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धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता : सुप्रीम कोर्ट

अंतरिम आदेश या हाईकोर्ट के फैसले पर रोक से इन्कार

by ब्लिट्ज़ इंडिया
December 13, 2024
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने 77 जातियों के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के दर्जे को रद कर दिया था, जिसमें ज्यादातर मुस्लिम धर्म से जुड़ी थीं।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान उपस्थित वकीलों से इस मामले का अवलोकन करने के लिए भी कहा। जस्टिस गवई ने कहा, आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता। इस पर प. बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, यह धर्म के आधार पर नहीं, पिछड़ेपन के आधार पर है। हिंदुओं के लिए पिछड़ेपन के आधार पर कोर्ट ने आरक्षण को बरकरार रखा है। पिछड़ापन समाज के सभी वर्गों में आम है। रंगनाथ आयोग ने ऐसे आरक्षण की सिफारिश की है और उनमें से कई समुदाय केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल हैं। उन्होंने कहा, मुस्लिम ओबीसी समुदायों के लिए आरक्षण रद्द करने के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। मामला अभी लंबित है।

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हमारे पास आंकड़े हैं
हाईकोर्ट के 22 मई के फैसले का उल्लेख करते हुए सिब्बल ने कहा कि अधिनियम के प्रावधान रद कर दिए गए हैं। हमारे पास आंकड़े हैं। हाईकोर्ट का फैसला उन हजारों विद्यार्थियों के हकों पर असर डालता है, जो विश्वविद्यालयों में दाखिले के इच्छुक हैं या जो नौकरी करना चाहते हैं। हाईकोर्ट के फैसले के परिणामस्वरूप 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद किए गए हैं। उन्होंने पीठ से अंतरिम आदेश पारित करने और हाईकोर्ट के आदेश पर एकतरफा रोक लगाने का आग्रह किया। हालांकि, पीठ ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत सात जनवरी को विस्तृत सुनवाई करेगी।

याचिकाकर्ता बोले-बिना सर्वेक्षण दिया आरक्षण
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पीएस पटवालिया ने राज्य सरकार की दलीलों का खंडन करते हुए कहा, आरक्षण व बिना किसी आंकड़े या सर्वेक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग को दरकिनार करते हुए दिया गया था। 2010 में तत्कालीन सीएम के बयान के तुरंत बाद, आयोग से परामर्श किए बिना 77 समुदायों के लिए आरक्षण दिया गया था। इस पर सिब्बल ने कहा, एक सर्वेक्षण रिपोर्ट थी, जो याचिका के साथ संलग्न है।

पिछली सुनवाई पर मांगे थे आंकड़े
पांच अगस्त को सुनवाई करते हुए शीर्ष कोर्ट ने बंगाल सरकार से ओबीसी में शामिल जातियों के सामाजिक व आर्थिक पिछड़ेपन और सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर मात्रात्मक डाटा देने के लिए कहा था। कोर्ट ने राज्य सरकार से हलफनामा मांगा था, जिसमें 37 जातियों को ओबीसी में शामिल करने से पहले उसके व पिछड़ा वर्ग आयोग के परामर्श का विवरण दर्ज हो।

यह था हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने 77 जातियों का ओबीसी दर्जा रद कर दिया था और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों व सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण को अवैध ठहराया था। हाईकोर्ट ने कहा था, वास्तव में इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने के लिए धर्म ही इकलौता मानदंड प्रतीत होता है। 77 वर्गों का पिछड़ा वर्ग में चयन समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय का अपमान है।

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