ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। साल 2011 से अब तक कोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने और न्याय व्यवस्था में टेक्नोलॉजी को शामिल करने पर 9800 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं, लेकिन दशकों से लंबित मामलों के निपटारे पर इसका बहुत कम असर हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से ज्यादा मामले 10 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं।
इनमें 558 मामले 20 साल से ज्यादा और 26 मामले 30 साल से लंबित हैं। देश भर के 25 हाई कोर्ट में 80,000 से ज्यादा मामले तीन दशकों से ज्यादा समय से लंबित हैं। पिछले हफ्ते संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर डाली, जिसने इनके निपटारे के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की है।
निपटारा कई बातों पर निर्भर करता है
उन्होंने आगे कहा कि अदालतों में मामलों का समय पर निपटारा कई बातों पर निर्भर करता है। इनमें जजों और न्यायिक अधिकारियों की पर्याप्त संख्या, कोर्ट का सहयोगी स्टाफ और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता; मामले के तथ्यों की जटिलता; सबूतों की प्रकृति; सभी पक्षों का सहयोग और नियमों व प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन करना शामिल हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने खाली पदों पर जजों की नियुक्ति में तेजी दिखाई है, लेकिन 25 हाई कोर्ट और निचली अदालतों में स्थिति वैसी नहीं है। अभी हाई कोर्ट में जजों के मंज़ूर पदों की संख्या 1,122 है, जिनमें से 341 पद खाली हैं। वहीं, निचली अदालतों में जजों के मंज़ूर पदों की संख्या 30,868 है, जिनमें से 7,311 पद खाली हैं।
कानून मंत्री ने हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए तय समय-सीमा का पालन न करने के लिए संबंधित हाई कोर्ट कॉलेजियम को जिम्मेदार ठहराया; यही बड़ी संख्या में खाली पदों का मुख्य कारण है। हाई कोर्ट कॉलेजियम में हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और दो सबसे सीनियर जज शामिल होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के लिए, जजों की नियुक्ति की सिफारिश भारत के चीफ जस्टिस करते हैं।














