ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना अब हर राज्य में लागू है — और बहुत से लोग जो इसके दायरे में आ चुके हैं, उन्हें अब भी यह पता नहीं है। पश्चिम बंगाल के 8 जून को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण से समझौता करने के बाद आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना देश के हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में लागू हो गई है। अकेले बंगाल में क़रीब 1.43 करोड़ परिवार इसके दायरे में आए हैं।
योजना का आकार अब आँकड़ों में भी दिखता है। 30 जून तक देश भर में लगभग 12.7 करोड़ अस्पताल भर्तियाँ मंज़ूर हो चुकी थीं और 1.92 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के दावे स्वीकृत हुए। हर परिवार को साल में 5 लाख रुपये तक का मुफ़्त इलाज मिलता है, और यह क़रीब 12 करोड़ कमज़ोर आय वाले परिवारों के लिए है। अक्टूबर 2024 से 70 साल या उससे ज़्यादा उम्र के हर बुज़ुर्ग को — आमदनी चाहे जो हो — वय वंदना कार्ड के ज़रिये यह सुविधा मिलती है। इलाज की सूची में क़रीब 1,949 प्रक्रियाएँ हैं, जो 27 विभागों में फैली हैं — कैंसर, हृदय रोग और हड्डी की सर्जरी समेत, यानी वे बीमारियाँ जिनका बिल घर की जमा-पूँजी ख़त्म कर देता है।
कार्ड पहले, बीमारी बाद में: कैशलेस इलाज सिर्फ़ सूचीबद्ध अस्पतालों में मिलता है — दोनों बातें पहले से पता होनी चाहिए।
इलाज महँगा नहीं पड़ता। महँगा वह पैसा पड़ता है जो इलाज के लिए किसी और काम से निकालना पड़ता है।
एक नज़र में
• कवर: हर परिवार को साल में 5 लाख रुपये तक कैशलेस इलाज
• पात्र: क़रीब 12 करोड़ कमज़ोर आय वाले परिवार
• बुज़ुर्ग: 70 साल और उससे ऊपर के सभी लोग, आमदनी की शर्त के बिना — वय वंदना कार्ड से
• इलाज: क़रीब 1,949 प्रक्रियाएँ, 27 विभागों में
• अब तक: 30 जून 2026 तक लगभग 12.7 करोड़ भर्तियाँ मंज़ूर
• दावे: 1.92 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा स्वीकृत
• ध्यान दें: सुविधा भर्ती होने पर मिलती है, ओपीडी में नहीं; और सिर्फ़ सूचीबद्ध अस्पताल में
दो व्यावहारिक बातें तय करती हैं कि कवर आपके काम आएगा या नहीं। पहली, कार्ड। पात्रता सरकारी सूची से तय होती है, पर कैशलेस भर्ती के लिए आयुष्मान कार्ड बना होना ज़रूरी है — और यह काम आराम से, पहले से, जन सेवा केंद्र या किसी सूचीबद्ध अस्पताल के आयुष्मान काउंटर पर हो जाता है। रात दो बजे इमरजेंसी के गलियारे में यह काम कराना सबसे मुश्किल होता है। दूसरी, अस्पताल। मुफ़्त इलाज सिर्फ़ सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में मिलता है, और यह सूची सार्वजनिक है। अपने ज़िले के दो-तीन सूचीबद्ध अस्पतालों के नाम पहले से जान लेना उतना ही ज़रूरी है जितना कार्ड बनवाना।
अब वह हिस्सा जो अभी बाक़ी है, और जिस पर काम चल रहा है। यह योजना अस्पताल में भर्ती होने पर काम करती है, इसलिए शुगर, बीपी या डायलिसिस जैसी बीमारियों का रोज़ का ख़र्च — दवा, जाँच, डॉक्टर की फ़ीस — अब भी काफ़ी हद तक घर पर ही पड़ता है। इसी कमी को भरने के लिए आयुष्मान आरोग्य मंदिर यानी शुरुआती स्वास्थ्य केंद्रों का जाल बढ़ाया जा रहा है, और यही योजना का दूसरा आधा हिस्सा है। दूसरी बात यह कि जिन ज़िलों में निजी अस्पताल कम हैं, वहाँ सूचीबद्ध अस्पतालों की संख्या भी कम है — यह अस्पताल की कमी है, बीमे की नहीं, और इसका हल अस्पताल बनने से ही निकलेगा। तब तक इस हफ़्ते का सबसे काम का काम यही है: घर में जिनकी उम्र 70 पार है, उनका वय वंदना कार्ड बना है या नहीं, यह आज पता कर लीजिए। यह हक़ हर बुज़ुर्ग का है, मुफ़्त है, और अक्सर बिना माँगे रह जाता है।














