ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।किसी योजना की ताक़त सिर्फ़ इस बात से नहीं नापी जाती कि वह कितना पैसा देती है। यह भी देखना पड़ता है कि पैसा कब आएगा, यह किसान को पहले से पता है या नहीं। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) को 2026–27 से 2030–31 तक जारी रखने की मंज़ूरी दे दी है। इसके लिए 3.15 लाख करोड़ रुपये का इंतज़ाम किया गया है।
योजना के तहत ज़मीन रखने वाले पात्र किसान परिवारों को साल में 6,000 रुपये मिलते हैं, जो तीन बराबर किश्तों में सीधे उनके बैंक खाते में भेजे जाते हैं। अब तक 23 किश्तों में 4.47 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा किसानों तक पहुँच चुके हैं। सरकार का कहना है कि इस योजना की वजह से 85 फ़ीसदी किसानों ने अपना कर्ज़ घटाया है — और यही इस पूरी योजना का सबसे दिलचस्प आँकड़ा है, क्योंकि इससे पता चलता है कि पैसा खर्च होने से पहले ब्याज बचा रहा है। यह फ़ैसला ऐसे मौसम में आया है जब भरोसे की ज़रूरत थी: मौसम विभाग ने जून के बेहद सूखे रहने के बाद जुलाई में सामान्य से कम — दीर्घावधि औसत के 94 फ़ीसदी से नीचे — बारिश का अनुमान लगाया था, हालाँकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और पूर्व-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में हालात बेहतर रहने की उम्मीद थी।
तारीख़ का भरोसा: साल में 6,000 रुपये, तीन किश्तों में, अब 2030–31 तक तय — और यह ऐसे मौसम में जब बारिश असमान रही है।
छह हज़ार रुपये की असली क़ीमत यह नहीं कि उससे क्या ख़रीदा जा सकता है। असली क़ीमत यह है कि मार्च में किसान को पता होता है, अप्रैल में पैसा आ जाएगा।
एक नज़र में
• अवधि: पीएम-किसान अब 2026–27 से 2030–31 तक
• कुल रक़म: पाँच साल में 3.15 लाख करोड़ रुपये
• हर किसान परिवार को: साल में 6,000 रुपये, तीन बराबर किश्तों में
• तरीक़ा: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण — पैसा सीधे बैंक खाते में
• अब तक भुगतान: 23 किश्तों में 4.47 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा
• बताया गया असर: 85% किसानों ने कर्ज़ घटाया
• मौसम: जुलाई में बारिश दीर्घावधि औसत के 94% से नीचे रहने का अनुमान था
छोटे किसान के लिए सवाल यह नहीं होता कि 6,000 रुपये “काफ़ी” हैं या नहीं। सवाल यह होता है कि अगर यह पैसा न आए तो उसकी जगह क्या आता। ज़्यादातर मामलों में जवाब बचत नहीं, उधार होता है — और अक्सर वह उधार गाँव के साहूकार से आता है, जिसकी ब्याज दर फ़सल का बड़ा हिस्सा खा जाती है। सीज़न की शुरुआत में बीज और खाद ख़रीदने के लिए जब तय तारीख़ पर पैसा आ जाता है, तो उधार की रक़म छोटी हो जाती है। कर्ज़ घटने का जो आँकड़ा सरकार बताती है, वह ठीक इसी बात की तस्दीक़ करता है। यानी यहाँ रक़म से ज़्यादा काम ‘तय समय पर आना’ कर रहा है — और पाँच साल की मंज़ूरी ख़ुद में इस योजना का एक हिस्सा है।
आगे का रास्ता यह है कि इस मदद के साथ क्या-क्या जोड़ा जाए। नक़द मदद किसान परिवार को गिरने से बचाती है, लेकिन वह अपने आप न पैदावार बढ़ाती है, न मिट्टी सुधारती है, न लागत घटाती है — और यह उसका काम भी नहीं है। असली कमाई बढ़ाने वाले काम अलग हैं और उनमें से ज़्यादातर पर काम चल भी रहा है: सूक्ष्म सिंचाई, जो अब करीब 110 लाख हेक्टेयर में पहुँच चुकी है और जिससे पानी बचता है और पैदावार बढ़ती है; मिट्टी की जाँच; किसान उत्पादक संगठन, जिनसे छोटे किसान को मंडी में मोल-भाव की ताक़त मिलती है; और फ़सल कटने के बाद भंडारण, जिसकी कमी अच्छी फ़सल का फ़ायदा भी मिटा देती है। इन सबमें बढ़त स्थायी होती है, सालाना नहीं। इस लिहाज़ से पीएम-किसान को उस ज़मीन की तरह देखना चाहिए जिस पर खड़े होकर किसान बाक़ी चीज़ों में पैसा लगाने का जोखिम उठा सके — और जितनी बाक़ी चीज़ें उपलब्ध होंगी, यह ज़मीन उतनी ही क़ीमती होगी।














