ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जनता अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से संसद इसलिए चलाती है कि वहां देश के भविष्य का निर्माण हो, न कि वह अरण्यरोदन और कोलाहल का अखाड़ा बने।
संसद का मॉनसून सत्र 2026 अनिश्चितकालीन स्थगन के साथ समाप्त हो गया। यह सत्र लगभग 7,023 मिनट के भारी गतिरोध और हंगामे की भेंट चढ़ गया जिसमें लोकसभा की उत्पादकता मात्र 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत ही दर्ज की गई। मूल्यवान समय की इस भीषण बर्बादी के कारण लगभग 175.6 करोड़ रुपये के करदाताओं के धन का अपव्यय हुआ जबकि कई अहम विधेयक बिना सार्थक चर्चा के जल्दबाजी में पारित कर दिए गए।
कैसा और कितना रहा मौजूदा मॉनसून सत्र?
वर्ष 2026 का मॉनसून सत्र विधायी कामकाज के लिहाज से अत्यंत निराशाजनक और गतिरोधपूर्ण रहा। नीट पेपर लीक और अन्य ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच ऐसा शीतयुद्ध छिड़ा कि सदन की गरिमा लगातार तार-तार होती रही। लोकसभा की उत्पादकता गिरकर मात्र 19 प्रतिशत पर सिमट गई जो हालिया वर्षों के सबसे निचले स्तरों में एक है। राज्यसभा की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं रही और वहां भी बमुश्किल 39 प्रतिशत कामकाज ही हो सका। सत्र के दौरान कुल 12 विधेयक पारित तो हुए लेकिन लोकसभा में अधिकांश विधेयक बिना किसी गंभीर और विस्तृत चर्चा के ही पास करा लिए गए। प्रश्नकाल और शून्यकाल जैसे जनता के सीधे मुद्दों से जुड़े सत्र हंगामे के शोर में लगभग पूरी तरह से गायब रहे और कोई भी सार्थक चर्चा उभर कर सामने नहीं आ सकी।
सत्ता और विपक्ष का हंगामा: कितना औचित्यपूर्ण?
लोकतंत्र में संसद का मंच केवल कानून पास करने की मशीन नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही तय करने और असहमतियों को दर्ज कराने का सर्वोच्च केंद्र होता है लेकिन वर्तमान सत्र में दोनों पक्षों का रवैया अजीब सा रहा। सरकार ने जहां कुछ मुद्दों पर चर्चा कराने की सहमति दी वहीं पूरे विपक्ष का रवैया भी पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना रहा। जब सरकार ने चर्चा की हामी भरी तो विपक्ष यदि चाहता तो उस दौरान सत्तापक्ष को घेर सकता था; पर उसने हंगामे के रास्ते को ही चुना। यही नहीं, विपक्ष सदन के बाहर भी सिर्फ हंगामा ही करता रहा जिससे निश्चित रूप से देश की जनता के हाथ सिर्फ निराशा ही हाथ लगी; इसमें कोई दोराय नहीं।
विपक्ष का पक्ष: विपक्ष का तर्क था कि नीट जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार चर्चा से बच रही है इसलिए आक्रामक विरोध और नारेबाजी उनकी मजबूरी थी। हालांकि, विरोध का यह तरीका जब सदन के पूर्ण बहिष्कार या वेल में आकर कार्यवाही ठप करने तक सीमित हो जाता है तो जनता के सवालों की गूंज ही दब जाती है।
सत्तापक्ष का पक्ष: सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि वे हर मुद्दे पर बहस को तैयार थे लेकिन विपक्ष ने जानबूझकर सदन नहीं चलने दिया और विधायी कार्यों को बाधित किया।
विश्लेषण: ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं दोनों ही पक्ष राजनीतिक श्रेय लेने की इस खुली जंग में संसद की मूल आत्मा यानी ‘संवाद और मंथन’ को भूल गए। विपक्ष ने व्यवधान को अपनी राजनीतिक जीत माना तो सरकार ने बिना चर्चा के बिल पास करवाकर अपनी राह आसान कर ली जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।
जनता के धन की बर्बादी और उसकी कीमत
संसद की कार्यवाही का एक मिनट चलाना भी देश के आम नागरिकों के खून-पसीने की कमाई से संभव होता है। एक अनुमान के मुताबिक संसद का परिचालन खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट बैठता है। इस सत्र में लगभग 7,023 मिनट का समय केवल हंगामे, नारेबाजी और बार-बार के स्थगन की वजह से बेकार चला गया। इस प्रकार करदाताओं के लगभग 175.6 करोड़ रुपये बिना किसी जनहितैषी और सार्थक वैधानिक विमर्श के पानी में बह गए। वित्तीय नुकसान से भी बड़ा आघात लोकतांत्रिक जवाबदेही को पहुंचा है। जब सांसद बहस करने के बजाय सिर्फ शोर मचाते हैं, तो देश की जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
कुल मिला कर यह कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि संसद का यह सत्र इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि हमारे राजनीतिक दल तीखे मतभेदों को अनुशासित संवाद में बदलने में नाकाम हो रहे हैं। यदि सत्तापक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष को विश्वास में ले तो विपक्ष को भी यह समझना होगा कि विरोध का अधिकार सदन को बंधक बनाकर नहीं बल्कि सदन के अंदर अपनी बौद्धिक क्षमता से अपनी बात मनवाकर पूरा होता है। जनता अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से संसद इसलिए चलाती है कि वहां देश के भविष्य का निर्माण हो, न कि वह अरण्यरोदन और कोलाहल का अखाड़ा बने।













