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पीएम मोदी का पोस्ट हटाने पर मेटा को पड़ी सख्त मार… जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी

दुनिया को संदेश : नहीं चलेगी सोशल मीडिया की मनमानी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
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मेटा और पीएम मोदी की पोस्ट

दीपक द्विवेदी

नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी समाचार सेवा ‘बीबीसी’ को सबक सिखाने के बाद दिग्गज सोशल मीडिया ’मेटा’ को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सख्ती का जोरदार संदेश दिया है। मेटा को भारत में कार्यवाही से पहले ही भारतीय कानूनों की ताकतों का एहसास दिला दिया है। इसी माहौल को भांपते हुए मेटा कंपनी के मालिक और सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए सरकार से सार्वजनिक माफी मांगी है। मोदी सरकार का सोशल मीडिया के खिलाफ यह कड़ा कदम दुनिया की अन्य सभी शीर्ष सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि मनमानी नहीं चलेगी और सभी को भारतीय कानूनों का पालन एवं सम्मान करना होगा।

भारत सरकार ने टेक्नोलॉजी कंपनियों की बढ़ती ताकत और उनके एल्गोरिदम की मनमानी पर एक मजबूत संदेश दिया है। कोई भी डिजिटल मंच, चाहे कितना ही बड़ा और प्रभावशाली क्यों न हो, वह देश के कानून से ऊपर नहीं हो सकता और न ही अपने फैसलों की जवाबदेही से बच सकता है।
आपकी जानकारी के लिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पोस्ट को फेसबुक पर गलती से प्रतिबंधित किए जाने और उसके बाद मेटा की ओर से माफी मांगे जाने की घटना अब केवल एक वीडियो या तकनीकी गड़बड़ी का मामला नहीं रह गई है। इसने डिजिटल संप्रभुता, सोशल मीडिया की जवाबदेही और दुनिया की विशाल टेक कंपनियों के बढ़ते प्रभाव को लेकर चल रही वैश्विक बहस को नई दिशा दी है।

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भारत सरकार ने इस मामले को सामान्य तकनीकी गलती मानकर छोड़ने के बजाय मेटा से उच्च स्तर पर जवाब मांगा था। कंपनी के वरिष्ठ वैश्विक अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा गया था कि प्रधानमंत्री की पोस्ट पर रोक आखिर कैसे लगी ? मामला संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति तक पहुंचा और डिजिटल मंचों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठे।

– डिजिटल मीडिया की ‘लक्ष्मण रेखा’ तय
– भारतीय कानून का करना होगा सम्मान

सरकार की सख्ती के बाद मेटा ने बाद में गलती स्वीकार करते हुए पोस्ट को बहाल किया। कंपनी के मुख्य वैश्विक मामलों के अधिकारी जोएल कैपलन ने प्रधानमंत्री की पोस्ट पर गलती से लगी रोक के लिए मेटा की ओर से माफी मांगी। कंपनी ने यह भी माना कि उसके प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटेरियल, डीपफेक और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़ी चूक हुई हैं। सरकार ने मेटा से कहा कि वह आईटी अधिनियम के तहत खुद को सिर्फ एक इंटरमीडियरी नहीं कह सकती।

मे टा यह तय करती है कि कौन-सा कंटेंट किस यूजर तक पहुंचेगा। इसलिए कंपनी को आईटी एक्ट के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर सुरक्षा’ का लाभ नहीं मिलेगा।

उल्लेखनीय है की इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए कहीं अधिक है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब और अन्य वैश्विक मंचों के करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ता हैं। ऐसे में भारत से उठने वाली डिजिटल प्लेटफार्म की जवाबदेही का संदेश दुनिया भर में मजबूती के साथ गया है।

मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत सरकार की वह राजनीतिक इच्छाशक्ति है जिसके तहत उसने दुनिया की सबसे प्रभावशाली टेक कंपनियों में से एक से सीधे जवाब तलब किया। सरकार ने उनकी किसी भी बहानेबाजी को कोई भी तरजीह नहीं दी।

सही है कि पिछले दो दशकों में सोशल मीडिया ने दुनिया को अभूतपूर्व रूप से जोड़ा है। इसने सूचना को आम लोगों तक पहुंचाया। संवाद के नए रास्ते खोले। कारोबार तथा नए प्रयोगों के लिए अपार अवसर पैदा किए लेकिन इसके साथ गलत सूचनाओं, डीपफेक, आपत्तिजनक और गैरकानूनी सामग्री, ऑनलाइन दुर्व्यवहार की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं।

इन परिस्थितियों में भारत का रुख स्पष्ट है। तकनीक और नवाचार का स्वागत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए लेकिन किसी निजी कंपनी या उसके एल्गोरिदम को ऐसी बेलगाम ताकत नहीं दी जा सकती जिससे वह बिना जवाबदेही के सार्वजनिक संवाद को जहरीला बनाए।

तथ्यात्मक सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री की पोस्ट से जुड़ी घटना ने सोशल मीडिया से जुड़े इस बुनियादी सवाल को सामने ला दिया है। अगर किसी स्वचालित व्यवस्था से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के निर्वाचित प्रधानमंत्री की पोस्ट भी गलती से प्रतिबंधित हो सकती है तो सामान्य नागरिकों, पत्रकारों, संस्थानों और कारोबारियों के लिए कितनी प्रभावी सुरक्षा मौजूद है?

एल्गोरिदम की आड़ नहीं चलेगी

सही तो यह है कि कई वर्षों से दुनिया की बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां अपने मंचों पर सामग्री से जुड़े नियम और उन्हें लागू करने की व्यवस्था काफी हद तक स्वयं तय करती रही हैं।

कौन-सी सामग्री ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी, किसकी पहुंच कम की जाएगी और किस सामग्री को हटा दिया जाएगा। इन फैसलों को कंपनी की एल्गोरिदम तय करेगी। भारत सरकार ने अब इस व्यवस्था के सामने जवाबदेही का महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। भारत सरकार का संदेश साफ है कि फैसला भले ही एल्गोरिदम करे, उसकी जिम्मेदारी कंपनी की ही होगी। भारत सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि किसी कंपनी की वैश्विक पहुंच उसे उस देश के कानून से ऊपर नहीं कर सकती जहां वह कारोबार करती है।

केंद्र सरकार आजकल भारत में ऑनलाइन मंचों, गैरकानूनी सामग्री, डीपफेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री और डिजिटल मध्यस्थों की जवाबदेही से जुड़े नियमों को लगातार मजबूत करने के काम में जुटी हुई है।

भारत सरकार ने अब साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया के मंच वैश्विक हो सकते हैं लेकिन उन्हें स्थानीय कानून और देश की कानूनी व्यवस्था का सम्मान करना ही होगा।

आपकी जानकारी के लिए जरूरी है कि यूरोपीय संघ ने डिजिटल सेवा कानून के माध्यम से बड़ी टेक कंपनियों के लिए कठोर जिम्मेदारियां तय की हैं। दुनिया के कई अन्य देश भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, डीपफेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चुनावी दुष्प्रचार और एल्गोरिदम की पारदर्शिता को लेकर नए नियम तैयार कर रहे हैं। यहां पर महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास विशाल डिजिटल आबादी, मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था, तेजी से बढ़ती तकनीकी क्षमता और दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों से जवाब मांगने की राजनीतिक शक्ति- चारों मौजूद हैं।

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों के लिए भारत का यह सख्त और नसीहत भरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

यह विषय भी जानकारी के लिए जरूरी है कि सोशल मीडिया पर किसी भी सामग्री को क्यों हटाया गया? उसकी पहुंच क्यों सीमित की गई? फैसला इंसान ने किया या मशीन ने? गलती होने पर समीक्षा की क्या व्यवस्था है? प्रभावित व्यक्ति को अपील का कितना प्रभावी अधिकार है? समय आ गया है कि दुनिया भर की सरकारों और नियामकों को अब इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।

भारत की मोदी सरकार ने इस मुद्दे का हल निकालकर दुनिया को इसी नक्शेकदम पर आगे बढ़ने का मजबूत रास्ता दिखा दिया है। डिजिटल वर्ल्ड की भारत में हुई इस घटना ने सिलिकॉन वैली और पूरी दुनिया को एक स्पष्ट संदेश दिया है िक भारत में तकनीक का स्वागत है लेकिन मनमानी का नहीं। यहां नवाचार जरूरी है, लेकिन जवाबदेही भी। कुल मिलाकर सार यह है कि भारत में कोई भी एल्गोरिदम या कंपनी भारतीय कानूनों से ऊपर नहीं है।

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