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बारह दिन शुल्क-मुक्त: भारत–ब्रिटेन समझौते ने ज़मीन पर क्या बदला

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 27, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।समझौता कमरे में होता है, इम्तिहान गोदाम में। भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) 15 जुलाई 2026 से लागू हो गया, और बीते बारह दिन पहली बार ऐसे हैं जब इसकी शर्तें असली माल से टकराई हैं। समझौते के तहत भारत का क़रीब 99 फ़ीसदी सामान ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त या कम शुल्क पर जाएगा, और ब्रिटेन का लगभग 90 फ़ीसदी सामान भारत में। लक्ष्य है दोनों देशों का कारोबार 2025-26 के क़रीब 58 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक लगभग 115 अरब डॉलर तक ले जाना।

असल बात यह है कि फ़ायदा किस तरफ़ जाता है। भारत की तरफ़ सबसे ज़्यादा लाभ उन क्षेत्रों को है जहां हाथ का काम ज़्यादा है — कपड़ा, रेडीमेड गारमेंट, जूते-चप्पल, कालीन, प्रसंस्कृत खाद्य और इंजीनियरिंग सामान। इन धंधों में शुल्क कोई किताबी शब्द नहीं होता; अक्सर वही तय करता है कि ऑर्डर मिलेगा या हाथ से निकल जाएगा। अनुमान है कि इससे सात से दस लाख नए रोज़गार के मौक़े बन सकते हैं। ब्रिटेन की तरफ़ से हिसाब यह है कि उसके निर्यातकों को शुरू में सालाना 40 करोड़ पाउंड तक और दस साल बाद क़रीब 90 करोड़ पाउंड तक की शुल्क बचत होगी।

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शुल्क हटा, काग़ज़ बाक़ी: 15 जुलाई से लागू समझौते के बाद भारत का क़रीब 99% निर्यात ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त है। अब असली सवाल यह है कि छोटे निर्यातक काग़ज़ी शर्तें कितनी जल्दी समझ पाते हैं।

शुल्क हटाना आसान हिस्सा था। मुश्किल हिस्सा यह है कि तिरुपुर का छोटा निर्यातक वह प्रमाणपत्र बनाना सीखे, जो काग़ज़ की छूट को बैंक खाते के पैसे में बदलता है।

एक नज़र में

• लागू: 15 जुलाई 2026 (हस्ताक्षर जुलाई 2025)
• दायरा: भारत का ~99% निर्यात ब्रिटेन में, ब्रिटेन का ~90% सामान भारत में
• लक्ष्य: कारोबार ~58 अरब डॉलर से ~115 अरब डॉलर (2030 तक)
• रोज़गार: 7–10 लाख नए मौक़ों का अनुमान

असली चुनौती हस्ताक्षर के बाद शुरू होती है। शुल्क-मुक्त पहुंच एक इजाज़त है, बिक्री नहीं। इसका फ़ायदा उठाने के लिए निर्यातक को मूल-देश (रूल्स ऑफ़ ओरिजिन) की शर्तें पूरी करनी होंगी, सही प्रमाणपत्र लेने होंगे, ब्रिटेन के लेबल और सुरक्षा मानक निभाने होंगे। बड़ी कंपनियों में इसके लिए पूरा विभाग होता है। तिरुपुर की गारमेंट इकाई, कानपुर की चमड़ा कार्यशाला या नासिक का खाद्य प्रसंस्करण संयंत्र — यानी जिनके लिए यह समझौता सबसे ज़्यादा मायने रखता है — उनके पास अक्सर नहीं होता।

यह हल हो सकने वाली दिक़्क़त है और अगले कुछ महीनों की मेहनत यहीं लगनी चाहिए। निर्यात संवर्धन परिषदें और उद्योग संगठन सरल हिंदी और स्थानीय भाषाओं में नियमों की पुस्तिकाएं दें, क्लस्टर स्तर पर साझा जांच और प्रमाणन सुविधाएं बनें, काग़ज़ी काम डिजिटल हो ताकि बिचौलिये की लागत घटे, और पहली बार निर्यात करने वालों के लिए छोटे आकार का व्यापार-वित्त उपलब्ध हो। भारत यह काम इलेक्ट्रॉनिक्स और दवा उद्योग में पहले कर चुका है और नतीजे कुछ ही साल में आंकड़ों में दिखे थे। अगर यही मदद अब छोटे कारख़ानों तक पहुंचे, तो यह समझौता सिर्फ़ व्यापार का आंकड़ा नहीं बढ़ाएगा — उन क़स्बों में मज़दूरी बढ़ाएगा जिनकी चर्चा व्यापार नीति में कम ही होती है।

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