ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।रिज़र्व बैंक ने जून में एक खिड़की खोली थी। वह खिड़की तय समय से एक महीना पहले बंद हो रही है — इसलिए नहीं कि पैसा नहीं आया, बल्कि इसलिए कि ज़रूरत से ज़्यादा आ गया।
रिज़र्व बैंक ने 8 जून 2026 को एक विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इसमें 21 अगस्त 2026 तक कुल 72.85 अरब डॉलर आ चुके हैं। इसमें से 65.40 अरब डॉलर — यानी क़रीब 90 फ़ीसदी — अकेले एफ़सीएनआर(बी) जमा से आया है। यह वह खाता है जिसमें विदेश में बसे भारतीय अपनी बचत डॉलर, पाउंड या दिरहम में ही भारतीय बैंक में जमा करते हैं।
2013 में भी ऐसी ही योजना आई थी, जब रुपया दबाव में था। तब क़रीब तीन महीने में 26 अरब डॉलर आए थे। इस बार 74 दिन में 72.85 अरब डॉलर आ गए। ब्लिट्ज़ इंडिया का हिसाब है कि यह रोज़ाना क़रीब 98 करोड़ डॉलर बैठता है, जबकि 2013 में यह क़रीब 28 करोड़ डॉलर रोज़ था। यानी रफ़्तार लगभग साढ़े तीन गुना। रिज़र्व बैंक ने अब एफ़सीएनआर(बी) की खिड़की 30 सितंबर की जगह 31 अगस्त को ही बंद करने का फ़ैसला किया है।
समय से पहले बंद। रिज़र्व बैंक ने एफ़सीएनआर(बी) की खिड़की एक महीना पहले बंद करने का फ़ैसला किया है — यह अपने आप में एक मज़बूत संकेत है।
2013 में भारत ने विदेशी मुद्रा इसलिए जुटाई थी कि जुटानी पड़ी। 2026 में लगभग तीन गुना इसलिए जुटी कि जुट सकती थी।
एक नज़र में
• कुल आया: 21 अगस्त 2026 तक 72.85 अरब डॉलर
• एफ़सीएनआर(बी) से: 65.40 अरब डॉलर — क़रीब 90%
• खिड़की खुली: 8 जून 2026 — यानी 74 दिन
• रोज़ाना औसत: क़रीब 98 करोड़ डॉलर
• 2013 की योजना: क़रीब तीन महीने में 26 अरब डॉलर
• रफ़्तार: उससे क़रीब साढ़े तीन गुना
• अब बंद कब: 31 अगस्त, पहले 30 सितंबर तय था
अब सवाल यह कि आम आदमी को इससे क्या। सीधा असर यह है कि देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार मज़बूत होता है, और मज़बूत भंडार का मतलब है रुपये पर दबाव कम। रुपया टिका रहे तो आयात होने वाला कच्चा तेल, खाद, खाद्य तेल और दवा का कच्चा माल सस्ता पड़ता है — और इन्हीं चीज़ों से रसोई और खेत का ख़र्च तय होता है। 24 अगस्त को रुपया 95.74 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
दूसरी बात जो कम कही जा रही है, वह भी दर्ज होनी चाहिए। यह पैसा दान नहीं, जमा है — एक से पाँच साल में वापस देना होगा, और ब्याज भी। ग्यारह हफ़्ते में जुटी रक़म आगे चलकर लगभग उतने ही छोटे दायरे में मैच्योर भी होगी, इसलिए उस समय की तैयारी अभी से चाहिए। लेकिन बड़ी बात यह है कि यह पैसा शेयर बाज़ार में आने-जाने वाला चंचल निवेश नहीं है, तय अवधि की पक्की जमा है — और यही किसी देश के लिए सबसे भरोसेमंद विदेशी पूँजी होती है। यह प्रवासी भारतीयों का देश की बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा है, और उसे इसी नज़र से देखा जाना चाहिए।












