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भाजपा को ‘कमल’ और कांग्रेस को कैसे मिला ‘पंजा’

दिलचस्प है चुनाव चिह्नों की कहानी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 3, 2024
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How did BJP get 'Lotus' and Congress 'Panja'?
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। आजादी के समय देश की साक्षरता दर बेहद कम थी। ऐसे में चुनाव के दौरान पार्टियों और उम्मीदवारों को चुनाव निशान दिए गए थे। यह परंपरा आज तक चली आ रही है।

चुनाव में पार्टियों के लिए उनके चुनावी निशान बेहद जरूरी होते हैं। इस बार चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोट की अपील करते हुए कहा था कि आप सिर्फ इतना समझिए कि चुनाव कमल लड़ रहा है। दरअसल आजादी के समय देश की साक्षरता दर बेहद कम थी। ऐसे में पार्टियों या फिर प्रत्याशियों की पहचान के लिए चुनाव निशान देने की शुरूआत हुई थी। हालांकि ये चुनाव निशान आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 70 साल पहले थे। कई बार पार्टियों में फूट पड़ने के बाद चुनाव निशान के लिए लोग कोर्ट तक जाते हैं।

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हाल ही में एनसीपी और शिवसेना में फूट पड़ने के बाद चुनाव चिह्न पर दोनों ही गुट दावेदारी कर रहे थे। वहीं दो पत्ती के निशान के लिए टीटीवी दिनाकरन ने भी कोर्ट के चक्क र काटे। बता दें कि बड़ी पार्टियों के चुनाव चिह्न फिक्स होते हैं लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव आयोग के पास मौजूद लिस्ट में से चुनाव चिह्न का चयन करना होता है। पहले आओ पहले पाओ की बिनाह पर चुनाव चिह्न अलॉट किए जाते हैं। बता दें कि एमएस सेठी को 1950 में ड्राफ्टमैन के रूप में नियुक्त किया गया था जो कि एचबी पेंसिल की मदद से चुनाव निशान बनाते थे। यही चुनाव निशान इस्तेमाल होते रहे।

– चुनाव निशान आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 70 साल पहले थे

उनके द्वारा बनाई गई तस्वीरों का इस्तेमाल आज भी चुनाव में होता है। चुनावों में जानवरों की तस्वीरों वाले का भी खूब इस्तेमाल होता था। हालांकि 1991 में इसका विरोध किया गया और इसके बाद जनवरों और पक्षियों की तस्वीरों का इस्तेमाल बंद हो गया।
हालांकि अब भी कुछ पार्टियों के पास ऐसे चुनाव निशान हैं। जैसे कि बीएसपी का निशान हाथी है। एमजीपी का शेर व नागा पीपुल्स फ्रंट का निशान मुर्गा है।

बीजेपी का चुनाव निशान
भारतीय जनता पार्टी आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। इसकी नींव 1980 में पड़ी थी। वैसे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में ही जनसंघ की नींव डाल दी थी। इसका चुनाव निशान दीपक हुआ करता था। आपातकाल खत्म होने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया और इसका निशान ‘हलधर किसान’ हो गया। 1980 में जब भाजपा बनी तो इसके पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसके बाद हिंदू परंपरा से जोड़कर इस पार्टी का चुनाव निशान कमल चुना गया। भाजपा ने इसलिए भी कमल को चुना क्योंकि इसका इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन में भी अंग्रेजों के खिलाफ किया गया था।

‘पंजे’ की कहानी
पहले कांग्रेस का चुनावी निशान ‘दो बैलों की जोड़ी’ हुआ करता था। हालांकि जब कांग्रेस में फूट पड़ी तो जगजीवन राम वाली कांग्रेस (आर) को असली कांग्रेस माना गया। वहीं निजलिंगप्पा कि अध्यक्षता वाली कांग्रेस (ओ) को दो बैलों की जोड़ी निशान नहीं दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि दोनों ही गुट अब पुराने निशान का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसके बाद 1971 में कांग्रेस (ओ) को चरखा और कांग्रेस (आर) को बछड़ा और गाय चुनाव निशान दे दिया गया।

कांग्रेस (आर) फिर टूटी
बाद में कांग्रेस (आर) फिर टूट गई। तब इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) को ‘हाथ के पंजे’ का निशान दिया गया । इंदिरा गांधी गाय और बछड़ा वाला ही निशान चाहती थीं लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के ही फैसले को बरकरार रखा। इस तरह पार्टियां टूटने के बाद निशान बदलते गए और 1978 से कांग्रेस का चुनावी निशान हाथ का पंजा ही है।

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