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करोड़ों झिलमिल तारों ने प्रयागराज में रच दी एक नई आकाशगंगा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 9, 2025
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Crores of twinkling stars created a new galaxy in Prayagraj
ब्लिट्ज ब्यूरो

यागराज। सन 1976 में माघ के किसी रोज गंगा किनारे फूस की झोपड़ी में सो रहे निर्मल वर्मा की नींद मुंह अंधेरे सीटी की तीखी आवाज से टूटी थी। तब सच्चे महाराज के चौकीदार ने उन्हें बताया था कि सीटी पुलिसवाले बजाते हैं ताकि श्रद्धालु अंधेरे में संगम का रास्ता न भटक जाएं। अब कुंभ के दौरान संगम पर कभी रात ही नहीं होती। सूरज के डूबने से पहले ही लाखों लाइटें जल उठती हैं। इस बार तो महाकुंभ की जगमगाहट अंतरिक्ष तक से दिखाई पड़ी। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन ने दूर आसमान से संगम की तस्वीरें ली हैं। ऐसा लगता है, मानो करोड़ों-करोड़ झिलमिल तारों ने मिलकर एक नई आकाशगंगा रच दी हो।

– अंतरिक्ष से भी दिख रहा संगम तट का आधी रात का नजारा
– गौरवशाली है अखाड़ों का शाही स्नान

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इतना जगमग है महाकुंभ मेला… इसके बावजूद सीटी बज रही है, लगातार और मेला क्षेत्र के हर कोने में। फूंक मारते-मारते एक जवान का दम फूले, उससे पहले ही दूसरा फूंक मारने लगता है। सीटी अब भी श्रद्धालुओं को रास्ता दिखा रही है।

तारीख बदल चुकी है। रात के एक बज रहे हैं। चार घंटे बाद शाही स्नान होना है। किसी और मौके पर चार घंटे बहुत भारी लग सकते हैं, लेकिन विशेष अवसर पर साधु-संतों का शाही स्नान होना है, तो समय भी कम है। पुलिस-प्रशासन तैयारियों में लगा है। उसे एक-एक इंच कवर करना है, कहीं कोई चूक न रह जाए।

शाही स्नान की कवरेज
इसी एक-एक इंच की लड़ाई शाही स्नान कवर कर रहे फोटो जर्नलिस्ट्स की भी है। उन्हें ऐसी जगह चाहिए जहां से संगम का विशाल किनारा और ऊपर दूर तक साफ आसमान दिखे। बीच में कोई भी रुकावट उन्हें बर्दाश्त नहीं, लेकिन ऐसी जगहें बहुत कीमती हैं। साउथ मुंबई और दिल्ली के लुटियंस जोन से भी कीमती। इतनी ज्यादा कि कई लोग रात 9 बजे ही पहुंच गए, 8 घंटे पहले।

कुछ विदेशी भी थे
इस भीड़ में कुछ विदेशी भी हैं, कुछ जर्नलिस्ट, कुछ ब्लॉगर और कुछ डॉक्यूमेंट शूट करने वाले। बिल्कुल हैरान और हत्प्रभ। माहौल को समझने और उसमें एडस्ट करने की कोशिश करते हुए।

12 साल इंतजार पूरा
अमेरिका की एक लेडी फोटोग्राफर ने माथे पर हाथ रख ही लिया और जो कहा उसका अंग्रेजी अनुवाद है, ‘हे भगवान!’ यह जिद्दोजहद 12 साल बाद आने वाले दुर्लभ पलों को कैद करने की है। सभी को पता है कि अगर इससे चूके तो फिर 12 साल इंतजार करना होगा।

सीटियां ज्यादा तेज हो गईं ं
तड़के 3 बजते-बजते सीटियां ज्यादा तेज हो गईं । उनकी आवाज के स्तर का सीधा संबंध आने वाली भीड़ से है। यह तेज आवाज इशारा भी है कि शाही स्नान का समय नजदीक आ रहा है। हर कोई अपना रोल प्ले करने में लगा है। ट्रैक्टर से फूल-माला लाई गई हैं। इनसे साधु-संतों का स्वागत होना है। पैरामिलिट्री फोर्स के जवान रस्सी लेकर आ गए हैं। भीड़ को रस्सी से एक सीध में करने की तैयारी है। सफाईकर्मी पहले से साफ रास्ते को और साफ कर रहे हैं। कच्चे मार्ग पर पड़ी लोहे की शीट पर बार-बार संगम की रेत फैल जाती है और सफाईकर्मी उसे ही हटाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। अखाड़ों के रास्ते में एक तिनका भी नहीं होना चाहिए, यहां तक कि माला से बिछुड़कर गिर गए फूलों को भी एक कोने में कर दिया जा रहा है।

ढोल-नगाड़ों की आवाज
4 बजने को है और दूर से ढोल-नगाड़ों की आवाज सुनाई पड़ने लगी। इधर फुसफुसाहट शुरू हुई, ‘अखाड़े चल दिए हैं।’ पहला स्नान श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी का है। अचानक कानों के पास भिनभिनाहट होने लगी। कई ड्रोन हवा में मंडराने लगे हैं। इन्हें अखाड़ों का पैगाम लेने भेजा जा रहा है। कुछ ही मिनट में लाइव तस्वीरें आने लगीं… ‘पहला अखाड़ा पीपा पुल तक पहुंच चुका है।’ नगाड़ों की थाप बिल्कुल साफ सुनाई पड़ रही है। हर थाप लगता है कि दिल पर पड़ रही है और उसके साथ रोमांच की नई लहर उठती है। पता है कि क्या होने वाला है, ड्रोन सब दिखाने लगा है कि क्या आ रहा है, फिर भी सब दम साधे उस रास्ते को निहारे जा रहे हैं, जिससे होकर शाही यात्रा आनी है। जब मोबाइल और ड्रोन नहीं थे और पैगाम नगाड़ों से मिलता था, तब क्या गजब रोमांच रहता होगा!

5 बजने के पहले ही दर्शन
5 बजने के पहले ही उनके दर्शन हुए। अनुभवी लोगों ने कहा, इस बार अखाड़ों का शाही स्नान जल्दी शुरू हो गया। घोड़े, रथ, धर्म ध्वजा, तलवार, त्रिशूल और गदा लहराते नागा, उद्घोष करते संत और जयकारा लगाते श्रद्धालु – ठंड में घंटों टकटकी लगाए बैठे रहने का हर सेकेंड सार्थक हो गया। अब न ड्रोन की भिनभिनाहट सुनाई पड़ रही है, न लाउडस्पीकर का शोर और न सीटी की पीं-पीं। सारे स्वर महानाद में विलीन हो चुके हैं। महा स्नान, महादर्शन के सपने ने मूर्त, साक्षात रूप ले लिया।

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