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सरकारें सभी प्राइवेट प्रॉपर्टी पर कब्जा नहीं कर सकतीं: सुप्रीम कोर्ट

45 साल पुराने फैसले को सर्वोच्च अदालत ने किया खारिज

by ब्लिट्ज़ इंडिया
November 8, 2024
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। क्या देश और राज्य की सरकार संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) के तहत किसी व्यक्ति या समुदाय की निजी संपत्ति को समाज या सामाजिक ढांचे के नाम पर अपने नियंत्रण में ले सकती है? इस जटिल सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकार सभी निजी संपत्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकती, जब तक कि वे सार्वजनिक हित से न जुड़ रहे हों। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बड़ी बेंच ने 7:1 के बहुमत से अपने अहम फैसले में कहा कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को राज्य द्वारा अधिग्रहित नहीं किया जा सकता। हालांकि यह भी कहा गया कि राज्य उन संसाधनों पर दावा कर सकता है जो सार्वजनिक हित के लिए हैं और समुदाय के पास हैं।

इसके साथ ही सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने 1978 के बाद के उन फैसलों को पलट दिया है, जिनमें समाजवादी विषय को अपनाया गया था और कहा गया था कि सरकार आम भलाई के लिए सभी निजी संपत्तियों को अपने कब्जे में ले भी सकती है। इस बाबत न्यायाधीशों का बहुमत का फैसला लिखते हुए कहा कि सभी निजी संपत्तियां भौतिक संसाधन नहीं हैं और इसलिए सरकारों द्वारा इन पर कब्ज़ा भी नहीं किया जा सकता है।

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बेंच 16 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 1992 में मुंबई स्थित प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन द्वारा दायर मुख्य याचिका भी शामिल थी।
कोर्ट ने कहा कि, ‘हर निजी संपत्ति को सामुदायिक संपत्ति नहीं कह सकते। कुछ खास संसाधनों को ही सरकार सामुदायिक संसाधन मानकर इनका इस्तेमाल आम लोगों के हित में कर सकती है।’

बेंच ने 1978 में दिए जस्टिस कृष्ण अय्यर के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि, ‘सभी निजी संपत्तियों पर राज्य सरकारें कब्जा कर सकती हैं।’ सीजेआई बोले- पुराना फैसला विशेष आर्थिक, समाजवादी विचारधारा से प्रेरित था।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस हृषिकेश रॉय, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा, राजेश बिंदल, एससी शर्मा और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने बहुमत का फैसला सुनाया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बहुमत के फैसले से आंशिक रूप से असहमति जताई, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने सभी पहलुओं पर असहमति जताई।

क्या मांग की गई थी
प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन ने महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डिवेलपमेंट एक्ट(महाडा) के अध्याय आठ-ए का विरोध किया था।
1986 में जोड़ा गया यह अध्याय राज्य सरकार को जीर्ण-शीर्ण इमारतों और उसकी जमीन को अधिग्रहित करने का अधिकार देता है, बशर्ते उसके 70% मालिक ऐसा अनुरोध करें। इस संशोधन को प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन की ओर से चुनौती दी गई।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि महाडा प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 31 सी द्वारा संरक्षित हैं, जिसे कुछ नीति निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाले कानूनों की रक्षा के इरादे से 1971 के 25 वें संशोधन अधिनियम द्वारा डाला गया था।

क्या है महाराष्ट्र सरकार का कानून?
राज्य सरकार इमारतों की मरम्मत के लिए महाराष्ट्र आवास एवं क्षेत्र विकास प्राधिकरण कानून 1976 के तहत इन मकानों में रहने वाले लोगों पर उपकर लगाता है। इसका भुगतान मुंबई भवन मरम्मत एवं पुनर्निर्माण बोर्ड को किया जाता है, जो इन इमारतों की मरम्मत का काम करता है।
अनुच्छेद 39 (बी) के तहत दायित्व को लागू करते हुए महाडा अधिनियम को साल 1986 में संशोधित किया गया था। इसमें धारा 1ए को जोड़ा गया था, जिसके तहत भूमि और भवनों को प्राप्त करने की योजनाओं को क्रियान्वित करना शामिल था, ताकि उन्हें जरूरतमंद लोगों को ट्रांसफर किया जा सके।
बेंच ने 1 मई को अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और तुषार मेहता सहित कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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