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कम बारिश की सबसे तेज़ मार दाल पर पड़ी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 23, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।इस मानसून में बारिश साढ़े ग्यारह फ़ीसदी कम रही। लेकिन धान की बुवाई सिर्फ़ सवा दो फ़ीसदी घटी और दाल की आठ फ़ीसदी तक। यही अंतर बताता है कि सिंचाई कहाँ पहुँची है और कहाँ नहीं।

मौसम विभाग के आँकड़ों के मुताबिक़ 1 जून से 5 अगस्त 2026 तक देश में 434.5 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य 491.0 मिलीमीटर है — यानी 11.5 फ़ीसदी की कमी। जुलाई के आख़िर तक दाल और मोटे अनाज की बुवाई पिछले साल के मुक़ाबले 6 से 8 फ़ीसदी घट चुकी थी, जबकि धान में गिरावट सिर्फ़ 2.2 फ़ीसदी और कपास में 2.4 फ़ीसदी थी। कुल खरीफ़ रक़बा पिछले साल से 38.8 लाख हेक्टेयर पीछे चल रहा था।

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अरहर की दाल। एक ही कमी से धान का रक़बा सवा दो फ़ीसदी घटा और दाल का आठ फ़ीसदी तक — यह फ़र्क़ खेती का नहीं, नहर और ट्यूबवेल का है।

अगस्त में मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश होती है और खरीफ़ की क़रीब 20 फ़ीसदी बुवाई। इसलिए कमज़ोर अगस्त सिर्फ़ खड़ी फ़सल नहीं सुखाता — वह बुवाई का फ़ैसला ही रोक देता है।

एक नज़र में

• बारिश, 1 जून–5 अगस्त 2026: 434.5 मिमी, सामान्य 491.0 मिमी — 11.5 फ़ीसदी कम
• मौसम विभाग का अनुमान: अगस्त और अगस्त–सितंबर में सामान्य से कम बारिश (दीर्घावधि औसत के 94 फ़ीसदी से नीचे)
• खरीफ़ रक़बा, जुलाई अंत: पिछले साल से 38.8 लाख हेक्टेयर पीछे
• बुवाई में गिरावट: दाल और मोटा अनाज 6–8%, धान 2.2%, कपास 2.4%
• अगस्त का हिस्सा: मानसून की क़रीब 29% बारिश, खरीफ़ की क़रीब 20% बुवाई
• इक्रा का अनुमान: 2026 में कुल खरीफ़ बुवाई 1–2 फ़ीसदी घट सकती है
• सरकार का क़दम: 2026-27 तक 528 दाल प्रोसेसिंग यूनिट

दरअसल यह अंतर ही असली ख़बर है। धान और कपास ज़्यादातर वहाँ बोए जाते हैं जहाँ पानी पक्का है — नहर के कमांड इलाक़े, ट्यूबवेल वाली पट्टियाँ, वे मैदान जहाँ पचास साल की सिंचाई का पैसा लगा। दाल को दशक-दर-दशक उस ज़मीन पर धकेला गया जहाँ सिंचाई पहुँची ही नहीं — मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के सूखे ऊपरी इलाक़े, जहाँ फ़सल इसी बात पर जीती-मरती है कि बारिश कब आई और दो बौछारों के बीच कितना अंतर रहा। यह इत्तिफ़ाक़ नहीं है। साठ के दशक के अनाज संकट के बाद देश ने तय किया था कि पक्के पानी वाली हर इंच ज़मीन अनाज को दी जाए, क्योंकि प्रोटीन से पहले पेट भरना ज़रूरी था। वह लड़ाई भारत जीत गया। उसकी क़ीमत आज दाल के आयात बिल में चुकती है।

इसीलिए इस महीने देखने लायक़ आँकड़ा बारिश का नहीं, कैलेंडर का है। मौसम विभाग ने अगस्त में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है, और अगस्त में मानसून की क़रीब 29 फ़ीसदी बारिश तथा खरीफ़ की क़रीब 20 फ़ीसदी बुवाई होती है। बड़ी बात यह है कि कमज़ोर अगस्त खड़ी फ़सल से पानी ही नहीं छीनता — वह उस किसान से बुवाई का फ़ैसला भी छीन लेता है जो अभी इंतज़ार कर रहा था। यही वह रास्ता है जिससे मौसम की मामूली कमी एक ख़ास फ़सल पर भारी चोट बन जाती है।

अब आगे का रास्ता। 528 दाल प्रोसेसिंग यूनिट, कोल्ड स्टोरेज और बाज़ार से जुड़ाव — यह सही क़दम है और असली दिक़्क़त पर है: फ़सल कटते ही दाम गिर जाना, और खेत से पैकेट तक के बीच किसान का हिस्सा निकल जाना। इससे एक हेक्टेयर दाल का मुनाफ़ा बढ़ेगा। लेकिन प्रोसेसिंग यूनिट न तो नया रक़बा पैदा करती है, न फूल आने के वक़्त खेत में पानी पहुँचाती है। वह काम दूसरी चीज़ें करेंगी — दाल वाले ज़िलों में खेत-तालाब और चेक डैम, बिना नहर वाली ज़मीन पर टपक और फ़व्वारा सिंचाई, कम अवधि वाली और गर्मी सहने वाली क़िस्में जो अगस्त में देर से भी बोई जा सकें, और अच्छी पैदावार के साल में भी समर्थन मूल्य पर सचमुच होने वाली ख़रीद। भारत ने अनाज की समस्या पानी, बीज और पक्की ख़रीद — तीनों को एक साथ लगाकर हल की थी। थाली की दाल उसी तिकड़ी का इंतज़ार कर रही है।

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