नई दिल्ली। दोपहर में बनी सौर बिजली को सूरज ढलने के बाद काम में लाने की तैयारी तेज हो गई है। केंद्रीय कैबिनेट ने 4 नवंबर को ग्रिड-स्केल एनर्जी स्टोरेज के लिए 14,500 करोड़ रुपये की वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीडब्ल्यूएफ) को मंजूरी दी है।
इस रकम से 92 जीवीएच भंडारण क्षमता खड़ी होगी। योजना 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी।
उसी बैठक में कैबिनेट ने लिथियम और निकेल प्रोसेसिंग प्लांटों के लिए 2,814 करोड़ रुपये की पूंजीगत मदद भी मंजूर की। एक फैसला बिजली जमा करने के भंडार बनाएगा, दूसरा बैटरी में लगने वाली धातु देश में ही तैयार करने की शुरुआत करेगा।
स्टोरेज में लगने वाले हर 100 रुपये में से करीब 15 रुपये सरकार देगी, और बैटरी प्रोजेक्टों में कम से कम 40 फीसदी स्वदेशी सामग्री की शर्त होगी।
एक नजर में
● स्टोरेज वीजीएफ: 14,500 करोड़ रुपये, 2026-27 से 2030-31 तक (केंद्रीय कैबिनेट, 4 नवंबर)
● कुल क्षमता: 92 जीडब्ल्यूएच, इसमें 60 जीडब्ल्यूएच पंप्ड स्टोरेज, 30 जीडब्ल्यूएच बैटरी स्टोरेज और 2 जीडब्ल्यूएच अन्य तकनीक (केंद्रीय कैबिनेट)
● अनुमानित कुल निवेश: 97,600 करोड़ रुपये (केंद्रीय कैबिनेट)
● बैटरी प्रोजेक्टों में न्यूनतम स्वदेशी सामग्री: 40 फीसदी (केंद्रीय कैबिनेट)
● 2031-32 तक ग्रिड-स्केल स्टोरेज की जरूरत: 411 जीडब्ल्यूएच (कैबिनेट विज्ञप्ति)
● क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग: 2,814 करोड़ रुपये, 30 फीसदी पूंजीगत सब्सिडी (केंद्रीय कैबिनेट, 4 नवंबर)
स्टोरेज क्यों, और अभी क्यों
देश की गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 310 जी डब्ल्यू तक पहुंच चुकी है। केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट के समापन पर यह जानकारी दी, जिसे ऑल इंडिया रेडियो ने 6 नवंबर को प्रसारित किया।
2030 तक लक्ष्य 500 जीडब्ल्यू का है। सोलर बेल्ट में जुड़ने वाला हर गीगावाट एक ही खाई को चौड़ा करता है। बिजली दोपहर में सबसे ज्यादा बनती है, जबकि मांग सूरज ढलने के बाद चरम पर होती है।
स्टोरेज इसी खाई को पाटता है। पंप्ड स्टोरेज में सस्ती बिजली के समय पानी ऊपर चढ़ाया जाता है और कमी के समय उसे टर्बाइनों से गिराकर बिजली बनाई जाती है।
बैटरी यही काम रसायन के सहारे करती है, ज्यादा तेजी से और छोटे पैमाने पर। कैबिनेट ने दोनों को चुना है, लेकिन पलड़ा पंप्ड स्टोरेज का भारी रखा है। यह पुरानी, लंबी उम्र वाली और ज्यादा देसी तकनीक है।
पैसा कैसे काम करेगा
वीजीएफ से सीधे कुछ नहीं बनता। यह प्रोजेक्ट की लागत और खरीदार की जेब के बीच का फर्क भरती है, ताकि बोली उस टैरिफ पर तय हो जिस पर बिजली वितरण कंपनियां दस्तखत कर सकें।
कैबिनेट विज्ञप्ति के मुताबिक क्षमता का आवंटन टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली से होगा।
ब्लिट्ज ने विज्ञप्ति के अपने आंकड़ों पर हिसाब लगाया, तो इस दांव की शक्ल साफ हुई। 14,500 करोड़ रुपये की वीजीएफ योजना से आने वाले 97,600 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश का 14.9 फीसदी है।
हर गीगावाट-घंटे पर करीब 157.6 करोड़ रुपये की सरकारी मदद बैठती है, जबकि कुल निवेश करीब 1,061 करोड़ रुपये प्रति गीगावाट-घंटा है। बाकी 85 फीसदी निजी और सरकारी क्षेत्र के डेवलपर लगाएंगे।
काम कितना बड़ा है, यह विज्ञप्ति खुद बताती है। देश को 2031-32 तक 411 जीडब्ल्यूएच ग्रिड-स्केल स्टोरेज चाहिए, और अभी मंजूर 92 जीडब्ल्यूएच इस जरूरत का 22.4 फीसदी है।
यानी यह शुरुआत है, पूरा हल नहीं। विज्ञप्ति ने दोनों आंकड़े साथ-साथ रखकर यही बात कही है।
बैटरी के भीतर की धातु
भारत में असेंबल बैटरी अगर आयातित सेल से बने, और सेल आयातित परिष्कृत लिथियम-निकेल से, तो देश की ऊर्जा सुरक्षा किसी और की सप्लाई चेन से बंधी रहती है।
बैटरी प्रोजेक्टों पर 40 फीसदी स्वदेशी सामग्री की शर्त मांग पैदा करती है। कैबिनेट का दूसरा फैसला इस सवाल का जवाब देना शुरू करता है कि कच्चा माल कहां से आएगा।
कैपेक्स सपोर्ट स्कीम में 30 फीसदी पूंजीगत सब्सिडी मिलेगी, जो काम के पड़ावों से जुड़ी तीन किस्तों में दी जाएगी। यह मदद दो लिथियम और दो निकेल प्रोसेसिंग कंपनियों को मिलेगी, जिनका चयन तकनीकी आकलन और प्रतिस्पर्धी बोली से होगा।
हर लिथियम प्लांट को अधिकतम 500 करोड़ रुपये और हर निकेल प्लांट को अधिकतम 900 करोड़ रुपये मिलेंगे। लिथियम प्लांट की न्यूनतम क्षमता 30 किलोटन सालाना और निकेल प्लांट की 50 किलोटन सालाना तय है।
चारों सीमाएं जोड़ने पर 2,800 करोड़ रुपये बनते हैं, जो कुल परिव्यय का 99.5 फीसदी है। मतलब योजना ठीक चार प्लांटों के लिए बनी है और निवेशकों को उनका आकार भी बता देती है।
लिथियम प्लांट करीब 1,667 करोड़ रुपये के निवेश पर अपनी अधिकतम मदद तक पहुंचता है, निकेल प्लांट 3,000 करोड़ रुपये पर। चारों पूरी मदद लें तो करीब 9,333 करोड़ रुपये की प्रोसेसिंग क्षमता खड़ी होगी।
अयस्क के मोर्चे पर भी काम साथ-साथ चल रहा है। गोवा में 5 नवंबर से शुरू हुए खान मंत्रियों के सम्मेलन में खान मंत्रालय ने क्रिटिकल और स्ट्रैटेजिक मिनरल नीलामी का 9वां दौर शुरू किया। इसमें 8 राज्यों के 20 ब्लॉक हैं।
इसके साथ 6 राज्यों के 11 ब्लॉकों के लिए एक्सप्लोरेशन लाइसेंस का तीसरा दौर भी खोला गया।
भारत को क्या मिलेगा
तीन फायदे हैं, और योजनाएं आगे बढ़ने के साथ तीनों को मापा जा सकेगा।
•पहला, दोपहर में बनी सौर बिजली रात में बिक सकेगी, जिससे पहले से लगे हर पैनल की कीमत बढ़ेगी।
•दूसरा, स्वदेशी सामग्री की शर्त वाला पक्का घरेलू बाजार भारतीय सेल और पैक निर्माताओं को बढ़ने लायक ऑर्डर देगा।
•तीसरा, लिथियम और निकेल के प्रोसेसिंग प्लांट भारत को परिष्कृत बैटरी धातु खरीदने वाले देश से बनाने वाला देश बनाएंगे। इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रिड बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा निर्यात की बड़ी कहानी इसी कदम पर टिकी है।
आगे किस पर नजर
विज्ञप्ति में किसी भी योजना की बोली का कैलेंडर नहीं दिया गया है। अगले पड़ाव होंगे नई वीजीएफ के तहत पहला स्टोरेज टेंडर, चार प्रोसेसिंग प्लांटों के लिए प्रस्ताव का अनुरोध और गोवा नीलामी दौर के नतीजे।
ब्लिट्ज की सलाह
दोनों योजनाओं की बोली का कैलेंडर एक ही जगह जारी किया जाए, ताकि स्टोरेज डेवलपर और मिनरल प्रोसेसर एक जैसी तारीखों के हिसाब से तैयारी कर सकें।
प्रोसेसिंग प्लांटों की किस्तें अयस्क या कंसन्ट्रेट की पक्की सप्लाई से जोड़ी जाएं। कच्चे माल के बिना खड़ी रिफाइनरी सबसे महंगी बेकार क्षमता होती है।
स्टोरेज की चालू क्षमता हर तिमाही 411 जीडब्ल्यूएच की जरूरत के सामने रखकर बताई जाए, ताकि कैबिनेट की बताई खाई भरते हुए सबकी नजर में रहे।
अक्टूबर में ₹2.31 लाख करोड़ पहुंचा जीएसटी संग्रह
त्योहारी महीने में सरकार के खजाने में जीएसटी से 2,31,290 करोड़ रुपये आए। पिछले साल अक्टूबर के 1,88,125 करोड़ रुपये के मुकाबले यह 22.9 फीसदी ज्यादा है।
ये अस्थायी सरकारी आंकड़े 1 नवंबर को जारी हुए और ऑल इंडिया रेडियो ने इन्हें प्रसारित किया। 27,934 करोड़ रुपये के रिफंड के बाद शुद्ध संग्रह 2,03,356 करोड़ रुपये रहा, जो 25.6 फीसदी ज्यादा है।
2026-27 में यह दूसरा सबसे बड़ा महीना रहा। पहले नंबर पर अप्रैल है, जब 2.43 लाख करोड़ रुपये आए थे। अप्रैल से अक्टूबर तक कुल संग्रह 14.78 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, जो 2025-26 की इसी अवधि से 13.2 फीसदी ज्यादा है।
असली कहानी बंटवारे में है। घरेलू जीएसटी 15.8 फीसदी बढ़कर 1,59,044 करोड़ रुपये पर पहुंचा, जबकि आयात पर जीएसटी 42.2 फीसदी उछलकर 72,246 करोड़ रुपये हो गया।
ब्लिट्ज के हिसाब से रुपयों में दोनों ने लगभग बराबर जोड़ा, घरेलू कारोबार से 21,716 करोड़ और आयात से 21,450 करोड़ रुपये। कुल जीएसटी में आयात का हिस्सा अब 31.2 फीसदी है, जो एक साल पहले 27 फीसदी था।
ब्लिट्ज डेटा कार्ड
•घरेलू जीएसटी +15.8 फीसदी, 1,59,044 करोड़ रुपये
• आयात जीएसटी +42.2 फीसदी, 72,246 करोड़ रुपये · कुल 2,31,290 करोड़ रुपये (अक्टूबर 2026)।
इस आंकड़े के साथ दो बातें जुड़ी हैं। अक्टूबर 2025 का आधार कमजोर था, क्योंकि सितंबर 2025 की दर कटौती के बाद तब शुद्ध जीएसटी सिर्फ 0.6 फीसदी बढ़ा था।
आयात में उछाल का एक हिस्सा कीमत का है, मात्रा का नहीं।डीआईपीएएम मार्केट मॉनिटर के मुताबिक 4 नवंबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 94.65 पर था, जिससे हर आयातित खेप का रुपया-मूल्य बढ़ जाता है।
त्योहारी मांग की साफ तस्वीर घरेलू जीएसटी की 15.8 फीसदी बढ़त देती है, और यह मजबूत है। देश के बाजारों में खरीदारी का यह दम राज्यों और केंद्र दोनों की कमाई बढ़ाता है।
सेना के ट्रायल में खरा उतरा प्रलय

क्रेडिट फोटो: पत्र सूचना कार्यालय , भारत सरकार
फोटो कैप्शन: ओडिशा तट के डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से 5 नवंबर को यूजर ट्रायल में उड़ान भरती प्रलय।
स्टेटस ताजा, सरकारी, घटना की फोटो
चेक फाइल 6 नवंबर 2026 को रिलीज पेज पर मौजूद मिली; पीआईबी ने कोई कैप्शन या एजेंसी क्रेडिट नहीं दिया। लगाने से पहले पेज दोबारा खोलें।
सेना में शामिल होने के लिए प्रलय मिसाइल का रास्ता खुला
नई दिल्ली। सेना में शामिल होने का रास्ता प्रलय मिसाइल के लिए खुल गया है। डीआरडीओ ने 5 नवंबर को ओडिशा तट के पास डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से इसका यूजर इवैल्युएशन ट्रायल किया, जिसमें मिशन के सभी लक्ष्य पूरे हुए।
रक्षा मंत्रालय ने उसी शाम जारी बयान में यह जानकारी दी। चांदीपुर की इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज के ट्रैकिंग डेटा ने उड़ान की पुष्टि की।
प्रलय एक सेमी-बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशालाओं ने विकसित किया है। इसका उत्पादन रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनी भारत डायनामिक्स लिमिटेड करती है।
यूजर ट्रायल वह परीक्षण है जो सेना खुद उस हथियार पर करती है जिसे वह तैनात करना चाहती है। मंत्रालय के मुताबिक सफल उड़ान से इस प्रणाली को सेना में शामिल करने का रास्ता साफ हुआ है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ , सेना और उद्योग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली नए खतरों के सामने सेना की तकनीकी क्षमता और ऑपरेशनल तैयारी को और मजबूत करेगी।
देश में बनी मिसाइल का सेना तक पहुंचना रक्षा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भरता घटाता है। मंत्रालय ने मिसाइल की मारक दूरी या किसी ऑर्डर का आकार नहीं बताया है, और सेना में शामिल करने की तारीख भी घोषित नहीं हुई है।
नौसेना को मिला पनडुब्बी-रोधी जहाज अमिनी

नई दिल्ली। तटीय पानी में दुश्मन पनडुब्बियों की तलाश के लिए नौसेना के बेड़े में एक और देसी जहाज आने को तैयार है। कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने 5 नवंबर को अमिनी नौसेना को सौंप दिया।
रक्षा मंत्रालय ने 6 नवंबर को बताया कि यह एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है। इसमें 80 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री लगी है।
इस श्रेणी के जहाज इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नियमों पर बने हैं और वॉटरजेट से चलने वाले सबसे बड़े भारतीय नौसैनिक युद्धपोतों में गिने जाते हैं। इन पर हल्के टॉरपीडो, देसी रॉकेट लॉन्चर और सोनार लगे हैं।
अमिनी नाम एक पुराने कॉर्वेट आईएनएस अमिनी की याद ताजा करता है, जिसे 2002 में सेवा से हटाया गया था।
डिलीवरी का मतलब है शिपयार्ड का जहाज सौंपना, बेड़े में कमीशनिंग इसके बाद होगी। मंत्रालय के बयान में सीरीज में इस जहाज का क्रम और ठेके की रकम नहीं बताई गई है।
जहाज का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा देश में बनने से काम और कमाई देसी शिपयार्ड और सप्लायरों के पास रहती है।
अपनी कक्षा में पहुंचा एनएवीआईसी का नया उपग्रह
ब्लिट्ज डेटा कार्ड: चार बर्न में कक्षा 170.3 किमी × 38,080 किमी से 35,765 किमी × 36,196 किमी तक। दोबारा देखने से पहले इसरो के जीएसएलवी-एफ18 मिशन पेज पर 30 अक्टूबर की लॉन्च फोटो देखें।
नई दिल्ली। फोन की लोकेशन से लेकर जहाजों और विमानों के रास्ते तक, देसी नेविगेशन सिस्टम एनएवीआईसी को एक और उपग्रह का सहारा मिलने वाला है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 4 नवंबर को बताया कि एनवीएस-03 अपनी अंतिम भू-समकालिक कक्षा में पहुंच गया है।
इसरो के मुताबिक उपग्रह की सेहत सामान्य है।
इसरो के 4 नवंबर के अपडेट में कोई तस्वीर नहीं है, और कक्षा में उपग्रह की फोटो नहीं खींची जा सकती।
जीएसएलवी-एफ18 ने इसे 30 अक्टूबर को 170.3 किमी x 38,080 किमी की कक्षा में छोड़ा था। इसके बाद कक्षा बढ़ाने के चार मैन्यूवर हुए, जिनमें इंजन कुल 6,164 सेकंड चला।
अब उपग्रह 35,765 किमी x 36,196 किमी की अंतिम कक्षा में है।
एनएवीआईसी भारत का अपना क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम है, जो पूरे देश और उसकी सीमा से करीब 1,500 किमी आगे तक काम करता है। हर चालू एनएवीआईसी उपग्रह सिस्टम रक्षा, नौवहन, विमानन और भारतीय फोन की लोकेशन सेवाओं के लिए विदेशी उपग्रह समूहों पर निर्भरता घटाता है।
कक्षा में पहुंचना सेवा शुरू होने के बराबर नहीं है। अब कक्षा में परीक्षण होंगे, और इसरो ने उपयोगकर्ताओं के लिए सेवा शुरू होने की तारीख नहीं बताई है।
गुयाना को ₹4,700 करोड़ का कर्ज देगा भारत
ब्लिट्ज डेटा कार्ड: ’50 करोड़ डॉलर · सड़क, स्वास्थ्य, रक्षा · यूपीआई जैसी भुगतान प्रणाली समेत 3 समझौते’।
नई दिल्ली। भारत का यूपीआई जैसा भुगतान ढांचा अब कैरेबियन के तेल उत्पादक देश गुयाना तक पहुंचेगा। इसके साथ भारत गुयाना को सड़क, स्वास्थ्य और रक्षा परियोजनाओं के लिए 50 करोड़ डॉलर (करीब 4,700 करोड़ रुपये) की लाइन ऑफ क्रेडिट देगा।
मीडिया और ऑल इंडिया रेडियो की 5 नवंबर की खबरों के मुताबिक विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यह एलान राष्ट्रपति इरफान अली से मुलाकात के बाद किया। दोनों नेता एंटीगुआ एंड बारबुडा के सेंट जॉन्स में राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक से इतर मिले।
साथ में तीन समझौतों पर दस्तखत हुए। पहला डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर है, जिसमें भारत के यूपीआई की तर्ज पर भुगतान प्रणाली शामिल है। दूसरा क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट के अनुदान पर और तीसरा सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की सप्लाई पर है।
कर्ज की शर्तें, अवधि और परियोजनाओं की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। लाइन ऑफ क्रेडिट एक कर्ज है, जिसे लौटाना होता है।
इसकी असली अहमियत साथ जाने वाली चीजों में है। गुयाना में भारत में बनी भुगतान व्यवस्था भारत के डिजिटल मॉडल को कैरेबियन तक ले जाती है, और भारतीय कंपनियों के लिए वहां नए दरवाजे खोलती है।
जयशंकर ने इस पैकेज को 2024 में प्रधानमंत्री की गुयाना यात्रा के दौरान किए गए वादों को पूरा करने वाला बताया।
46% पीछे चल रही रबी की बुआई
ब्लिट्ज डेटा कार्ड: रबी 37.56 लाख हेक्टेयर बनाम 69.02 लाख (−45.6 फीसदी); सरसों 20.50 बनाम 38.07; दलहन 9.45 बनाम 19.56 (30 अक्टूबर तक)।
नई दिल्ली। कमजोर मानसून के बाद खेतों में नमी कम है और इसका असर रबी की बुआई पर साफ दिख रहा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 30 अक्टूबर तक 37.56 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई, जबकि पिछले साल इसी तारीख तक 69.02 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
यानी रकबा 45.6 फीसदी कम है। ये आंकड़े मीडिया की 3 नवंबर की रिपोर्ट में सामने आए। जून से सितंबर का मानसून 13 फीसदी कम बारिश के साथ खत्म हुआ था।
सबसे बड़ी कमी तिलहन और दलहन में है। सरसों और रेपसीड 20.50 लाख हेक्टेयर में बोई गई, जो पिछले साल 38.07 लाख हेक्टेयर थी।
दलहन का रकबा 19.56 लाख से घटकर 9.45 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 51.7 फीसदी की गिरावट। चना 14.35 लाख के मुकाबले 5.90 लाख हेक्टेयर में बोया गया। गेहूं 3.34 लाख के मुकाबले सिर्फ 19,000 हेक्टेयर में है।
गेहूं का आंकड़ा शुरुआती दौर का है। गेहूं की बुआई मुख्य रूप से नवंबर से दिसंबर तक चलती है। पिछले सीजन में यह 336 लाख हेक्टेयर में हुई थी, इसलिए अक्टूबर का आंकड़ा अंतिम रकबे के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताता।
तिलहन और दलहन की कमी ज्यादा अहम है, क्योंकि मांग पूरी करने के लिए भारत अब भी ये फसलें आयात करता है। इनका रकबा बढ़े तो आयात पर खर्च घटेगा और वह पैसा देश के किसानों तक पहुंचेगा।
केंद्र ने अधिकारियों से खेतों में बची नमी का पूरा इस्तेमाल करने को कहा है। राज्यों को सलाह दी गई है कि ग्रामीण रोजगार कानून के तहत काम पशुओं के चारे की ओर मोड़े जाएं।
राजस्थान ने 80 तहसीलों और तेलंगाना ने 365 मंडलों में सूखा घोषित किया है।
ब्लिट्ज की सलाह
सूखाग्रस्त जिलों में कम अवधि वाली सरसों और चने की किस्मों के प्रमाणित बीज अभी पहुंचाए जाएं, जब तक बुआई का समय बाकी है। बुआई की साप्ताहिक तालिका जिलेवार जारी हो, ताकि कमी वहीं पूरी की जा सके जहां वह है।
46% पीछे चल रही रबी की बुआई घटिया दवा पर तुरंत रुक सकेगा उत्पादन
नई दिल्ली। सरकारी जांच में दवा अहम पैमाने पर फेल हुई तो बनाने वाली कंपनी का लाइसेंस बिना देर निलंबित हो सकेगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन का मसौदा अधिसूचित किया है।
डीडी न्यूज ने 5 नवंबर को यह खबर दी।
अभी के नियमों में पहले कारण बताओ नोटिस जारी होता है। मसौदे के तहत अगर सरकारी विश्लेषक किसी दवा को ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ घोषित करे, तो लाइसेंसिंग अथॉरिटी उत्पादन फौरन रोक सकेगी।
यह नियम उन जांचों पर लागू होगा जो तय करती हैं कि दवा असर करती है या नहीं और सुरक्षित है या नहीं। इनमें एसे, डिसॉल्यूशन, रिलेटेड सब्स्टेंसेज, अशुद्धियां और स्टेरिलिटी शामिल हैं।
उत्पादन तभी दोबारा शुरू होगा जब कंपनी गड़बड़ी की जड़ का विश्लेषण करे, सुधार और रोकथाम के कदम उठाए, और अथॉरिटी उसकी पुष्टि कर दे।
एक अलग मसौदा स्टेराइल दवाएं बनाने वाले हिस्सों में सूक्ष्मजीवों की निगरानी को विश्व स्वास्थ्य संगठन की गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस के मुताबिक करता है। ऑल इंडिया रेडियो ने 4 नवंबर को इसकी जानकारी दी।
मसौदा नियम की कोई घटना नहीं; दवाओं की स्टॉक फोटो किसी खास उत्पाद या कंपनी की ओर इशारा करेगी।
दोनों अभी मसौदे हैं और राजपत्र में छपने के 30 दिन तक इन पर सुझाव दिए जा सकते हैं।
भारत दुनिया के बड़े हिस्से को दवाएं भेजता है। जो नियम फेल बैच बनाने वाले को पहले उत्पादन से हटाए और सवाल बाद में पूछे, वह देश के मरीज की हिफाजत करता है। साथ ही विदेश में भारतीय दवाओं की साख भी बचाता है।
यूरोप को ग्रीन मेथनॉल भेजने पर हुआ एमओयू
नई दिल्ली। जीवाश्म ईंधन का बड़ा आयातक भारत अब यूरोप को साफ ईंधन बेचने की राह पर कदम बढ़ा रहा है। सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एसईसीआई) ने रॉटरडैम की कंपनी पावर2एक्स के साथ भारत से यूरोप को ग्रीन मॉलिक्यूल की सप्लाई के लिए एमओयू पर दस्तखत किए हैं।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के 6 नवंबर को सामने आए बयान के मुताबिक पहली किस्त में हर साल 3 लाख टन ग्रीन मेथनॉल की संभावित मात्रा का संकेत है।
यह समझौता नई दिल्ली में भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट में हुआ, जो 5 नवंबर को खत्म हुई। समिट में इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए)असेंबली का नौवां सत्र भी हुआ।
बहामास आईएसए का 116वां सदस्य बना। आईएसए ने 20 करोड़ डॉलर की अफ्रीका सोलर फैसिलिटी का प्रस्ताव रखा।














