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मजदूर से बने हाई कोर्ट के जस्टिस

- मीलों नंगे पांव जाते थे स्कूल, जंगल में बीनते थे लकड़ी

by Blitzindiamedia
December 13, 2024
in the blitz
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नागपुर। हाई कोर्ट जस्टिस यनशिवराज खोबरागड़े आज जिस मुकाम पर हैं, वह बेहद गर्व वाला है। यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। विदर्भ के धूल भरे खेतों से बॉम्बे हाईकोर्ट तक पहुंचने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। वह उस जगह और उस परिवार से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं, जहां लोग सामान्य पढ़ाई तक के बारे में नहीं सोचते थे, हाई कोर्ट जस्टिस होने की बात तो उनके लिए असंभव सी थी। महाराष्ट्र के भंडारा के एक आदिवासी गांव रेंगापार में 9 मई, 1966 को जन्मे जस्टिस यनशिवराज खोबरागड़े की यात्रा ने धैर्य, शिक्षा और दयालुता के माध्यम से प्रणालीगत बाधाओं को पार किया।

रेंगापार में तब न तो बिजली थी और न ही उचित सड़कें। न्यायमूर्ति खोबरागड़े का प्रारंभिक जीवन अभाव और जीवनयापन से भरा था। उनके पिता गोपीचंद और मां अनुराधा अनपढ़ थे। वे आदिवासी इलाके में रहते थे, फिर भी गोपीचंद और अनुराधा ने अपने आठ बच्चों में शिक्षा की अलख जगाई।

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ऐसे जाते थे स्कूल
न्यायमूर्ति खोबरागड़े याद करते हैं, ‘मुझे याद है कि 40 पैसे की स्कूल फीस भरने के लिए मैं जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करता था।’ नंगे पांव मीलों चलकर स्कूल जाना पड़ता था। अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए छोटी-मोटी नौकरियां तक कीं। काम के साथ पढ़ाई-लिखाई का भी संतुलन बनाया। छुट्टियों के दौरान खेतों में काम किया लेकिन अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी।

इंटर में हुए फेल
जस्टिस यनशिवराज की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन उन्होंने संघर्षों से हार नहीं मानी। वह कक्षा 12 में अंग्रेजी में फेल हो गए। इस मौके ने उन्हें हताश किया और एक बार मन में आया कि बस, यहीं से पढ़ाई छोड़ दूं लेकिन उन्होंने एक बार फिर दृढ़ संकल्प के साथ पढ़ाई शुरू की। उन्होंने बताया, ‘डॉ. भीमराव आंबेडकर के शब्द, ‘शिक्षा शेरनी का दूध है’ ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।’

पढ़ाई छोड़कर करने लगे मजदूरी
यनशिवराज ने अपनी इंटर की परीक्षा दूसरे साल पास की और आगे की पढ़ाई जारी रखी। हालांकि परिस्थितियां ऐसी हुईं कि उन्हें पढ़ाई बीच में रोककर काम की तलाश करनी पड़ी। अक्टूबर 1984 में वह काम की तलाश में भटक रहे थे। नौकरी न मिलने के कारण वह हताश-निराश हो गए थे। किस्मत ने उन्हें एडवोकेट जनरल अरविंद बोबडे के ड्राइवर रामेश्वर से मिलवाया। रामेश्वर ने उन्हें बोबडे के घर पर बगीचे में मजदूर की नौकरी दिलवा दी।

मिली क्लर्क की नौकरी, आगे पढ़ाई की पूरी
बोबडे, खोबरागड़े की विनम्रता और दृढ़ संकल्प से प्रभावित हुए, उन्हें अपने कानूनी कार्यालय में क्लर्क की नौकरी की पेशकश की। उन्होंने कहा, ‘उस पल ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी।’ बोबडे और उनके बेटे शरद, जो बाद में सीजेआई बने, के मार्गदर्शन में खोबरागड़े ने काम करते हुए बीकॉम की पढ़ाई पूरी की और फिर नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उन्होंने जल्द ही शरद और बाद में जस्टिस अनिल किलोर के अंडर प्रैक्टिस शुरू कर दी।

ऐसे बने बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस
2008 में खोबरागड़े ने जिला न्यायपालिका की प्रतियोगी परीक्षा पास की और उन्हें मुंबई में सिविल जज नियुक्त किया गया। इसके बाद वे चंद्रपुर में जिला जज और महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण के रजिस्ट्रार बने। 7 अक्टूबर, 2022 को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। उन्होंने कहा, ‘यह मील का पत्थर सिर्फ़ मेरा नहीं है, यह हर वंचित बच्चे के लिए संदेश है कि सपने सच होते हैं।’ हाल ही में बार एसोसिएशन से सम्मानित किए जाने के बाद, उनकी कहानी का जश्न कानूनी दिग्गजों ने मनाया।

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