ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान इस महीने अहम रूप से क़रीब आई, और वह भी सबसे भरोसेमंद तरीक़े से — सुरक्षा के ज़रिये। इसरो ने गगनयान के चालक-दल मॉड्यूल के तीन महत्वपूर्ण योग्यता परीक्षण पूरे कर लिए हैं: यह जांचना कि समुद्र में उतरते समय कैप्सूल अपने यात्रियों की कैसे रक्षा करता है, उड़ान में चालक और सेवा मॉड्यूल कैसे साफ़-सुथरे तरीक़े से अलग होते हैं, और पैराशूट खुलते वक़्त मॉड्यूल अपनी संरचनात्मक मज़बूती कैसे बनाए रखता है। किसी अंतरिक्ष यात्री के बैठने से पहले हर एक को पार करना ज़रूरी है।
ये परीक्षण एक सोची-समझी कड़ी का हिस्सा हैं। पहली मानवरहित उड़ान, गगनयान G1, इसी साल की तीसरी तिमाही के लिए तैयार की जा रही है, ताकि पूरी उड़ान का पूर्वाभ्यास किया जा सके। दूसरी मानवरहित उड़ान, G2, इस साल के आख़िर में तय है, जिसमें व्योममित्र नाम का मानव-रूपी रोबोट यात्री की सीट पर बैठेगा, केबिन पर नज़र रखेगा और इंसानी दल की जगह लेकर दिखाएगा कि हर प्रणाली कैसा व्यवहार करती है। इन पूर्वाभ्यासों के बाद ही भारत मानवसहित उड़ान की कोशिश करेगा, जिसका लक्ष्य 2027 है।
वापसी का पूर्वाभ्यास: इसरो ने गगनयान के तीन परीक्षण पास किए — समुद्र में उतरने की सुरक्षा, मॉड्यूल का अलग होना, और पैराशूट चरण में मज़बूती — इसी साल मानवरहित G1 और साल के आख़िर में रोबोट व्योममित्र वाली G2 उड़ान से पहले।
कोई राष्ट्र इंसान को कक्षा में भेजने से पहले एक रोबोट, एक पूर्वाभ्यास और सौ परीक्षण भेजता है। तालियां उड़ान के लिए होती हैं; उपलब्धि उन सब में है जो उससे पहले आता है।
एक नज़र में
• पास हुए: तीन मॉड्यूल परीक्षण — समुद्र-लैंडिंग, अलगाव, पैराशूट चरण की मज़बूती
• G1: पहली मानवरहित उड़ान का लक्ष्य इसी साल की तीसरी तिमाही
• G2: साल के आख़िर में, रोबोट व्योममित्र के साथ
• मानवसहित उड़ान: 2027 का लक्ष्य; इस साल इसरो के सात मिशनों का इरादा
इस कम-चमक वाले काम पर जश्न क्यों बनता है? क्योंकि मानव अंतरिक्ष उड़ान किसी शॉर्टकट को माफ़ नहीं करती, और किसी इंसान के रॉकेट पर बैठने से पहले हर आपात-प्रणाली, हर पैराशूट और हर अलगाव को परखने का अनुशासन ही इस पूरी कवायद का मक़सद है। व्योममित्र जैसा मानव-रूपी ‘स्टैंड-इन’ इंजीनियरों को जीवन-रक्षक और केबिन प्रणालियों का असली उड़ान-डेटा बिना किसी दल को जोखिम में डाले जुटाने देता है — भरोसा ख़रीदने का एक स्मार्ट और किफ़ायती तरीक़ा। इसरो प्रमुख वी. नारायणन के मुताबिक़ इस साल सात मिशनों तक की योजना के साथ, मानव कार्यक्रम एक व्यस्त और परिपक्व होते प्रक्षेपण कैलेंडर के भीतर बैठता है।
सकारात्मक रास्ता है धैर्य का इनाम। योजना के मुताबिक़ हुआ हर ज़मीनी परीक्षण एक जोखिम कम करता है; हर मानवरहित उड़ान उस दिन की रिहर्सल है जो सबसे ज़्यादा मायने रखेगा। इसी तरह, अपने ही नागरिकों को कक्षा में भेजने वाला चौथा देश बनने की भारत की राह सावधानी से, पड़ाव-दर-पड़ाव बन रही है — और यह सोची-समझी रफ़्तार कोई देरी नहीं, बल्कि वही चीज़ है जो अंतिम उड़ान को सुरक्षित बनाएगी।













