्ली के डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में कही। मंत्रालय ने 2 अक्टूबर की विज्ञप्ति में इसकी जानकारी दी।
मौका राष्ट्रीय वयोश्री योजना का शिविर था। इसमें दिल्ली-एनसीआर के 114 बुजुर्गों को 10 लाख रुपये से ज्यादा के 662 उपकरण दिए गए। यानी एक व्यक्ति को करीब छह उपकरण। योजना इसी के लिए है — सुनने की मशीन, वॉकर और चश्मा अक्सर एक ही व्यक्ति को चाहिए होते हैं, क्योंकि उम्र एक साथ कई चीजें छीनती है।

विज्ञप्ति में 300 तक पहुंचने की कोई तारीख नहीं है, और मंत्रालय से यही पूछना है। शिविर में मिला उपकरण तभी तक चलता है जब तक फिटिंग ठीक हो। पास का केंद्र वह चीज है जिससे अगली फिटिंग मुमकिन होती है।
एक नजर में
•बांटे गए उपकरण : 662, 114 बुजुर्गों को, 10 लाख रुपये से ज्यादा के
•पीएम-दिव्य आशा केंद्र : अभी 109, योजना 300 की
तुलना
•तय लक्ष्य : 300 केंद्र — 100%
•आज के केंद्र : 109 — •लक्ष्य का 36%
तय किया गया नेटवर्क आज के 2.75 गुना है।
हमारा हिसाब
662 ÷ 114 = 5.8 उपकरण प्रति व्यक्ति; 300 ÷ 109 = 2.75; 300 − 109 = 191 नए केंद्र।
भारत को क्या मिला
देश के ज्यादा बुजुर्गों की पहुंच में फिटिंग केंद्र, न कि एक बार आने वाला शिविर।
ब्लिट्ज की सराहना
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, और वयोश्री शिविर चलाने वाली भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को)।
आंकड़े सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 2 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2318364) से; pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज की सलाह
मंत्रालय 300 के आंकड़े के आगे साल लिख दे और जिलों की सूची छाप दे, ताकि परिवार देख सके कि पास का केंद्र उसके यहां आ रहा है या नहीं।
भारत-नीदरलैंड के 25 खेती केंद्रों की समीक्षा
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में नीदरलैंड के मंत्री सिल्वियो एर्केंस से मुलाकात की। कृषि मंत्रालय ने 2 अक्टूबर की विज्ञप्ति में बताया कि दोनों पक्षों ने डच तकनीक से बन रहे खेती और बागवानी के 25 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की प्रगति देखी। बीज क्षेत्र में सहयोग के लिए एक कार्य-योजना बनाने पर सहमति बनी।
ये केंद्र रिश्ते का जमीनी सिरा हैं — प्रदर्शन खेत, जहां डच ग्रीनहाउस, सिंचाई और फसल-बाद के तरीके भारतीय किसानों को भारतीय मिट्टी पर दिखाए जाते हैं। बीज वाली बात नई है, और किसान को सबसे पहले वही दिखेगी, क्योंकि बीज वह चीज है जो बाकी सबकी हद तय करती है।

डच पक्ष में महानिदेशक मार्टेन वान डेन बर्ग और राजदूत मारिसा गेरार्ड्स थे; भारत की ओर से कृषि सचिव अतीश चंद्र और डेयर सचिव एम.एल. जाट। विज्ञप्ति में यह नहीं है कि 25 में से कितने केंद्र चल रहे हैं, न बीज योजना की कोई तारीख। अगली बैठक के यही दो सवाल हैं।
एक नजर में
•बैठक : 28 सितंबर, नई दिल्ली
•समीक्षा में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस : 25, खेती और बागवानी
•सहमति : बीज क्षेत्र में सहयोग की कार्य-योजना
आंकड़े कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 2 अक्टूबर की विज्ञप्ति (रिलीज आईडी 2318321) से; pib.gov.in पर जांचे।













