ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।अगर आप 2009 के बाद से कहीं काम कर रहे हैं और मालिक ने आज तक आपका पीएफ खाता नहीं खुलवाया, तो क़ानून ने दोनों को एक मौका दिया है — और वह 31 अक्टूबर को बंद हो जाएगा।
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने सभी प्रतिष्ठानों से कहा है कि वे कर्मचारी नामांकन अभियान, 2026 का फ़ायदा उठाएँ। यह अभियान 29 जून 2026 से लागू है और 31 अक्टूबर 2026 तक खुला है। इसके तहत ऐसे कर्मचारियों को पीएफ में जोड़ा जा सकता है, जो 1 अप्रैल 2009 से 31 मार्च 2026 के बीच काम पर लगे लेकिन किसी भी वजह से पीएफ के दायरे से बाहर रह गए। यानी सत्रह साल का छूटा हुआ रिकॉर्ड, एक घोषणा में दुरुस्त।
किन जगहों पर सबसे ज़्यादा छूटता है: कपड़ा, गारमेंट, निर्माण, छोटे कारख़ाने और सेवा क्षेत्र — जहाँ मज़दूर जल्दी-जल्दी बदलते हैं और ठेके पर काम होता है। दस साल काम करने के बाद भी कई मज़दूरों के नाम कोई पेंशन रिकॉर्ड नहीं होता।
सबसे बड़ी राहत नामांकन नहीं है। राहत यह है कि जिन सालों में आपकी तनख़्वाह से पीएफ काटा ही नहीं गया, उन सालों का आपका हिस्सा माफ़ हो सकता है।
एक नज़र में
• योजना: कर्मचारी नामांकन अभियान, 2026
• कब से: 29 जून 2026 · कब तक: 31 अक्टूबर 2026
• किस अवधि के लिए: 1 अप्रैल 2009 से 31 मार्च 2026 — 17 वित्त वर्ष
• कौन पात्र: इसी अवधि में जुड़ा हो, कभी पीएफ में न आया हो, और घोषणा के दिन जीवित हो व उसी संस्थान में काम कर रहा हो
• बड़ी राहत: जो हिस्सा तनख़्वाह से कटा ही नहीं, वह माफ़ हो सकता है
• क्या मिलेगा: भविष्य निधि, पेंशन और बीमा
• यूएएन कैसे बनेगा: उमंग ऐप पर चेहरे से पहचान (फ़ेस ऑथेंटिकेशन)
• पैसा कैसे जमा होगा: इलेक्ट्रॉनिक चालान-कम-रिटर्न (ईसीआर) से
तीन शर्तें हैं और तीनों ध्यान से पढ़ने लायक़ हैं। पहली — कर्मचारी 1 अप्रैल 2009 से 31 मार्च 2026 के बीच उस संस्थान में जुड़ा हो। दूसरी — वह किसी भी कारण से पीएफ योजना से बाहर रह गया हो; अभियान यह नहीं पूछता कि कारण क्या था, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है। तीसरी — घोषणा वाले दिन वह जीवित हो और उसी संस्थान में काम कर रहा हो। यही आख़िरी शर्त इस अभियान की सीमा भी है: यह मौजूदा कर्मचारी का रिकॉर्ड ठीक करने का रास्ता है, नौकरी छोड़ चुके या दिवंगत कर्मचारी का नहीं।
मालिक के लिए इसमें फ़ायदा क्या है? सीधी बात — जिन सालों में कर्मचारी का अपना हिस्सा तनख़्वाह से काटा ही नहीं गया, वह हिस्सा शर्तों के साथ माफ़ हो सकता है। यानी संस्थान को आज की तनख़्वाह से पुराने साल का पैसा वसूलने की नौबत नहीं आएगी। प्रक्रिया भी जान-बूझकर आसान रखी गई है — हर घोषित कर्मचारी का यूएएन उमंग ऐप पर चेहरे से पहचान के ज़रिए बन जाता है, इसलिए काग़ज़ इकट्ठा करने का वह झंझट नहीं रहता जिसमें पिछली बार सब अटक जाता था। पैसा सामान्य ईसीआर से जमा होगा।
असल फ़ायदा जोड़-घटाव से बड़ा है। इस अभियान में जुड़ने वाले मज़दूर को सिर्फ़ एक बचत खाता नहीं मिलता — उसे यूएएन मिलता है, और यूएएन एक बार बन जाए तो हर अगली नौकरी में साथ चलता है। साठ की उम्र पर पहुँचकर किसी के पास बिखरे हुए टुकड़े होते हैं और किसी के पास पूरा रिकॉर्ड — फ़र्क़ यहीं से शुरू होता है। तो आज ही एक काम कीजिए: अपने दफ़्तर के अकाउंट्स वाले से पूछिए कि आपके नाम पर यूएएन है या नहीं। अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो अक्टूबर बीतने से पहले बनवा लीजिए।














