ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।कुछ ही साल पहले शुरू हुई एक परियोजना के दूसरे और ज़्यादा महत्वाकांक्षी चरण पर भारत ने मुहर लगा दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) 2.0 को क़रीब ₹1.27 लाख करोड़ के प्रावधान के साथ मंज़ूरी दे दी है। मक़सद है देश में चिप निर्माण, डिज़ाइन क्षमता और उसके इर्द-गिर्द बने पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स तंत्र को गहरा करना। इस आंकड़े के पीछे की महत्वाकांक्षा और बड़ी है — मिशन के तहत कुल निवेश क़रीब ₹4 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जिससे लगभग ₹2 लाख करोड़ का उत्पादन और ₹1 लाख करोड़ का निर्यात संभव माना जा रहा है।
दूसरा चरण शून्य से शुरू नहीं हो रहा, और यही इसे महज़ एक घोषणा से अलग करता है। जुलाई के मध्य तक 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाएं मंज़ूर हो चुकी थीं, जिनमें कुल ₹1.60 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश प्रतिबद्ध है — और सबसे अहम, इनमें से तीन में व्यावसायिक उत्पादन शुरू भी हो चुका है। यानी अब सवाल यह नहीं कि भारत चिप उद्योग खड़ा कर सकता है या नहीं, बल्कि यह कि कितनी तेज़ी और कितनी गहराई से। नया चरण सिर्फ़ फ़ैब्रिकेशन संयंत्रों से आगे बढ़कर डिज़ाइन, उन्नत पैकेजिंग, सामग्री, उपकरण और विशेष आपूर्ति शृंखलाओं तक जाता है — वही चीज़ें जो तय करती हैं कि कोई संयंत्र अकेला टापू रहेगा या एक पूरा तंत्र बनेगा।
संयंत्र से पूरे तंत्र तक: सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 का प्रावधान क़रीब ₹1.27 लाख करोड़ है, और यह 12 मंज़ूर परियोजनाओं (₹1.60 लाख करोड़ से अधिक प्रतिबद्ध निवेश) की नींव पर खड़ा है, जिनमें तीन में उत्पादन शुरू हो चुका है।
चिप आधुनिक अर्थव्यवस्था की सबसे छोटी चीज़ है और वह इकलौती, जिसका इंतज़ार बाक़ी सब करते हैं। जो देश इसे ख़ुद बना ले, वह एक तरह की आत्मनिर्भरता ख़रीद लेता है।
एक नज़र में
• मंज़ूरी: सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, प्रावधान क़रीब ₹1.27 लाख करोड़
• लक्ष्य: क़रीब ₹4 लाख करोड़ कुल निवेश, ~₹2 लाख करोड़ उत्पादन
• निर्यात: लगभग ₹1 लाख करोड़ का लक्ष्य
• आधार: 12 परियोजनाएं मंज़ूर, ₹1.60 लाख करोड़+ प्रतिबद्ध; 3 में उत्पादन
इसके पीछे की रणनीतिक सोच सीधी है। उन्नत चिप कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), क्वांटम कंप्यूटिंग, स्वचालित प्रणालियों और तेज़ संचार नेटवर्क की भौतिक बुनियाद हैं — और भारत साथ-साथ सार्वजनिक एआई कंप्यूट, बहुभाषी फ़ाउंडेशन मॉडल तथा स्वास्थ्य, कृषि व शासन में एआई के इस्तेमाल पर भी निवेश कर रहा है। जो देश इस पैमाने पर कंप्यूटिंग की मांग खड़ी कर रहा हो, उसका हित इसी में है कि वह उसका हर हिस्सा आयात न करे। बीते बरसों ने हर बड़ी अर्थव्यवस्था को एक और सादा सबक़ भी दिया है: जो आपूर्ति शृंखला दो-चार देशों से होकर गुज़रती हो, वह एक ऐसी कमज़ोरी है जिसका बीमा कारोबारी सद्भाव से नहीं होता।
ईमानदारी से यह कहना भी ज़रूरी है कि यह किसी भी सरकार के लिए सबसे कठिन औद्योगिक चुनौतियों में से एक है — भारी पूंजी, बेहद बारीक तकनीक, और ऐसी शर्तें जिनमें प्रतिभा, अति-शुद्ध जल, निर्बाध बिजली और विशेष आपूर्तिकर्ता सब एक साथ चाहिए। यही वजह है कि दूसरा चरण संयंत्रों से आगे पूरे तंत्र को देख रहा है। आगे का रचनात्मक रास्ता है पूंजी और क्षमता को साथ-साथ बढ़ाना: डिज़ाइन और पैकेजिंग में विस्तार, जहां भारत पहले से मज़बूत है; विश्वविद्यालयों और उद्योग के साथ मिलकर इंजीनियरिंग प्रतिभा की पौध तैयार करना; और निवेशकों को वह नीतिगत स्थिरता देना जो दस साल चलने वाले संयंत्र के लिए ज़रूरी होती है। तीन संयंत्रों में उत्पादन शुरू होना असली उपलब्धि है। अगला चरण इसी को सामान्य बात बनाने का है।










