ब्लिट्ज ब्यूरो
अपने ही अर्धचालक (सेमीकंडक्टर) बनाने का भारत का सपना अब ठोस रूप ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह गुजरात के साणंद में सीजी सेमी की असेंबली एवं परीक्षण इकाई का उद्घाटन किया, जो देश के चिप कार्यक्रम को नीति-दस्तावेज़ों से निकालकर वास्तविक उत्पादन-लाइनों तक पहुँचा रहा है।
साणंद का यह संयंत्र माइक्रोन की उसी औद्योगिक पट्टी की इकाई और असम के जागीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की पैकेजिंग इकाई के साथ जुड़ गया है — दोनों पहले से चालू हैं। ये तैयार चिप को पैकेज और परीक्षण करने वाले OSAT खंड का हिस्सा हैं। धोलेरा में बन रहे टाटा–पीएसएमसी वेफ़र फ़ैब्रिकेशन संयंत्र — जिसका पहला सिलिकॉन दिसंबर 2026 तक लक्षित है — के साथ मिलकर यह एक ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाते हैं जिसमें भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 21 अरब डॉलर से अधिक का स्वीकृत निवेश आ चुका है।
चिप का पूरा तंत्र ईंट-दर-ईंट बनता है — पहले पैकेजिंग, फिर फ़ैब्रिकेशन — और भारत ने अब उनमें से कई ईंटें ज़मीन पर रख दी हैं।
एक नज़र में
- नया: साणंद, गुजरात में सीजी सेमी OSAT संयंत्र का उद्घाटन
- चालू: माइक्रोन (साणंद) और टाटा (जागीरोड, असम)
- फ़ैब: टाटा–पीएसएमसी, धोलेरा — पहला सिलिकॉन दिस. 2026 लक्षित
- निवेश: सेमीकंडक्टर मिशन में 21 अरब डॉलर+ स्वीकृत
रणनीति स्पष्ट है: अर्धचालक फ़ोन और कारों से लेकर बिजली-ग्रिड और रक्षा प्रणालियों तक हर चीज़ में लगते हैं, और घरेलू आधार चंद विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाता है। पैकेजिंग और परीक्षण पहले आते हैं क्योंकि इनमें पूँजी कम लगती है और इन्हें तेज़ी से बढ़ाया जा सकता है; सबसे जटिल चरण — फ़ैब्रिकेशन — तब आता है जब कौशल, जल, अति-स्वच्छ बिजली और आपूर्तिकर्ताओं का जाल इन नए केंद्रों के आसपास परिपक्व हो जाए।
अब रचनात्मक कार्य है उद्घाटन को स्थिर, उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादन में बदलना — हज़ारों तकनीशियनों को प्रशिक्षित करना, स्थानीय आपूर्ति-शृंखला को गहरा करना और धोलेरा की समय-सीमा का पालन करना। ये बुनियादी बातें सही रहीं, तो एक आकांक्षा से शुरू हुआ मिशन ऐसा टिकाऊ उद्योग बनेगा जो रोज़गार देगा, निर्यात करेगा और उन तकनीकों को सुरक्षित रखेगा जिन पर भारत की प्रगति टिकी है।






