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यूरोप का ग्रोथ इंजन जर्मनी, भारत के साथ

चीन को दिखाना चाहता है औकात, बड़े दांव के लिए तैयार!

by ब्लिट्ज़ इंडिया
October 30, 2024
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विनोद शील

नई दिल्ली। विगत दिनों जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आए हुए थे। जर्मनी को यूरोप का आर्थिक इंजन कहा जाता है। पूरे यूरोप में उसका दबदबा है और उसका डंका बजता है। वह विश्व के सबसे बड़े औद्योगिक उत्पादकों में से एक है। जर्मनी का मानना है कि भारत के विशाल बाजार तक उसकी अधिक पहुंच से चीन पर जर्मनी की निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है; भले ही भारत पूरी तरह से चीन का विकल्प न बने।

कारों से लेकर लॉजिस्टिक्स तक, अनेक क्षेत्रों में जर्मन कंपनियां भारत की विकास क्षमता को लेकर काफी उत्साहित नजर आती हैं। इन कंपनियों को लगता है कि वे भारत में कुशल युवा कर्मचारियों की बड़ी संख्या, कम लागत और लगभग 7 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का फायदा उठा सकती हैं। जर्मनी की अर्थव्यवस्था निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर है। यह दौरा जर्मनी के लिए एक नाजुक समय पर हो रहा है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था लगातार दूसरे साल गिरावट का सामना कर रही है। यूरोपीय संघ (ईयू) और चीन के बीच व्यापार विवाद जर्मन कंपनियों के लिए एक अन्य चिंता का विषय बना हुआ है।

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सस्ती रूसी गैस पर निर्भरता का उठाना पड़ा नुकसान
2022 में यूक्रेन युद्ध से पहले सस्ती रूसी गैस पर अपनी निर्भरता के कारण जर्मनी को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसके बाद से जर्मनी चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है। भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में जर्मन अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार है। यह जर्मन अर्थव्यवस्था के विविधीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जर्मनी के वित्त मंत्री रॉबर्ट हेबेक ने अभी दौरे के दौरान ही यह बात कही थी। उन्होंने बोला था कि जर्मनी को अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए और एशिया में जर्मन कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन को और मजबूत बनाने की जरूरत है। यह और बात है कि चीन अभी भी सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स (डीआईएचके) में विदेशी व्यापार के प्रमुख वोल्कर ट्रेयर के मुताबिक, 2022 में भारत में जर्मन प्रत्यक्ष निवेश लगभग 25 अरब यूरो (27 अरब डॉलर) था जो चीन में निवेश की गई राशि का लगभग 20 प्रतिशत है। उनका मानना है कि दशक के अंत तक यह हिस्सा बढ़कर 40 प्रतिशत हो सकता है। ट्रेयर के अनुसार, चीन गायब नहीं होगा लेकिन जर्मन कंपनियों के लिए भारत अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा। भारत एक परीक्षा की तरह है।

अगर चीन पर निर्भरता कम करनी है तो भारत इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यहां बाजार बहुत बड़ा है और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है।
शोल्ज अपने साथ विदेश और रक्षा मंत्रियों सहित अपने ज्यादातर मंत्रिमंडल के साथ आए। 24-26 अक्टूबर तक वह अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ भारत में रहे। 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात हुई।

– पूरे यूरोप में जर्मनी का दबदबा, बजता है डंका
– जर्मन कंपनियां भारत को लेकर उत्साहित
– दिक्कतों के बाद भी भारत में भविष्य उज्जवल

भारत में किस तरह की दिक्कतें देख रही हैं जर्मन कंपनियां?
कंसल्टेंसी फर्म (केपीएमजी) और जर्मन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एब्रॉड (एएचके) के एक अध्ययन के अनुसार जर्मन कंपनियां नौकरशाही, भ्रष्टाचार और भारत की टैक्स प्रणाली को निवेश में बाधाओं के रूप में देखती हैं। इसके बावजूद वे भारत में एक उज्ज्वल भविष्य देख रही हैं। 82 प्रतिशत का मानना है कि अगले पांच वर्षों में उनके राजस्व में बढ़ोतरी होगी। लगभग 59 प्रतिशत अपने निवेश का विस्तार करने की योजना बना रही हैं जबकि 2021 में यह आंकड़ा केवल 36 प्रतिशत था।

उदाहरण के लिए जर्मन लॉजिस्टिक्स दिग्गज डीएचएल तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स बाजार का लाभ उठाने के लिए 2026 तक भारत में आधा अरब यूरो का निवेश करने की योजना बना रही है। डिवीजन प्रमुख ऑस्कर डी बोक के मुताबिक वे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारी विकास क्षमता देखते हैं जिसमें भारत की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।

फॉक्सवैगन चीन में गिरती बिक्री और घरेलू स्तर पर ऊंची उत्पादन लागत से प्रभावित हुई है। वह संयुक्त उत्पादन के लिए भारत में नए गठजोड़ पर विचार कर रही है। इसके पहले से ही दो कारखाने हैं। उसने फरवरी में स्थानीय साझेदार महिंद्रा के साथ एक सप्लाई डील पर हस्ताक्षर किए हैं। समूह के वित्त प्रमुख अर्नो एंट्लीट्ज ने मई में कहा था, ‘मुझे लगता है कि हमें बाजार के मामले में … और अमेरिका और चीन के बीच नियामक अनिश्चितता के मामले में भारत में क्षमता को कम करके नहीं आंकना चाहिए।’

इसी तरह, कोलोन स्थित इंजन निर्माता ड्यूट्ज ने इस साल भारत की टीएएफई के साथ एक समझौते की घोषणा की है जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ट्रैक्टर निर्माता है। इसके तहत सहायक कंपनी टीएएफई मोटर्स लाइसेंस के तहत 30,000 ड्यूट्ज इंजन का उत्पादन करेगी।

‘चीन + 1’ रणनीति पर बढ़ने का इरादा
बीसीजी में प्रबंध निदेशक जोनाथन ब्राउन ने कहा, ‘भारत के पक्ष में मुख्य तर्क राजनीतिक स्थिरता और कम श्रम लागत हैं। इसलिए आपकी ‘चीन + 1′ रणनीति होनी चाहिए जिसमें भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।’ जर्मनी और भारत के बीच व्यापार 2023 में एक नए रिकॉर्ड पर पहुंच गया था। ऐसी उम्मीद है कि भारत दशक के अंत तक जर्मनी और जापान को पछाड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
ईयू-भारत मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत वर्षों से चल रही है। इसका अभी तक कोई अंत नहीं दिख रहा है। बीसीजी के ब्राउन ने कहा, ‘बाजार में पैर जमाने में बाधाएं बहुत हैं लेकिन एक बार जब आप यहां पहुंच जाते हैं तो आपके पास अपार संभावनाएं होती हैं। केवल जर्मन उत्पादों को स्थानीय स्तर पर बेचना काम नहीं करेगा।’

पीएम मोदी ने दुनिया को पढ़ाया शांति का पाठ

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 अक्टूबर को कहा कि यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष चिंता का विषय है और भारत शांति बहाली के लिए हरसंभव योगदान देने को तैयार है। उनकी टिप्पणी जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज के साथ हुई बातचीत के बाद आई। शोल्ज ने भारत से यूक्रेन में लंबे समय से जारी संघर्ष का राजनीतिक समाधान खोजने में योगदान देने का आह्वान किया।
पीएम मोदी ने जर्मन चांसलर के साथ सातवें अंतर-सरकारी परामर्श (आईजीसी) के बाद कहा, ‘‘यूक्रेन और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष हम दोनों के लिए चिंता के विषय हैं। भारत का हमेशा मत रहा है कि युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता और शांति की बहाली के लिए वह हरसंभव योगदान देने को तैयार है।’’ आईजीसी में, दोनों पक्षों ने 18 समझौतों और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जिनमें आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संधि और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान तथा पारस्परिक सुरक्षा पर एक समझौता भी शामिल है।

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