विनोद शील
नई दिल्ली। देश में किसी भी परीक्षा का पेपर लीक होना कतई स्वीकार किए जाने वाला कृत्य नहीं है क्योंकि इससे हजारों-लाखों छात्रों एवं परिवारों का भविष्य जुड़ा होता है पर इतने संवेदनशील मुद्दे को लेकर देशद्रोह जैसी राजनीति किया जाना उससे भी अधिक निंदनीय कृत्य है। आजकल नीट के पेपर का लीक होना सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार ने इस पर कड़ी कार्रवाई करते हुए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने का यत्न भी कर दिया है और दोबारा सफलतापूर्वक नीट परीक्षा करा कर उसका रिजल्ट भी घोषित किया जा चुका है।
इसी मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन पिछले कुछ दिनों से देश की राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर चल रहा है। उसके द्वारा गत 20 जुलाई को बिना अनुमति के किया गया संसद मार्च अब तमाम बड़े सवालों के घेरे में आ चुका है। सीजेपी ने दावा किया था कि उसका प्रदर्शन और मार्च शांतिपूर्ण है मगर इस मार्च के दौरान जिस तरह देश की संसद को उखाड़ फेंकने, प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री को जान से मारने, भारत को नेपाल बनाने के नारे लगे एवं देश विरोधी तत्वों ने जिस तरह से हिंसा का प्रदर्शन किया; उससे इसके मकसद पर सवाल उठना लाजिमी है।
नि श्चित रूप से इस प्रदर्शन में प्रारंभ में छात्र जुटे होंगे किंतु अब यह अन्य प्रदर्शनों की भांति विभिन्न राजनीतिक दलों व अराजक तत्वों द्वारा हाईजैक कर लिया गया है तथा यह सिर्फ एक राजनीतिक और अराजक आंदोलन के रूप में परिवर्तित होता नजर आ रहा है। छात्र राजनीति, राष्ट्र राजनीति और संसदीय राजनीति के मापदंड अलग अलग हैं। हमने देश में छात्र आंदोलन के पुरोधा रहे जय प्रकाश नारायण के मूल्यों और उनकी नीतियों को क्यों भुलाया?
लोकतंत्र में प्रदर्शन या विरोध दर्ज कराना जनता का अधिकार है किंतु प्रदर्शनकारियों को यह समझना होगा कि उनके किसी भी कृत्य से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न नहीं होना चाहिए। प्रदर्शनकारियों का भी यह दायित्व है कि वे इस बात का ध्यान रखें कि अतिवादी या अराजकतत्व उनके आंदोलन को देश विरोध का मंच न बना लें राजनीतिक दल या भिन्न-भिन्न संगठन उसे अपने हित साधने के लिए हाईजैक न कर लें- जैसा कि सीजेपी के इस आंदोलन में होता दिखार्इ दे रहा है।
साथ ही सरकार को भी निगरानी तंत्र को इतना सक्रिय करना होगा कि किसी भी धरना-प्रदर्शन में अराजकतत्वों और आतंकवादियों के आने से पहले ही उनकी खबर ले ली जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में नियमों को तोड़ने वालों पर वैसी ही कार्रवार्इ होनी चाहिए जैसी किसी आम नागरिक पर होती है। चाहे वह कोर्इ नेता ही क्यों न हो? कानून सबके लिए एक है। नेताओं, नागरिकों और सभी को प्रोटेस्ट, पॉलिटिक्स और अराजकता में अंतर तो समझना ही होगा। एक बात और; ऐसे नेताओं से भी देश तथा सरकार को सावधान रहना होगा जिनको ऐसे अराजक तत्वों से भरे मार्च अथवा आंदोलन में क्रांति की महक आ रही हो।
सीजेपी के प्रदर्शन के एक दिन बाद; देश के सबसे हाई अलर्ट जोन में, जहां धरने, प्रदर्शन की बिल्कुल अनुमति नहीं है; वहां यानी प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी द्वारा सारी हदें पार करते हुए धरना व विरोध प्रदर्शन किए जाने से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। लोकतंत्र में असहमति जताना हर नागरिक और विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है लेकिन संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों तक प्रदर्शन ले जाना कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है। क्या सत्ता के शीर्ष केंद्रों तक मार्च करना लोकतांत्रिक दबाव बनाने का वैध तरीका है? लोकतंत्र की मजबूती केवल विरोध करने में नहीं, बल्कि विरोध की मर्यादा और संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करने में भी समाहित है।
लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि विरोध की आवाज को दमन नहीं किया जा सकता।
सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, जवाब मांगना और असहमति दर्ज कराना विपक्ष और जनता का संविधान प्रदत्त अधिकार है लेकिन लोकतंत्र की मजबूती सिर्फ विरोध करने के अधिकार से ही नहीं, बल्कि विरोध के तरीके और उसकी सीमाओं से भी तय होती है। दिल्ली में राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस नेताओं का प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना इसी बहस को फिर सामने ले आया है।
हमें यहां विशेष रूप से ये तीन तारीखें – श्रीलंका 9 जुलाई 2022, बांग्लादेश 5 अगस्त 2024 और नेपाल 9 सितंबर 2025 नहीं भूलनी चाहिए जिनका देश में हाल की घटनाओं से कहीं न कहीं सीधा संबंध दिखाई दे रहा है। इन देशों में क्या हुआ था; इसको सभी जानते हैं और वैसा ही कुछ करने की बातें हमारे देश के तमाम विपक्षी नेता भी समय-समय पर करते रहे हैं। इनमें संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भी अनेक बयान ऐसे हैं जो हाल की घटनाओं से मेल खा रहे हैं।
अब बात करते हैं हाल के घटनाक्रमों की। राहुल और प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस नेता मंगलवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास सेवा तीर्थ (7, लोक कल्याण मार्ग) पर धरने पर बैठ गए। कांग्रेस नेताओं के इस कदम से प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा भी मुश्किल हो गई। पुलिसवाले उन्हें वहां से हटाने के लिए खूब मनाते भी दिखे। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी तुरंत मौके पर पहुंचकर राहुल गांधी को समझाने की कोशिश की। उन्होंने राहुल की मांगों को सुना और उन पर चर्चा का भरोसा भी दिया लेकिन राहुल गांधी इतने से नहीं माने और धरने पर अड़े रहे तथा बार-बार अपनी मांगें बदलते रहे। अंततः पुलिस को मजबूरन उन्हें वहां से बलपूर्वक हटाना पड़ा।
नेता प्रतिपक्ष ने देश की जनता से प्रधानमंत्री आवास पर एकत्र होने और भारत को श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बनाने का आह्वान किया था। अब विपक्ष के नेता ने जो किया उसे देश की जनता खुद समझ सकती है कि उन्हें यह करना चाहिए था अथवा नहीं। इस तरह की अराजकता देश के विकास को रोकने की साजिश के अलावा कुछ और नहीं कही जा सकती। इसके अलावा सीजेपी के प्रदर्शन में सिर्फ छात्र ही आए थे अथवा समर्थक राजनीतिक दलों के ‘लोग’ या उपद्रवी; इन सब बातों की भी गहन पड़ताल सरकार को करानी चाहिए। शायद देश विरोधी प्रदर्शनकारी यह भूल गए कि यह भारत है और उनकी इसे श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल बनाने की साजिश कभी सफल नहीं हो सकती। यहां की सेनाएं, सुरक्षा तंत्र इतना मजबूत है कि ऐसी साजिशें हमारे सुरक्षा बल रोकने में समर्थ हैं और उन पर हर भारतवासी को गर्व है।
इस सारे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक आवाज को रोकने की कोशिश बताया जबकि सरकार समर्थक पक्ष इसे देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा से खिलवाड़ करार दे रहे हैं।
हर विरोध सत्ता के दरवाजे तक क्यों लाना?
इसमें कोई दो राय नहीं कि विरोध प्रदर्शन एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होता है। दुनिया भर में आंदोलनों ने सरकारों को नीतियां बदलने पर मजबूर किया है लेकिन सवाल यह है कि क्या हर आंदोलन की अंतिम मंजिल सत्ता के शीर्ष केंद्रों तक पहुंचनी ही चाहिए?
प्रधानमंत्री आवास, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन जैसे स्थान केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के केंद्र भी होते हैं। इनकी सुरक्षा व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं होती बल्कि पूरे देश की स्थिरता इससे जुड़ी रहती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि जब बड़ी भीड़ इन इलाकों की ओर बढ़ती है तो प्रशासन के सामने चुनौती केवल प्रदर्शनकारियों को रोकने की नहीं बल्कि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति को संभालने की होती है।
ताजा हुईं श्रीलंका-बांग्लादेश की तस्वीरें
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस तरह के मार्च की तुलना श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए उन प्रदर्शनों से की, जहां बड़ी भीड़ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आवासों तक पहुंच गई थी और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई थी।
हालांकि भारत की लोकतांत्रिक और संस्थागत व्यवस्था उन देशों से अलग है। भारत में मजबूत संवैधानिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक संवाद की लंबी परंपरा है। इसलिए किसी भी विरोध को सीधे किसी दूसरे देश की घटनाओं से जोड़ना उचित नहीं होगा लेकिन यह भी सच है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादा के बीच संतुलन जरूरी है।
विपक्ष का तर्क है कि केवल निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन करने से आंदोलन की धार कमजोर हो जाती है लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे और उसका उद्देश्य केवल राजनीतिक संदेश देना हो, न कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी करना। आज की राजनीति में सड़क पर उतरना एक प्रभावी हथियार बन चुका है।
विपक्ष के लिए यह जनता से जुड़ने और सरकार पर दबाव बनाने का माध्यम है लेकिन मजबूत विपक्ष वह नहीं होता जो केवल टकराव की राजनीति करे बल्कि वह होता है जो अपनी बात मजबूती से रखते हुए लोकतांत्रिक मर्यादाओं का भी पालन करे; क्योंकि लोकतंत्र में विरोध की भी एक सीमा तय होना चाहिए। राहुल गांधी सिर्फ एक पार्टी के नेता ही नहीं बल्कि संसद में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। अतः उनसे ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जाने की उम्मीद की जाती है जो देश का मान-सम्मान बढ़ाएं।
ब्लिट्ज इंडिया का मत
BlitzIndiaMediaGroup (@BlitzIndiaMedia) on X
देशवासियों, भारतीय लोकतंत्र में आलोचना, विरोध और आक्रोश का सदैव सर्वोपरि स्थान रहा है, और रहेगा। हमारी आजादी का आंदोलन, हमारा मार्गदर्शक और प्रेरणा का स्रोत है और रहेगा।
सरकार का विरोध होता है और मुद्दों पर होना भी चाहिए। यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है।
मगर, नीट के नाम पर देश में नेगेटिव नैरेटिव खड़ा करके भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को खराब करने के राजनीतिक षड्यंत्र का समूल निराकरण उतना ही जरूरी है जितना कि हम कैंसर जैसी बीमारी पर काबू पाने और उसके समूल निवारण के लिए रात दिन जुटते हैं।
छात्र असंतोष और छात्र आंदोलन को यदि सही मायने और पवित्रता के साथ आगे बढ़ाना था तो पहले भारत में छात्र आंदोलन के जनक आदरणीय जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों, मूल्यों और उनकी कार्यशैली को समझ लेना था। तो आज हम सफल भी होते और सम्मान भी पाते ।
मगर, हम तो प्रधानमंत्री मोदी को मारने, गाली देने , बदनाम करने और उन्हें हटाने के लिए निहायत घटिया दर्जे की हरकतों पर उतर आए हैं।
एजेंडा नीट की पारदर्शिता का है या इसकी आड़ में प्रधानमंत्री मोदी को हटाने के अभियान की चिंगारी सुलगाना।
यह असली छात्रों की सोच और कार्यशैली से बाहर का हथियार और हथकंडा है।
देश का कोई भी पढ़ने वाला, करियर बनाने वाला देश का कर्णधार विद्यार्थी हिंसक, अराजक और अश्लील हरकत न तो करे और न ही उसमें शामिल हो।
आप सोचिए, समझिए और अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने भविष्य के निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़िए।












