ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस हफ़्ते की घटनाओं से तात्कालिक राजनीति हटा दें तो पीछे एक स्थायी तकनीकी समस्या बचती है, जिसे भारत मौजूदा विवाद के निपटने के बाद भी बरसों हल करता रहेगा। एक उपमहाद्वीप के हर ज़िले में फैले दो करोड़ से ज़्यादा नौजवानों को एक ही दिन, एक जैसी कठिनाई और पूरी सुरक्षा के साथ एक ही परीक्षा कैसे कराई जाए — और यह हर साल कैसे दोहराया जाए? दुनिया में बहुत कम देश इस पैमाने की कोशिश करते हैं। यह कठिनाई नीयत की कमी नहीं है; यह रसद, कूट-विज्ञान और संस्थागत बनावट की असली समस्या है, और इसे इसी रूप में समझा जाना चाहिए।
कमज़ोरी रहस्यमयी नहीं, ढांचागत है। एक बार छपकर हज़ारों केंद्रों तक भौतिक रूप से पहुंचाया गया प्रश्नपत्र अपने पीछे अभिरक्षा की एक लंबी शृंखला छोड़ता है, जिसमें हर अतिरिक्त हाथ जोखिम का एक और बिंदु है। यही वजह है कि सुधार की बहस कंप्यूटर आधारित परीक्षा पर आकर टिकी है, जो एक प्रश्नपत्र की जगह एक बड़ा, संतुलित प्रश्न-बैंक रखती है और उसमें से हर अभ्यर्थी के लिए अलग सेट निकालती है — यानी वह चीज़ ही हटा देती है जिसे पहले से चुराया जा सके। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीटी की ओर बढ़ने पर ख़ास सवाल पूछा, और उसे डेटा सुरक्षा तथा साइबर सुरक्षा से जोड़ा: यह सुधार एक भौतिक जोखिम की जगह एक डिजिटल जोखिम रखता है, और डिजिटल जोखिम को उतनी ही गंभीरता से साधना होगा।
पैमाने की समस्या: दो करोड़ से ज़्यादा अभ्यर्थियों वाली एक ही दिन की परीक्षा हज़ारों केंद्रों तक फैली अभिरक्षा शृंखला बनाती है — यही ढांचागत वजह है कि सुधार की चर्चा संतुलित प्रश्न-बैंक वाली कंप्यूटर आधारित परीक्षा पर आ टिकी है
पेपर लीक सिर्फ़ एक परीक्षा के साथ अपराध नहीं है। यह हर उस ईमानदार अभ्यर्थी पर लगाया गया कर है जिसने दो साल तैयारी की और बदले में सिर्फ़ एक बराबर ज़मीन मांगी।
बड़ी तस्वीर
• पैमाना: दो करोड़ से अधिक अभ्यर्थियों की एक दिवसीय राष्ट्रीय परीक्षा
• कमज़ोर कड़ी: छपे प्रश्नपत्रों की लंबी भौतिक अभिरक्षा शृंखला
• प्रस्तावित हल: बड़े संतुलित प्रश्न-बैंक से कंप्यूटर आधारित परीक्षा
• नई ज़रूरत: साइबर सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और केंद्र स्तर पर ऑडिट
ईमानदारी से यह भी कहना होगा कि सीबीटी अकेले सब कुछ हल नहीं करता। प्रश्नों का संतुलन इतना सटीक होना चाहिए कि अलग-अलग सेट पाने वाले अभ्यर्थियों में से किसी को न फ़ायदा हो न नुक़सान — यह कठिन मापन-शास्त्रीय समस्या है और असली निष्पक्षता इसी पर टिकी है। केंद्रों पर भरोसेमंद बिजली, इंटरनेट और बायोमेट्रिक पहचान चाहिए, और यह निवेश किसी ज़िला मुख्यालय में महानगर से बिलकुल अलग होता है। इतनी क्षमता चाहिए कि कम समय में लाखों अभ्यर्थी बैठ सकें, और ग्रामीण अभ्यर्थी को ज़्यादा दूर न जाना पड़े। साथ ही लगातार ऑडिट ज़रूरी है, क्योंकि सेंध लगाने वाले भी तरीक़े बदलते हैं। ये सब कठिन शर्तें हैं, पर हैं इंजीनियरिंग की शर्तें — और इंजीनियरिंग की शर्तें पूरी की जा सकती हैं।
इससे गहरी बात परीक्षा के नीचे दबी है। नीट पर दबाव इतना तीखा इसलिए है कि सीटें कम हैं और अभ्यर्थी बहुत ज़्यादा, और हमने एक नौजवान की पूरी ज़िंदगी का फ़ैसला एक अंक-तालिका में समेट दिया है। गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा की क्षमता बढ़ाना, भरोसेमंद वैकल्पिक पेशेवर रास्ते खोलना, और अभ्यर्थियों के लिए काउंसलिंग व मानसिक स्वास्थ्य सहायता मज़बूत करना — ये तीनों परीक्षा का तापमान घटाते हैं, चाहे वह किसी भी तरीक़े से कराई जाए। इसलिए आगे का रास्ता दो पटरियों पर साथ चलता है: परीक्षा को तकनीकी रूप से अभेद्य बनाना, और एक नौजवान का भविष्य एक सुबह पर थोड़ा कम निर्भर करना। पहली पटरी पर काम अब दिख रहा है। दूसरी लंबी और शांत परियोजना है, और उतनी ही ज़रूरी।














