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अदालत, बातचीत और सुधार की रूपरेखा: परीक्षा पर भरोसा लौटाने की कोशिश

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 25, 2026
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सुप्रीम कोर्ट

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।इस हफ़्ते तीन अलग-अलग रास्ते एक ही सवाल पर आकर मिले, और यह सवाल देश के लाखों नौजवानों की ज़िंदगी से जुड़ा है — क्या भारत उस परीक्षा की साख की गारंटी दे सकता है जो तय करती है कि कौन डॉक्टर बनेगा? शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि नीट-यूजी में बार-बार होने वाली चूकों का सिलसिला ख़त्म होना चाहिए, और सुधारों की विस्तृत रूपरेखा मांगी। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने केंद्र तथा राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) से नए हलफ़नामे दाख़िल करने को कहा, जिनमें पेपर लीक के बाद हुई प्रगति और दीर्घकालिक उपायों का ब्योरा हो। मामले पर अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।

अदालत की बात किसी एक घटना पर नहीं, पूरे ढांचे पर थी। पीठ ने कहा कि परीक्षा व्यवस्था को तात्कालिक इंतज़ामों से आगे बढ़कर स्थायी संस्थागत सुरक्षा-उपायों की ओर जाना होगा, ताकि पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। ख़ास तौर पर कोर्ट ने पूछा कि नीट को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) में बदलने के प्रस्ताव पर कितनी प्रगति हुई है, और इसके साथ डेटा सुरक्षा तथा साइबर सुरक्षा के क्या इंतज़ाम होंगे। सॉलिसिटर जनरल ने सुधारों की समग्र तस्वीर रखने के लिए कुछ दिन का समय मांगा।

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तात्कालिक नहीं, स्थायी हल: सुप्रीम कोर्ट ने नीट-यूजी में स्थायी सुधार की रूपरेखा मांगी है, जिसमें कंप्यूटर आधारित परीक्षा की ओर बढ़ने और डेटा सुरक्षा के इंतज़ाम शामिल हैं; अगली सुनवाई 27 जुलाई को।

परीक्षा दरअसल एक वादा है जो देश अपने नौजवानों से करता है — मेहनत करो, नतीजा सिर्फ़ तुम्हारा होगा। अभी जो कुछ हो रहा है, वह इसी वादे को अटूट बनाने की कोशिश है।

एक नज़र में

• अदालत: जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आराधे ने सुधारों की रूपरेखा व हलफ़नामे मांगे
• ज़ोर: कंप्यूटर आधारित परीक्षा, डेटा व साइबर सुरक्षा के इंतज़ाम
• अगली सुनवाई: 27 जुलाई
• बातचीत: केंद्रीय मंत्रियों और छात्र प्रतिनिधियों के बीच तीसरा दौर

अदालती रास्ते के साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी चल रहा है। केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा और जितेंद्र सिंह आंदोलन कर रहे छात्र संगठन के प्रतिनिधियों सौरव दास और आशुतोष रांका से तीसरे दौर की बातचीत कर रहे हैं; सरकार का कहना है कि वह किसी भी समय बातचीत को तैयार है और चार औपचारिक प्रस्ताव भेज चुकी है। शुक्रवार तड़के शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गुरुग्राम के अस्पताल में अपना 26 दिन लंबा अनशन लिखित आश्वासनों के बाद समाप्त कर दिया — कि परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही पर संसद में चर्चा होगी, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर दर्ज मामले वापस लिए जाएंगे, और जिन छात्रों की आत्महत्या से मृत्यु हुई उनके परिवारों को मुआवज़ा मिलेगा। मतभेद खुलकर सामने हैं: छात्र पक्ष शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े और अधिक मुआवज़े की मांग पर क़ायम है, और आगे की बातचीत की जगह तय होनी बाक़ी है।

आगे का रचनात्मक रास्ता इन तीनों रास्तों की साझा बात में दिखता है। एक अदालत जो सिर्फ़ फ़ैसला नहीं, सुधार की रूपरेखा मांग रही है; एक सरकार जो बयानों के बजाय लिखित आश्वासन दे रही है; और छात्र प्रतिनिधि जो अपनी बात संस्थाओं के भीतर रखकर लड़ रहे हैं — यह सब मिलकर बताता है कि एक लोकतंत्र अपनी तकलीफ़ को खुले में हल करने की कोशिश कर रहा है। असली कसौटी अब सुधार ख़ुद है: कंप्यूटर आधारित परीक्षा उतनी ही सुरक्षित होगी जितने उसके प्रश्न-बैंक, केंद्र स्तर की निगरानी और ऑडिट के रिकॉर्ड मज़बूत होंगे — और यह सब हर साल दो करोड़ से ज़्यादा अभ्यर्थियों के पैमाने पर बनाना होगा। 27 जुलाई की सुनवाई में देश देखेगा कि यह योजना कितनी दूर पहुंची है।

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