ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर 18.5 मीटर की गहरे ड्राफ्ट वाली क्षमता चालू हो गई है। बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने 21 अगस्त को 427.80 करोड़ रुपये की सात परियोजनाएँ शुरू कीं, जिनमें 352 करोड़ रुपये चैनल गहरा करने पर लगे। इसी दिन 1,580.36 करोड़ रुपये के तीन रियायत समझौतों पर दस्तख़त हुए, जिनसे 2.3 करोड़ टन सालाना की मशीनी क्षमता जुड़ेगी।
पारादीप पूर्वी भारत के इस्पात और रिफाइनिंग क्षेत्र के लिए कोकिंग कोल, लौह अयस्क और पेट्रोलियम सँभालता है। इसकी अड़चन कभी समुद्र नहीं रही। अड़चन दो रही हैं — घाट पर पानी की गहराई, जो तय करती है कि कितना बड़ा जहाज साथ लग सकता है, और भीतर जाने वाली लाइन पर पटरियों की संख्या, जो तय करती है कि माल कितनी तेजी से निकलता है। दोनों पर बहत्तर घंटे के भीतर, दो अलग मंत्रालयों ने, ऐसी दो विज्ञप्तियों में कदम उठाए जो एक-दूसरे का ज़िक्र नहीं करतीं।
इससे दो दिन पहले, 19 अगस्त को, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेल मंत्रालय की चार मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को 9,450 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। इनकी कुल लंबाई 410 किलोमीटर है और इनमें से तीन उसी रास्ते पर हैं जो पारादीप तक जाता है।
घाट पर पानी गहरा हो और वैगन स्टॉकयार्ड खाली न कर पाएँ, तो उस गहराई की कोई कीमत नहीं — और उसी समस्या के दोनों सिरे सुलझाने वाली दो मंजूरियाँ तीन दिन के अंतर पर आईं, और किसी विज्ञप्ति ने दूसरी का नाम नहीं लिया।
एक नज़र में
● 427.80 करोड़ रुपये — पारादीप बंदरगाह पर शुरू हुई सात परियोजनाएँ, इनमें 352 करोड़ रुपये का चैनल गहरीकरण (बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय, 21 अगस्त 2026)
● 1,580.36 करोड़ रुपये — तीन बीओटी रियायत समझौते, 50 लाख, 80 लाख और 1 करोड़ टन सालाना क्षमता (वही विज्ञप्ति)
● 80 प्रतिशत अभी, 2030 तक 100 प्रतिशत — पारादीप में घाटों का मशीनीकरण और लक्ष्य (वही विज्ञप्ति)
● 9,450 करोड़ रुपये — चार रेल मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंत्रिमंडल की मंजूरी, 410 किलोमीटर, पूरा होने का लक्ष्य 2030-31 (रेल मंत्रालय, 19 अगस्त 2026)
● 72 किलोमीटर — कटक-पारादीप तीसरी और चौथी लाइन (वही विज्ञप्ति)
● 173 और 75 किलोमीटर — खड़गपुर-भद्रक चौथी लाइन और भद्रक-हरिदासपुर चौथी लाइन (वही विज्ञप्ति)
● 7.6 करोड़ टन सालाना — चारों परियोजनाओं से मिलने वाली अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता, पूरा चालू होने पर (वही विज्ञप्ति)
18.5 मीटर का मतलब क्या है
ड्राफ्ट यानी वह गहराई जो लदे हुए जहाज को अपने नीचे चाहिए, और यह इस पर बढ़ती है कि जहाज कितना माल ले जा रहा है। जहाँ घाट पर पानी पूरे लदे जहाज के ड्राफ्ट से कम हो, वहाँ ऐसे जहाज को या तो मूल बंदरगाह से आंशिक भरकर चलना पड़ता है, या समुद्र में रुककर माल छोटे जहाजों में उतारना पड़ता है। इस दूसरी प्रक्रिया को लाइटरिंग कहते हैं और यह हर टन पर कई दिन और खर्च जोड़ देती है। 352 करोड़ रुपये का गहरीकरण, जो जहाज नई गहराई में समा सकते हैं उनके लिए, यही कदम हटाता है।
427.80 करोड़ रुपये के पैकेज की बाकी नामजद परियोजनाएँ सहारा देने वाली हैं — 24.89 करोड़ रुपये का 500 मीटर लंबा तीन लेन का दूसरा अठारबंकी पुल, 15.50 करोड़ रुपये की जहाज यातायात प्रबंधन प्रणाली, 546 आवासों तक पाइप वाली गैस पहुँचाने पर 20 करोड़ रुपये, प्रशासनिक भवन पर 12.18 करोड़ और खेल छात्रावास पर 2.10 करोड़ रुपये। यातायात प्रबंधन प्रणाली वही है जो गहराई के साथ मिलकर असर बढ़ाती है, क्योंकि गहरा चैनल तभी काम का है जब उसमें जहाजों की आवाजाही का समय कसकर तय हो। ये पाँच और गहरीकरण मिलाकर 426.67 करोड़ रुपये बनते हैं, जबकि विज्ञप्ति सात परियोजनाओं के लिए 427.80 करोड़ रुपये बताती है — यानी करीब 1.13 करोड़ रुपये की एक परियोजना का ब्योरा उसमें नहीं है।
जो जुड़ चुका है और जो अभी कागज़ पर है
427.80 करोड़ रुपये का काम चालू हो गया है। 1,580.36 करोड़ रुपये का काम अभी शुरू नहीं हुआ। ये तीनों समझौते बीओटी यानी बनाओ-चलाओ-सौंपो शर्तों पर हैं — 498.69 करोड़ रुपये का 50 लाख टन वाला साउथ क्वे, 630.67 करोड़ रुपये का 80 लाख टन वाला बहुउद्देशीय बर्थ और 451 करोड़ रुपये का 1 करोड़ टन वाला कैप्टिव सीक्यू-3। निजी संचालक खुद पैसा लगाता है और रियायत अवधि में हैंडलिंग शुल्क से वसूलता है। यह क्षमता आने वाले वक्त की है। दोनों आँकड़े जोड़कर एक नंबर नहीं बनाया जाना चाहिए, और जब तक क्रेन चलने न लगें, 2.3 करोड़ टन गिने भी नहीं जाने चाहिए।
यही अनुशासन रेल मंजूरी पर लागू होता है। 9,450 करोड़ रुपये एक स्वीकृति है जिसकी समयसीमा 2030-31 है। एक भी पटरी अभी नहीं बिछी। रेल मंत्रालय जिन 7.6 करोड़ टन सालाना क्षमता, 6,448 गाँवों और करीब 60 लाख आबादी की बात करता है, और तेल आयात में 13 करोड़ लीटर और कार्बन उत्सर्जन में 65 करोड़ किलो की कमी का जो अनुमान देता है, वे सब पूरा चालू होने पर के अनुमान हैं।
दोनों फ़ैसले एक कहानी क्यों हैं
चारों रेल खंडों को बंदरगाह के नक्शे पर रखिए। कटक-पारादीप वही 72 किलोमीटर का रास्ता है जो बंदरगाह के गेट तक जाता है। भद्रक-हरिदासपुर के 75 किलोमीटर ओडिशा का लौह अयस्क ढोते हैं। खड़गपुर-भद्रक की 173 किलोमीटर लंबी लाइन झारखंड और पश्चिम बंगाल के इस्पात संयंत्रों की तरफ़ जाने वाली मुख्य लाइन है। यानी 410 में से 320 किलोमीटर उसी गलियारे पर हैं जिसे पारादीप भरता है। चौथा खंड, 90 किलोमीटर का गुम्मिडिपुंडी-गुडूर, अलग समस्या हल करता है — वह चेन्नई-विजयवाड़ा मुख्य लाइन का दबाव घटाता है।
दोनों विज्ञप्तियों में यह जोड़ कहीं नहीं है। बंदरगाह वाली विज्ञप्ति घाट पर टन और रुपये गिनती है, रेल वाली लाइन के किनारे किलोमीटर और गाँव। साथ रखने पर दोनों एक ही निकासी ढाँचे की तस्वीर बनाती हैं, जिसमें समुद्र वाला सिरा और ज़मीन वाला सिरा एक साथ चौड़े हो रहे हैं — और यही इकलौता क्रम है जिसमें दोनों में से कोई भी निवेश अपना वादा पूरा करता है।
जोखिम कहाँ है
दोनों की समयसीमा एक नहीं है। गहराई अभी उपलब्ध है। घाटों का मशीनीकरण रियायत की उन तारीखों पर चलेगा जो विज्ञप्ति में नहीं दी गईं। रेल क्षमता 2030-31 तक आएगी। यानी चार साल तक एक ऐसा बंदरगाह, जो बड़े जहाज ले सकता है और तेज़ी से माल उतार सकता है, उस लाइन पर माल छोड़ेगा जो अभी चौड़ी नहीं हुई। यह अड़चन बनेगी या नहीं, यह इस पर टिका है कि 2.3 करोड़ टन की नई घाट क्षमता में से कितनी चौथी लाइन से पहले चालू हो जाती है। क्रम का यह सवाल दो मंत्रालयों के बीच पड़ा है और किसी एक दस्तावेज़ में इसका जवाब नहीं है।
जवाबदेही दफ़्तर के हिसाब से साफ़ बँटी है। गहराई और घाट चालू करना पारादीप पोर्ट अथॉरिटी के जिम्मे है, जो बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के अधीन है। मल्टीट्रैकिंग का काम रेल मंत्रालय के अधीन पूर्व तट रेलवे और दक्षिण पूर्व रेलवे मंडलों के जिम्मे है। दोनों के बीच का तालमेल किसी एक के जिम्मे नहीं है, और ऐसी ही खाली जगह भरने के लिए पीएम गति शक्ति बना था।
ब्लिट्ज़ की सलाह
इस गलियारे के लिए एक साझा कमीशनिंग कैलेंडर छपना चाहिए। पारादीप पोर्ट अथॉरिटी और पूर्व तट रेलवे अगर अपनी दोनों समयसारिणी एक ही पन्ने पर रख दें — घाट-दर-घाट मशीनीकरण की तारीखें और खंड-दर-खंड लाइन चालू होने की तारीखें — तो तालमेल की खाली जगह चार साल पहले ही दिख जाएगी, और उन शिपरों को भी दिखेगी जिन्हें इसी के हिसाब से योजना बनानी है। इसका औज़ार पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान में पहले से मौजूद है; कमी सिर्फ़ इस एक गलियारे के लिए तारीखवार छपे खाके की है। दूसरा कदम बिना खर्च का है — रेल मंत्रालय चारों स्वीकृत खंडों की तिमाही प्रगति रुपये में नहीं, बिछी पटरी के किलोमीटर में बताए, ताकि पाठक को पैसा खर्च होता नहीं, लाइन बनती दिखे।
मोबाइल फोन योजना में भारतीय ब्रांड को मिलेगी ऊँची दर
देश की अपनी मोबाइल कंपनियों को अब विदेशी ब्रांड के लिए असेंबली करने वाली कंपनियों से ज़्यादा प्रोत्साहन मिलेगा। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 21 अगस्त को 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना अधिसूचित की, जो 2026-27 से 2030-31 तक पाँच वित्त वर्ष चलेगी।
योजना में दो खंड हैं। पहला खंड बड़े पैमाने के विनिर्माण का है और इसमें 2.25 से 5 प्रतिशत तक की दर मिलेगी। इसमें आने के लिए 2025-26 में 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार चाहिए, पुराने ब्रांड को 5,000 करोड़ रुपये की सालाना बिक्री बनाए रखनी होगी और नए ब्रांड को 10,000 करोड़ रुपये तक पहुँचना होगा।
दूसरा खंड सिर्फ़ भारतीय ब्रांड के लिए है। इसमें 5 प्रतिशत की बुनियादी दर है और भारतीय डिजाइन और शोध पर 3 प्रतिशत और मिलेगा। इसमें आने के लिए 2025-26 में सिर्फ़ 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार चाहिए, लेकिन 51 प्रतिशत से ज़्यादा भारतीय हिस्सेदारी, भारतीय प्रबंधन और देश में ही बौद्धिक संपदा, ट्रेडमार्क और शोध भी ज़रूरी है। दोनों खंडों में घरेलू खरीद पर 1.5 प्रतिशत तक और मिल सकता है, बशर्ते कम से कम 25 प्रतिशत स्थानीयकरण हो।
सारी दरें जोड़ दें तो भारतीय ब्रांड के लिए 9.5 प्रतिशत और बड़े विनिर्माता के लिए 6.5 प्रतिशत बनता है। यह 3 अंक का फ़र्क विज्ञप्ति में कहीं लिखा नहीं है, पर उसी की दी हुई दरों से निकलता है।
मंत्रालय का अनुमान है कि योजना की अवधि में करीब 39 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन होगा और करीब 60,000 सीधे रोजगार बनेंगे। ये दोनों आगे के अनुमान हैं, हुआ हुआ काम नहीं। 62,500 करोड़ रुपये भी खर्च की गई रकम नहीं, आने वाले उत्पादन पर देय ऊपरी सीमा है। आवेदन कब से लिए जाएँगे, यह विज्ञप्ति में नहीं है।
एक महीने में 15.6 प्रतिशत महँगी हुई चीनी
त्योहारी सीजन से पहले चीनी का खुदरा भाव 20 जुलाई के 48.18 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 20 अगस्त को 55.70 रुपये प्रति किलो पर पहुँच गया। खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने 21 अगस्त को इसकी वजह और इस पर उठाए गए चार कदम बताए।
मौजूदा सीजन का उत्पादन अब करीब 306 लाख टन रहने की उम्मीद है, जबकि शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन का था। देश की सामान्य पैदावार 320 से 340 लाख टन रहती है और घरेलू खपत 280 से 290 लाख टन। अंतरराष्ट्रीय भाव 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गया — 16 प्रतिशत से ज़्यादा की तेजी। 2026-27 में दुनिया में करीब 33 लाख टन की कमी का अनुमान है।
चार कदम ये हैं। कारोबारियों पर 1 अगस्त से 30 नवंबर तक 400 टन की भंडारण सीमा। 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं पर 15 दिन की खपत की सीमा। 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की इजाजत। और राज्यों और मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह।
तीन आँकड़े वैसे नहीं हैं जैसे दिखते हैं। 306 लाख टन उस सीजन का अनुमान है जो अभी बंद नहीं हुआ। 10 लाख टन इजाजत है, बंदरगाह पर उतरा माल नहीं। और अक्टूबर में 10 लाख टन से ऊपर उत्पादन की उम्मीद इसी शर्त पर है कि मिलें सचमुच 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करें, अपनी पुरानी तारीख से नहीं।
विभाग ने यह भी बताया कि एथेनॉल की तरफ़ चीनी का मोड़ 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गया, 20 अगस्त तक गन्ने का 97 प्रतिशत बकाया चुका दिया गया, और 2014 से 2021 के बीच इस क्षेत्र को 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई जबकि 2021-22 के बाद कोई नई सब्सिडी नहीं दी गई।
मानसून अब तक 13 प्रतिशत पीछे चल रहा
देश में 1 जून से 19 अगस्त तक बारिश दीर्घावधि औसत से 13 प्रतिशत कम रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने 20 अगस्त को जारी अपने विस्तारित पूर्वानुमान में यह आँकड़ा दिया, जो 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून को विभाग की “सामान्य से कम” श्रेणी में रखता है।
कमी हर जगह बराबर नहीं है। 13 से 19 अगस्त वाले हफ़्ते में दक्षिण प्रायद्वीप में 42.7 मिलीमीटर के सामान्य के मुकाबले सिर्फ़ 19.5 मिलीमीटर बारिश हुई — 54 प्रतिशत कम। उसी हफ़्ते पूर्व और पूर्वोत्तर भारत 12 प्रतिशत, मध्य भारत 10 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत 7 प्रतिशत पीछे रहे। उत्तर प्रदेश में 21 अगस्त तक मौसम की कुल बारिश 525.7 मिलीमीटर के सामान्य के मुकाबले 443.1 मिलीमीटर रही, यानी 16 प्रतिशत कम। राज्य के पूर्वी हिस्से में यह कमी 23 प्रतिशत है और पश्चिमी हिस्से में 4 प्रतिशत।
20 से 26 अगस्त के लिए विभाग का अनुमान है कि देश में कुल मिलाकर बारिश सामान्य से कम रहेगी। मध्य भारत में सामान्य से सामान्य से ज़्यादा, पूर्व और पूर्वोत्तर में सामान्य, और प्रायद्वीपीय भारत में सामान्य से कम। पूर्वोत्तर मध्य प्रदेश पर बने स्पष्ट चिह्नित कम दबाव क्षेत्र के चलते विभाग ने 21 और 22 अगस्त को पूर्वी मध्य प्रदेश में कहीं-कहीं भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की।
इन आँकड़ों को पढ़ते वक्त दो बातें अलग रखनी होंगी। 13 प्रतिशत अब तक की कुल कमी है, पूरे मौसम का आख़िरी आँकड़ा नहीं — मौसम 30 सितंबर तक चलेगा और विभाग की अपनी आगे की आगाही में अगले हफ़्ते मध्य भारत में सुधार का अनुमान है। और दक्षिण प्रायद्वीप का 54 प्रतिशत एक हफ़्ते का आँकड़ा है, उस इलाके की पूरे मौसम की स्थिति नहीं।
दक्षिण प्रायद्वीप सबसे ज़्यादा प्रभावित हो, ऐसा कम बारिश वाला मौसम खरीफ की फसल से आगे तक जाता है। जलाशयों का भंडार रबी की सिंचाई और पनबिजली, दोनों को चलाता है। सूखा सितंबर शाम की बिजली माँग उसी वक्त बढ़ा देता है जब पनबिजली का भंडार सबसे कम होता है।

1,033 में से 991 वन स्टॉप सेंटर ही चालू
मिशन शक्ति के तहत मंजूर 1,033 वन स्टॉप सेंटर में से 991 चालू हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने 21 अगस्त को अपनी सलाहकार समिति को यह जानकारी दी। बाकी 42 केंद्र मंजूर तो हैं, पर चल नहीं रहे।
वन स्टॉप सेंटर वह जगह है जहाँ हिंसा झेल रही महिला को पुलिस मदद, इलाज, कानूनी सलाह और अस्थायी आश्रय एक ही छत के नीचे मिलते हैं। मंजूरी की सूची में दर्ज पर ज़मीन पर मौजूद न होने वाला केंद्र उस ज़िले में यह पूरी सुविधा उपलब्ध नहीं होने देता। अब तक इन केंद्रों से 15.20 लाख से ज़्यादा महिलाओं को मदद मिली है।
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में मंत्रालय के मुताबिक 4.60 करोड़ से ज़्यादा लाभार्थियों को 21,343 करोड़ रुपये से ज़्यादा दिए जा चुके हैं। पहले बच्चे पर 5,000 रुपये मिलते हैं — गर्भावस्था पंजीकरण पर 3,000 और जन्म पर 2,000 — और दूसरा बच्चा बेटी होने पर 6,000 रुपये। लाभार्थियों की संख्या से बाँटने पर औसत करीब 4,640 रुपये आता है, जो दोनों में से कम हकदारी से भी नीचे है। इसकी सबसे संभावित वजह यह है कि कुछ लाभार्थियों को पहली किस्त मिली है और दूसरी अभी नहीं। सही ब्योरा मंत्रालय ही दे सकता है।
ये सभी आँकड़े योजना की शुरुआत से अब तक के जोड़ हैं, किसी एक साल के नहीं, और विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि जोड़ किस तारीख से शुरू होता है।
प्रशासनिक पक्ष में 21 मई 2025 से बायोमेट्रिक सत्यापन के जरिए 64.65 लाख लाभार्थी जोड़े गए और 1 जुलाई 2025 से ड्यू लिस्ट पहल से 36.42 लाख। महिला हेल्पलाइन 1515 का इस्तेमाल 22.52 लाख से ज़्यादा बार हुआ और एक लाख से ज़्यादा मिली शिकायतों में से 87 प्रतिशत से ज़्यादा निपटाई गईं। संकल्प के तहत 36 राज्य स्तरीय और 765 ज़िला स्तरीय महिला सशक्तीकरण केंद्र चल रहे हैं।
इस पूरी सूची में 42 केंद्रों वाली कमी सबसे छोटी और सबसे आसानी से भरी जा सकने वाली है। मंजूरी पहले से है; मंजूरी और शुरुआत के बीच आमतौर पर भवन, स्टाफ की नियुक्ति या ज़िला स्तर का वह आदेश खड़ा रहता है जो दोनों को जोड़े।
नए नियम से आए 4,895.65 करोड़ रुपये के 29 निवेश
सीमा से लगे देशों की हिस्सेदारी वाले विदेशी निवेश के बदले हुए ढाँचे के तहत अब तक 4,895.65 करोड़ रुपये के 29 प्रस्तावित निवेश आ चुके हैं। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने 21 अगस्त को यह आँकड़ा दिया, जो 20 अगस्त तक का है। ढील का असर पहली बार आँकड़े में सामने आया है।
ढाँचा प्रेस नोट 2 (2026) और विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण उपकरण) नियम, 2019 के उस संशोधन से बना है जो 1 मई 2026 को अधिसूचित हुआ। इसके तहत सीमा से लगे देश की 10 प्रतिशत तक की गैर-नियंत्रक हिस्सेदारी वाला निवेश अब सरकारी मंजूरी के बिना स्वचालित मार्ग से आ सकता है। पहले प्रेस नोट 3 (2020) के तहत ऐसे हर मामले को सरकारी मंजूरी के लिए भेजना पड़ता था, और इसी नियम ने वैश्विक वेंचर और निजी इक्विटी कोषों की एक बड़ी श्रेणी को भारत से बाहर रोक रखा था, क्योंकि उनके ढाँचे के भीतर छोटी-छोटी साझेदार हिस्सेदारियाँ बैठी थीं।
ये निवेश सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना और संचार, विनिर्माण, दवा, डेटा सेंटर और परिवहन सेवाओं में आए हैं। जिन देशों से आए, उनके नाम हैं — मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्ज़मबर्ग और केमैन आइलैंड्स।
इस सूची को दो तरह से पढ़ना ज़रूरी है। यह प्रस्तावित निवेश है, आया हुआ या लगा हुआ पैसा नहीं, और यह गिनती साढ़े तीन महीने का जोड़ है, किसी एक महीने का नहीं। और सूची में गिनाया गया एक भी देश सीमा से लगा हुआ नहीं है। ढील ने असल में वह पूँजी खोली है जो कहीं और पंजीकृत है, पर जिसकी मालिकाना शृंखला में कहीं सीमा से लगे देश की 10 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी बैठी थी।
अमेरिका ने भारतीय पेपरिका सत्त पर लगाई दोहरी ड्यूटी
केरल से जाने वाले ओलियोरेज़िन पेपरिका पर अमेरिका ने एक साथ दो तरह की ड्यूटी तय कर दी। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने 21 अगस्त को दोनों मामलों में अंतिम फ़ैसला प्रकाशित किया। ओलियोरेज़िन पेपरिका शिमला मिर्च से निकाला गया गाढ़ा रंग-सत्त है, जो अमेरिका में प्रसंस्कृत पनीर, नमकीन के मसाले और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल होता है।
सब्सिडी वाले मामले सी-533-939 में दरें इस तरह हैं — सिंथाइट इंडस्ट्रीज पर 25.42 प्रतिशत, मेन कैंकोर इंग्रीडिएंट्स पर 18.67 प्रतिशत और बाकी सभी भारतीय निर्यातकों पर 21.90 प्रतिशत। डंपिंग वाले मामले ए-533-938 में दरें हैं — सिंथाइट पर 5.78 प्रतिशत, मेन कैंकोर पर 4.24 प्रतिशत और बाकी सभी पर 5.08 प्रतिशत। दोनों मामलों में जाँच की अवधि 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 रही। दोनों ड्यूटी अमेरिकी सीमा पर एक साथ जमा करानी होंगी।
वाणिज्य विभाग ने 30 जनवरी 2026 की अपनी प्रारंभिक विज्ञप्ति में 2024 में भारत से इस उत्पाद के अमेरिकी आयात का मूल्य 5,64,41,682 डॉलर बताया था। इस कारोबार में भारत कई आपूर्तिकर्ताओं में से एक नहीं है — लगभग पूरा कारोबार भारत का ही है।
दो बातें ध्यान माँगती हैं। न्यू मेक्सिको की अकेली अमेरिकी कंपनी रेजोलेक्स ने जो याचिका दायर की थी, उसमें 235.82 से 284.83 प्रतिशत तक की डंपिंग का दावा था। वाणिज्य विभाग का अपना अंतिम आँकड़ा 4.24 से 5.78 प्रतिशत निकला। इस मामले में वह आँकड़ा दावा था और छपी हुई दरें फ़ैसला हैं, और सीमा पर वसूली फ़ैसले पर होती है। दूसरी बात, अभी ड्यूटी का आदेश जारी नहीं हुआ है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग को 21 अगस्त के फ़ैसले के 45 दिन के भीतर तय करना है कि अमेरिकी उद्योग को सचमुच नुकसान हुआ या नहीं। नुकसान न मिलने पर पूरी कार्यवाही खत्म हो जाएगी और जमा रकम लौटा दी जाएगी।
विभाग ने सिर्फ़ सिंथाइट के लिए, सिर्फ़ सब्सिडी वाले पक्ष पर, “गंभीर परिस्थितियाँ” भी मानी हैं, जिससे ड्यूटी प्रारंभिक फ़ैसले से पहले भेजी गई खेप तक पीछे जा सकती है। मेन कैंकोर के लिए, बाकी सभी निर्यातकों के लिए और पूरे डंपिंग मामले में यह निष्कर्ष नकारात्मक रहा।
असर कोच्चि से आगे खेत तक जाता है। इस सत्त के लिए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में उगने वाली ब्याडगी और तेजा मिर्च खरीदी जाती है।
विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा, पर पूरी बढ़त सोने से
14 अगस्त को खत्म हफ़्ते में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 716.9 अरब डॉलर रहा, जो हफ़्ते भर में 9.9 अरब डॉलर बढ़ा। भारतीय रिज़र्व बैंक ने 21 अगस्त को अपने साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक में यह जानकारी दी। विदेशी मुद्रा आस्तियाँ 7.2 अरब डॉलर बढ़कर 581.9 अरब डॉलर हुईं और सोना 2.7 अरब डॉलर बढ़कर 111.4 अरब डॉलर।
साल भर के आँकड़े अलग कहानी कहते हैं। कुल भंडार बारह महीने में 21.8 अरब डॉलर बढ़ा। इसी दौरान सोना 25.8 अरब डॉलर बढ़ा और विदेशी मुद्रा आस्तियाँ 4.1 अरब डॉलर घट गईं। यानी साल की पूरी बढ़त पहले से रखे सोने के भाव बढ़ने से आई है, नए डॉलर जुड़ने से नहीं।
यह फ़र्क इसलिए मायने रखता है कि भंडार काम किस चीज़ का करता है। सोना मूल्य संचय है। रुपये को सँभालने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा आस्तियाँ बेचता है, सोना नहीं। सोने के भाव से बढ़ा भंडार कागज़ पर बड़ा दिखता है, बाजार में उतना ही काम आता है जितना पहले।
रिज़र्व बैंक इन आँकड़ों को अनंतिम बताता है और अपनी टिप्पणी में लिखता है कि विदेशी मुद्रा आस्तियों में बैंक की अपनी एसडीआर धारिता और नेक्सस ग्लोबल पेमेंट्स में उसका योगदान शामिल नहीं है। आँकड़े 14 अगस्त तक के हैं और 21 अगस्त को छपे, यानी बाजार से एक हफ़्ता पीछे।
इसी पूरक के मुताबिक 31 जुलाई को अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की कुल जमा 2,69,41,367 करोड़ रुपये रही, जो साल भर में 10.2 प्रतिशत बढ़ी, और बैंक ऋण 2,20,78,095 करोड़ रुपये रहा, जो 10.0 प्रतिशत बढ़ा।













