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मोदी सरकार की पॉलिसी से बड़े नुकसान से बचा भारत

15 देश कहते रहे हो जाओ आरसीईपी में शामिल, पर मोदी ने पकड़ी अलग राह

by ब्लिट्ज़ इंडिया
November 22, 2024
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। मोदी सरकार की पॉलिसी के चलते भारत बड़े नुकसान से बचा है। एक नई रिपोर्ट में भारत के आरसीईपी से बाहर निकलने के फैसले को एकदम सही बताया गया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। उसने बताया है कि इस ट्रेड ग्रुप में शामिल होने से भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता था। ऐसा खासतौर से चीन के साथ हो सकता था। इससे देश के उद्योगों, खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएसई) को भी नुकसान होने की आशंका थी।

भारत 2019 में रीजनल इकनॉमिक कॉम्पि्रहेंसिव पार्टनरशिप (आरसीईपी) से बाहर हो गया था। उसे चिंता थी कि इससे व्यापार असंतुलन बढ़ेगा। स्थानीय उद्योगों को नुकसान होगा। आरसीईपी एक बड़ा मुक्त व्यापार समझौता है। इसमें 10 आसियान देश और 6 व्यापारिक भागीदार – चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत (जो शामिल नहीं हुआ) शामिल हैं। ये देश मिलकर दुनिया की 30% जीडीपी और दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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क्यों शामिल न होने का फैसला सही?
जीटीआरआईकी रिपोर्ट अजय श्रीवास्तव और अभिजीत दास ने लिखी है। इसमें कहा गया है कि भारत के व्यापार और ढांचागत चुनौतियों के कारण उसे आरसीईपी में शामिल नहीं होना चाहिए। रिपोर्ट में कई मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है।

व्यापार घाटा: एफटीए के बाद से आसियान, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा बहुत बढ़ गया है। 2007-09 और 2020-22 के बीच आसियान के साथ यह 302.9%, दक्षिण कोरिया के साथ 164.1% और जापान के साथ 138.2% बढ़ा है।

चीन का व्यापार: वित्त वर्ष 2023-24 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 85 अरब डॉलर है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि आरसीईपी से स्थिति और खराब हो सकती थी। इसकी वजह से चीनी सामान दूसरे सदस्य देशों के रास्ते भारत के बाजारों में आसानी से पहुंच सकते थे।
एमएसएमई को खतरा: अगर टैरिफ-मुक्त आयात की अनुमति मिलती तो भारत के छोटे उद्योगों को बड़े चीनी उद्योगों से मुकाबला करने में मुश्किल हो सकती थी। इससे घरेलू उद्योगों को नुकसान हो सकता था।

निर्यात में कम लाभ: भारत का आरसीईपी के 15 देशों में से 13 के साथ पहले से ही एफटीए है। ये देश न्यूजीलैंड और चीन को छोड़कर हैं। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे निर्यात के नए अवसर बहुत कम मिलते क्योंकि पिछले पांच वर्षों में चीन को भारतीय निर्यात में गिरावट आई है।

दावों को गलत किया साबित
जीटीआरआई की स्टडी उन दावों को चुनौती देती है जो कहते हैं कि आरसीईपी में शामिल होने से भारत को ग्लोबल वैल्यू चेन (जीवीसी) में शामिल होने में मदद मिलती। आसियान , जापान और दक्षिण कोरिया के साथ लंबे समय से एफटीए होने के बावजूद भारत जीवीसी में एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर नहीं पाया है। इसकी वजह धीमा पोर्ट क्लीयरेंस और ईज-ऑफ-डूइंग-बिजनेस रैंकिंग कम होना जैसे मुद्दे हैं।

नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने हाल ही में सुझाव दिया था कि भारत को बड़े व्यापार क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए आरसीईपी में शामिल होने पर फिर से विचार करना चाहिए। हालांकि, रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि ये फायदे जोखिमों से ज्यादा नहीं हो सकते हैं, खासकर कृषि और एमएसएमई जैसे कमजोर क्षेत्रों के लिए।

यह स्टडी एफटीए और बढ़े हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के बीच संबंधों के बारे में मिलेजुले साक्ष्य भी दिखाती है। एफडी को अक्सर आरसीईपी में शामिल होने का एक बड़ा कारण बताया जाता है।

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