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धान का रकबा घटा, दाल और कपास जस के तस

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 20, 2026
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पीएम-किसान अब 2031 तक चलेगी

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।इसका आपकी थाली पर क्या असर पड़ेगा? इस बार खरीफ़ की बुवाई पिछले साल से 2.02 फ़ीसदी पीछे है। लेकिन असली बात यह है कि यह गिरावट पूरी टोकरी में नहीं फैली — लगभग सारी की सारी एक ही फ़सल में है, और वह है धान।

14 अगस्त तक खरीफ़ की कुल बुवाई 1,016.57 लाख हेक्टेयर हुई, जबकि पिछले साल इसी तारीख़ तक 1,037.52 लाख हेक्टेयर थी। यानी 20.95 लाख हेक्टेयर कम। अब इसे फ़सल के हिसाब से तोड़िए। धान इस बार 379.07 लाख हेक्टेयर, पिछले साल 393.44 लाख हेक्टेयर — यानी 14.37 लाख हेक्टेयर की कमी। सिर्फ़ यह एक फ़सल पूरी गिरावट का 68.6 फ़ीसदी है।

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सबसे ज़्यादा पानी वाली फ़सल: उमरिया, मध्य प्रदेश में धान का खेत। रोपाई वाला धान खरीफ़ की सबसे ज़्यादा पानी माँगने वाली फ़सल है — इसीलिए रकबा किस फ़सल में घटा, यह कितना घटा से ज़्यादा मायने रखता है।

दाल का रकबा जस का तस है। यही सबसे राहत की बात है, क्योंकि थाली की महंगाई सबसे तेज़ दाल से बढ़ती है।

एक नज़र में

• कुल खरीफ़ रकबा, 14 अगस्त: 1,016.57 लाख हेक्टेयर
• पिछले साल इसी दिन: 1,037.52 लाख हेक्टेयर
• कमी: 20.95 लाख हेक्टेयर, यानी 2.02 फ़ीसदी
• धान: 379.07 लाख हेक्टेयर — 14.37 लाख हेक्टेयर या 3.65 फ़ीसदी कम
• पूरी कमी में धान का हिस्सा: 68.6 फ़ीसदी
• दालें: 108.14 लाख हेक्टेयर — सिर्फ़ 0.32 फ़ीसदी कम
• मोटा अनाज / मिलेट: 172.96 लाख हेक्टेयर
• कपास: 107.30 लाख हेक्टेयर — 0.89 फ़ीसदी कम
• आँकड़े: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की साप्ताहिक बुवाई रिपोर्ट

दाल और कपास में कोई बड़ा बदलाव नहीं है। दालें 0.32 फ़ीसदी कम हैं — 108 लाख हेक्टेयर के आधार पर यह गिनती में भी मुश्किल से आता है। कपास 0.89 फ़ीसदी कम है। मोटा अनाज 172.96 लाख हेक्टेयर पर है। अगर बारिश हर जगह कम होती, तो गिरावट हर फ़सल में बराबर बँटती। ऐसा नहीं हुआ। पूरी गिरावट धान में बैठी है।

यह ख़बर उतनी बुरी नहीं जितनी दिखती है। रोपाई वाला धान खरीफ़ में सबसे ज़्यादा पानी खींचता है, और जिन राज्यों में सबसे ज़्यादा धान होता है, वहीं भूजल सबसे तेज़ी से नीचे गया है। धान से हटकर दाल, मक्का, तिलहन या मोटे अनाज में जाने वाला हर हेक्टेयर पानी बचाता है, मिट्टी में नाइट्रोजन सुधारता है और फ़सल चक्र छोटा करता है।

थाली पर सीधा असर क्या होगा? चावल का सरकारी भंडार बड़ा है और ख़रीद की व्यवस्था बनी हुई है, इसलिए रकबे की 3.65 फ़ीसदी कमी दुकान के भाव तक बहुत धीरे और बहुत कम पहुँचती है। दाल में इतनी ही कमी होती तो असर कहीं तेज़ होता — और दाल में कमी है ही नहीं। यही इस आँकड़े की सबसे राहत देने वाली बात है।

एक ज़रूरी सावधानी। यह बुवाई की साप्ताहिक रिपोर्ट है, अंतिम आँकड़ा नहीं। देर से बोने वाले ज़िलों में रकबा अभी बढ़ सकता है। और रकबा घटने का मतलब पैदावार घटना नहीं होता — प्रति हेक्टेयर उपज लगातार बढ़ रही है। पैदावार का असली हिसाब पहले अग्रिम अनुमान से मिलेगा, जो अभी कुछ हफ़्ते दूर है।

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