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करीब आठ गुना पैसा: 36,441 करोड़ रुपये के खेलो इंडिया पैकेज से ज़मीन पर क्या बदलेगा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 1, 2026
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खेलो इंडिया योजना

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत में खेल के बजट पर बात आमतौर पर पदक तालिका छपने के बाद होती है। इस बार फ़ैसला उससे पहले हुआ। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नए स्वरूप वाली खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों को बढ़ी हुई सहायता को मंज़ूरी दी है। 2026–27 से 2030–31 तक के लिए कुल रक़म 36,441 करोड़ रुपये है — पिछली खेलो इंडिया योजना से करीब आठ गुना।

इसमें 29,054 करोड़ रुपये ख़ुद खेलो इंडिया के लिए हैं और 7,387 करोड़ रुपये पाँच साल में राष्ट्रीय खेल महासंघों की मदद के लिए। योजना में दो नई चीज़ें जोड़ी गई हैं — खेलो इंडिया फीडर स्कूल और उत्कृष्ट विद्यालय — और ‘इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट’ श्रेणी के ज़रिए मदद पाने वाले खिलाड़ियों का दायरा करीब दस गुना बढ़ाया गया है। महासंघों वाला हिस्सा कम दिखता है पर शायद ज़्यादा अहम है: इसी से कोचिंग, खेल विज्ञान, आधुनिक उपकरण, विदेशी विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और प्रशिक्षण शिविरों का ख़र्च चलता है — यानी वह ख़र्च जो तय करता है कि सोलह साल का प्रतिभाशाली खिलाड़ी बाईस साल की उम्र में भी बेहतर हो रहा है या नहीं।

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पदक पंद्रह दिन में जीते जाते हैं और दस साल में बनते हैं। पाँच साल की मंज़ूरी भारत के खेल तंत्र को मिली पहली सही नाप है।

एक नज़र में

• कुल रक़म: 36,441 करोड़ रुपये, 2026–27 से 2030–31
• बँटवारा: खेलो इंडिया 29,054 करोड़; खेल महासंघों को 7,387 करोड़
• पैमाना: पिछली योजना से करीब आठ गुना
• नई व्यवस्था: खेलो इंडिया फीडर स्कूल और उत्कृष्ट विद्यालय
• खिलाड़ियों का दायरा: ‘इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट’ से करीब दस गुना
• महासंघ सहायता में शामिल: कोचिंग, खेल विज्ञान, उपकरण, विदेशी विशेषज्ञ, शिविर, अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले
• मक़सद: स्कूल से ओलंपिक पोडियम तक एक जुड़ा हुआ रास्ता

यह पैसा जिस समस्या पर लगाया जा रहा है, वह भारतीय खेल को क़रीब से देखने वाले हर व्यक्ति को पता है। प्रतिभा ढूँढने में भारत कभी पीछे नहीं रहा — स्कूल और ज़िला स्तर की प्रतियोगिताएँ हर साल हज़ारों अच्छे खिलाड़ी सामने लाती हैं। कमी उन्हें टिकाए रखने में रही है। चयन और सीनियर मुक़ाबलों के बीच के वे साल सबसे नाज़ुक होते हैं, जब खिलाड़ी को लगातार कोचिंग, इलाज, ख़ुराक, चोट का प्रबंधन और पर्याप्त मुक़ाबले चाहिए होते हैं — और इनमें से एक भी न मिले तो करियर चुपचाप ख़त्म हो जाता है। फीडर स्कूल और आवासीय उत्कृष्ट विद्यालय इसी खाई को पाटते हैं, क्योंकि पढ़ाई और अभ्यास एक ही जगह हो जाने से वह चुनाव ख़त्म हो जाता है जिसने भारत के सबसे ज़्यादा खिलाड़ी छीने हैं — डिग्री या खेल।

नतीजा दो बातों पर टिकेगा, और दोनों पैसे की नहीं, इंतज़ाम की बातें हैं। पहली है समय पर पैसा। कोच के अनुबंध, शिविरों का कैलेंडर और उपकरणों की ख़रीद सालाना चक्र पर चलते हैं, इसलिए पाँच साल की मंज़ूरी तभी काम आएगी जब रक़म साल की शुरुआत में महासंघों तक पहुँचे, आख़िर में नहीं। दूसरी है मापने का तरीक़ा। खिलाड़ियों का दायरा दस गुना करना सही महत्वाकांक्षा है, लेकिन इससे हिसाब रखना मुश्किल भी हो जाता है। इतनी बड़ी योजना के साथ एक सार्वजनिक डैशबोर्ड होना चाहिए जो बताए कि हर साल कितने खिलाड़ी एक स्तर से अगले स्तर तक पहुँचे। यही एक आँकड़ा — भागीदारी नहीं, प्रगति — 2029 में देश को बताएगा कि 36,441 करोड़ रुपये से एक व्यवस्था बनी या सिर्फ़ एक फ़ेहरिस्त। ग्लासगो से आ रही ख़बरों को देखें तो कच्चा माल कमज़ोर नहीं है।

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