ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।नामों से ही समझ आ जाता है कि सरकार समस्या को किस तरह देख रही है। परीक्षा सुधार के लिए बनी छह सदस्यों की उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की अध्यक्षता नंदन नीलेकणि कर रहे हैं — वही, जिन्होंने आधार की व्यवस्था खड़ी की थी। इसमें इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ हैं, ख़ुफ़िया ब्यूरो के पूर्व निदेशक तपन डेका हैं, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी कामकोटि हैं, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवल हैं और लॉजिस्टिक्स के जानकार अमृत लाल मीणा हैं। यानी परियोजना प्रबंधन, सुरक्षा, कंप्यूटर विज्ञान, प्रशासन और सामान की सुरक्षित आवाजाही — पांचों चीज़ें एक ही मेज़ पर।
यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है और इससे बीमारी की पहचान भी साफ़ होती है। देश की सार्वजनिक परीक्षाओं को अब सिर्फ़ शिक्षा का मामला नहीं माना जा रहा। इन्हें एक बड़े बुनियादी ढांचे की तरह देखा जा रहा है — ऐसी व्यवस्था जो एक ही सुबह हज़ारों केंद्रों पर लाखों छात्रों तक गोपनीय सामग्री पहुंचाती है, और जिसे भुगतान प्रणाली जैसी भरोसेमंद होना चाहिए। टास्क फोर्स से कहा गया है कि वह परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की जांच करे और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के लिए ढांचागत, प्रशासनिक और तकनीकी सुधार सुझाए — जिसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन आधारित सत्यापन जैसी तकनीकें शामिल हैं।
शिक्षा से आगे, ढांचे का सवाल: टास्क फोर्स को परीक्षा की पूरी प्रक्रिया देखनी है — प्रश्नपत्र की हिफ़ाज़त से लेकर छात्र की पहचान तक — और तकनीक आधारित हल सुझाने हैं।
जो देश रोज़ अरबों डिजिटल भुगतान बिना एक भी गड़बड़ी के कर लेता है, वह एक प्रश्नपत्र भी सुरक्षित पहुंचा सकता है। कमी क्षमता की कभी नहीं थी — डिज़ाइन की थी।
एक नज़र में
• अध्यक्ष: नंदन नीलेकणि, इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक
• सदस्य: एस सोमनाथ, तपन डेका, वी कामकोटि, अनीता करवल, अमृत लाल मीणा
• काम: एनटीए में ढांचागत, प्रशासनिक और तकनीकी सुधार के सुझाव
• तकनीक: एआई और ब्लॉकचेन आधारित सत्यापन, पूरी परीक्षा प्रक्रिया की समीक्षा
हल कैसा दिख सकता है, इसका खाका मौजूद है। इतने बड़े प्रश्न-बैंक बनाए जाएं कि किसी एक पेपर की चोरी बेमानी हो जाए, क्योंकि दो छात्रों को एक जैसा पेपर मिलेगा ही नहीं। बायोमेट्रिक पहचान से दूसरे के बदले परीक्षा देने का रास्ता बंद हो। पेपर एन्क्रिप्टेड रूप में और ठीक समय पर पहुंचे, ताकि वह कई दिन तक कहीं रखा ही न रहे। और हर क़दम का ऐसा रिकॉर्ड बने कि कोई गड़बड़ हो तो केंद्र, पाली और मिनट तक पहचानी जा सके। ये सब नई तकनीकें नहीं हैं — बैंकिंग और पहचान की व्यवस्थाओं में ये रोज़ इस्तेमाल होती हैं।
आगे का रास्ता यही है कि इरादा बड़ा रखा जाए और क्रम ईमानदारी से तय हो। पूरे देश में कंप्यूटर आधारित परीक्षा के लिए भरोसेमंद बिजली और इंटरनेट चाहिए, जो कई ज़िलों में अब भी असमान है — जल्दबाज़ी में की गई शुरुआत एक तरह की दिक़्क़त हटाकर दूसरी खड़ी कर सकती है। समझदारी वाला रास्ता है: बड़े पैमाने पर पायलट, नतीजों को सार्वजनिक करना, जो चले उसे बढ़ाना, और जहां ज़रूरत हो वहां ऑफ़लाइन विकल्प रखना। भारत के पास डिजिटल बुनियादी ढांचा बनाने का तजुर्बा है जिसकी दुनिया मिसाल देती है। हर साल दो करोड़ छात्रों का भविष्य तय करने वाली परीक्षा को उसी गंभीरता से लेना कोई तकनीकी छलांग नहीं, बस एक फ़ैसला है।












