ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इसका आप पर क्या असर पड़ेगा? गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोना 4,550 डॉलर प्रति औंस के ऊपर और चांदी 67 डॉलर के ऊपर चली गई। लेकिन यह तेज़ी माँग की नहीं, डॉलर के कमज़ोर होने की है — और यह फ़र्क़ भारतीय ख़रीदार के लिए बहुत मायने रखता है।
सोना डॉलर में तय होता है। जब डॉलर कमज़ोर होता है तो सोने का डॉलर-भाव अपने आप ऊपर चला जाता है, भले ही दुनिया में सोने की माँग रत्ती भर न बदली हो। गुरुवार को यही हुआ — अमेरिकी ट्रेज़री ने बॉन्ड यील्ड की तेज़ी थामने के लिए क़दम उठाया, डॉलर नीचे आया, और सोना-चांदी दोनों चढ़ गए। उसी वजह से भारतीय शेयर बाज़ार भी ऊपर बंद हुआ और रुपया मज़बूत हुआ।
डॉलर का खेल: सोने की छड़ें। डॉलर कमज़ोर होने से सोने का डॉलर-भाव बढ़ जाता है — पर अगर उसी दिन रुपया मज़बूत हो, तो यह पूरी बढ़त घरेलू भाव तक नहीं पहुँचती।
अगर उसी दिन रुपया मज़बूत हुआ है, तो डॉलर में दिखी पूरी तेज़ी आपकी दुकान के भाव तक नहीं पहुँचेगी।
एक नज़र में
• सोना: 4,550 डॉलर प्रति औंस से ऊपर, 20 अगस्त
• चांदी: 67 डॉलर प्रति औंस से ऊपर
• सोना-चांदी अनुपात: क़रीब 67.9
• वजह: कमज़ोर डॉलर, अमेरिकी ट्रेज़री के दख़ल के बाद
• उसी दिन शेयर बाज़ार: सेंसेक्स +0.82%, निफ़्टी +0.64%
• रुपया: उसी सत्र में मज़बूत
• चांदी की औद्योगिक माँग: सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली के कॉन्टैक्ट
• भारत में सीज़न: सितंबर के आख़िर से त्योहार और शादी की ख़रीद शुरू
चांदी की कहानी सोने से अलग है। दुनिया में चांदी की क़रीब आधी माँग उद्योग से आती है, और उसमें सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला हिस्सा सोलर पैनल का है — सोलर सेल बनाने में चांदी का पेस्ट लगता है। भारत ख़ुद बड़े पैमाने पर सोलर लगा रहा है, यानी जिस धातु को घरों में गहने और बचत के तौर पर ख़रीदा जाता है, उसकी औद्योगिक माँग भी यहीं बन रही है।
सोना-चांदी अनुपात पर नज़र रखिए — यानी एक औंस सोना ख़रीदने के लिए कितने औंस चांदी चाहिए। अभी यह क़रीब 67.9 है। यह अनुपात ऊँचा हो तो चांदी सोने के मुक़ाबले सस्ती मानी जाती है, नीचे हो तो महंगी। ख़रीदारी का फ़ैसला किसी एक धातु के भाव से नहीं, इस रिश्ते से बेहतर समझ आता है।
अब घरेलू बाज़ार की बात। त्योहार और शादी की ख़रीद सितंबर के आख़िर से शुरू होती है, और सर्राफ़ा कारोबारी अगस्त-सितंबर में माल भरते हैं। अगर सीज़न से ठीक पहले भाव चढ़ जाए तो उनका स्टॉक महंगा पड़ता है — और यह अक्सर धातु के भाव में नहीं, मेकिंग चार्ज में दिखता है। गहना ख़रीदते वक़्त सिर्फ़ भाव नहीं, मेकिंग चार्ज भी पूछिए।
सीधी बात यह है: यह अभी करेंसी की ख़बर है, माँग की नहीं। अगर डॉलर संभल गया तो इस तरह की तेज़ी का एक हिस्सा वापस चला जाता है। और अगर नहीं संभला तो जो वजह गुरुवार को थी, वही आगे भी रहेगी। एक दिन के आँकड़े से आगे का अंदाज़ा लगाना ठीक नहीं — हॉलमार्क देखकर और मेकिंग चार्ज पूछकर ख़रीदना हमेशा ठीक है।













