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‘मेक इन इंडिया’ मिशन का हमसफर बनेगा कोरिया : ली जे-म्युंग

जहाज निर्माण, फाइनेंस और डिफेंस इंडस्ट्री में सहयोग का विस्तार करेंगे दोनों देश

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 7, 2026
in the blitz
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ब्लिट्ज ब्यूरो

वर्तमान और भविष्य के गंभीर मुद्दों पर क्या है कोरिया और भारत का साझा विजन? होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) पूरी दुनिया को तेल संकट और महंगाई की आग में झुलसा रहा है। पश्चिम एशिया, अमेरिका, चीन से जुड़े अनेक मसले सभी को विचलित, आशंकित कर रहे हैं।
इन सबको लेकर कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने मीडिया के साथ लंबी बातचीत की। भारत को लेकर उनका कहना है कि ‘मेक इन इंडिया, टूगेदर विद कोरिया’ के सपने को दोनों देश मिलकर साकार करेंगे।

करीब 8 साल बाद किसी कोरियाई राष्ट्रपति के इस दौरे में द्विपक्षीय संबंधों को पारंपरिक फ्रेमवर्क से आगे बढ़ने की दिशा मिली, एआई, रक्षा, व्यापार से लेकर सिनेमा और संस्कृति तक साझेदारी के अहम आधार तैयार हुए। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने चर्चा की शुरुआत भारत से की। उनका कहना था कि भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी, चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की सशक्त आवाज वाला देश है। भारत दक्षिण कोरिया के लिए आदर्श साझेदार है। हमारी साझेदारी सिर्फ एक दूसरे की पूरक इकोनॉमी ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के साझा मूल्यों पर भी टिकी है। जियो पॉलिटिकल अस्थिरता और बहुपक्षवाद के खिलाफ बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर ये और जरूरी हो जाता है कि भारत और कोरिया साथ ग्लोबल लीडर्स की तरह काम करें।

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कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने कहा कि इस विशेष रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में हम सहयोग, इनोवेशन और आपसी विकास की कड़ियों को गहरा करेंगे। व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) को अपग्रेड करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाना अहम प्राथमिकता है। कोरियाई राष्ट्रपति ने कहा, हम इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोबाइल जैसे पारंपरिक क्षेत्रों से परे जहाज निर्माण, फाइनेंस और डिफेंस इंडस्ट्री में सहयोग का विस्तार करेंगे जिससे कि ‘मेक इन इंडिया,टूगेदर विद कोरिया’ के सपने को जीवंत रूप दिया जा सके। दोनों देश एआई और डिजिटल टेक्नोलॉजी में भी सहयोग कायम करेंगे। कोरिया का विश्वस्तरीय एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और भारत का विस्तृत एआई टैलेंट इस सेक्टर में सहज साझेदार हैं। साझा तालमेल को आगे बढ़ाने के लिए नए प्रोजेक्ट्स तलाशे जाएंगे।

उन्होंने कहा, इसके साथ ही हम सांस्कृतिक और जन संबंधों के आदान प्रदान को बढ़ाएंगे। इस दिशा में बॉलीवुड और कोरिया के कल्चर मिलकर, गहरे सहयोग को गति दे सकते हैं। बीते जून कनाडा में पीएम मोदी के साथ हुई मुलाकात के बाद से मुझे चिरपरिचितता का अहसास हुआ, ऐसा लगा जैसे कि एक पुराने दोस्त से फिर से संपर्क हुआ हो। मैं साझी मानव केंद्रित राजनीति को लेकर प्रतिबद्धता में गहरा विश्वास रखता हूं। ऐसे में भारत आना और पीएम मोदी के साथ फिर से मुलाकात खुशी का विषय है। भरोसा है कि दोनों देशों की दोस्ती और विश्वास के और गहरा होने में ये यात्रा मील का पत्थर साबित होगी।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उनका कहना था कि दोनों देशों की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है,जिसमें क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस शामिल है। ऐसे में अहम समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना दोनों देशों के लिए जरूरी है। इसे लेकर कोरिया भारत के साथ नजदीकी संपर्क में रहेगा, जिससे कि सभी जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकें। इसके साथ ही इससे संबंधित अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हम अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते रहेंगे। एनर्जी सप्लाई में विविधता होनी जरूरी है। निश्चित वैश्विक परिस्थितियों में भारत और कोरिया का रणनीतिक सहयोग हमारे अपने साझा राष्ट्रीय हितों को लेकर अहम भूमिका निभा सकता है।

  • द्विपक्षीय संबंधों को पारंपरिक फ्रेमवर्क से आगे बढ़ाने की कवायद
  • भारत आना व पीएम मोदी के साथ फिर से मुलाकात खुशी का विषय
  • राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने गंभीर मुद्दों पर मीडिया से की लंबी बातचीत
  • दक्षिण कोरिया की भारत के साथ कई मोर्चों पर है साझा रणनीति
  • भारत में कोरियाई भाषा और संस्कृति को लेकर तेजी से बढ़ी रुचि

दोनों देश रक्षा साझेदारी को आगे कैसे बढ़ाएंगे ? इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि कोरिया आत्मनिर्भर भारत अभियान का पूरा समर्थन करता है। हालांकि आत्मनिर्भता सिर्फ अपने बल पर हासिल करना मुश्किल है। खुद कोरिया का तेज औद्योगिक विकास भी उसके साझेदारों की ओर से मदद के जरिए मुमकिन हो पाया। कोरिया भारत आत्मनिर्भर भारत अभियान को आगे बढ़ाने में अहम साझेदार बनना चाहता है। उदाहरण के तौर पर वज्र परियोजना हमारे रक्षा सहयोग का बेहतरीन उदाहरण है। बीते साल अप्रैल में सामने आए वज्र के दूसरे चरण के करार के मुताबिक 60% से ज्यादा उत्पादन भारत में होना है। फिलहाल ये प्रोजेक्ट निर्धारित योजना के मुताबिक सुचारू रूप से चल रहा है। कोरिया भारत के डिफेंस उपकरणों की स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशन में पूरी मदद करता रहेगा। इसके साथ हम साझा तकनीकी विकास, सहनिर्माण और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाएंगे ताकि दोनों देशों के रक्षा उद्योग आगे बढ़ सकें।

कोरियाई राष्ट्रपति ने कहा कि मौजूदा वक्त में किसी भी देश की शक्ति एआई और सेमीकंडक्टर पर टिकी है। ऐसे में अगर कोरिया की विश्वस्तरीय मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को भारत के सॉफ्टवेयर और प्रतिभाशाली टैलेंट पूल के साथ जोड़ा जाए, तो दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को फायदा होगा। महात्मा गांधी ने मानवता के बिना विज्ञान को सात सामाजिक पापों में से एक बताया था। उनके ये विचार मानवता बिना एआई की अवधारणा पर भी लागू किए जा सकते हैं। इस दौरे में एक द्विपक्षीय औद्योगिक सहयोग समिति बनाई जाएगी। ये पहल कोरिया के व्यापार, इंडस्ट्री और संसाधन मंत्रालय और भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के बीच होगी। इसके अलावा, डिजिटल क्षेत्र में नीति आदान-प्रदान और साझा रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए कोरिया के विज्ञान और आईसीटी मंत्रालय और भारत के आईटी मंत्रालय के बीच एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। हालांकि अभी भी कई काम हैं। जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं और नियमों को सरल करना जरूरी है जिससे व्यापार के लिए माहौल को और बेहतर किया जा सके। इस तरह के सुधार दोनों देशों को वैश्विक निवेशकों का भरोसा हासिल करने में मदद करेंगे ।

भारत-कोरिया संबंधों पर विस्तार से बातचीत करते हुए दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने कहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन बदलाव से गुजर रही है। ऐसे दौर में किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता करना अब अस्तित्व का सवाल बन सकता है। दोनों देशों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा मसला कहीं अधिक महत्व की अपेक्षा करता है। अहम खनिजों की सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित करना और इन संसाधनों के लिए समुद्री लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को स्थिर बनाए रखना अहम होगा। भारत के पास क्रिटिकल मिनरल्स हैं। जबकि कोरिया के पास उनसे रिचार्जेबल बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और दूसरे उन्नत उत्पाद बनाने की काबिलियत है। कच्चे माल के आयात के पारंपरिक मॉडल से आगे बढ़कर, कोरिया की तकनीक को भारत की खनन और शोधन उद्योगों के साथ जोड़कर तालमेल करना होगा, जिससे क्रिटिकल सप्लाई चेन कायम करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही शिपिंग और जहाज निर्माण सेक्टर में द्विपक्षीय सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। अगर भारत इस क्षेत्र में ग्लोबल लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर उभरना चाहता है, तो उसे जहाज़ निर्माण और मैरिटाइम परिवहन क्षमताओं को सुनिश्चित करना होगा। कोरिया के पास शिपबिल्डिंग और विदेशी विदेशी बंदरगाह परियोजनाओं में क्षमताएं और अनुभव दोनों हैं, जो इस सेक्टर में हमें भारत का सहज साझेदार बनाती हैं। इस दौरे में इस से जुड़े करार पर सहमति की संभावना है। मुझे उस दिन का इंतजार है, जब साझे तरीके से बने जहाज विश्व के महासागरों में एक साथ दिखेंगे।

एक अन्य गंभीर मुद्दे पर उनका कहना था कि हम एक गहन उथल-पुथल के दौर में हैं। मध्य पूर्व में जारी युद्ध ने इस सच्चाई को सामने रखा है कि हिंद और प्रशांत महासागर मिलकर परस्पर जुड़ा हुआ समुद्री क्षेत्र है, जिसकी स्थिरता की जिम्मेदारी कोई अकेला देश नहीं ले सकता। लंबे वक्त तक अपनी विशाल संभावनाओं के बावजूद इंडो पैसिफिक, अंतर्राष्ट्रीय ऑर्डर को आकार देने के बजाय उसका लाभ हासिल करने वाला क्षेत्र बना रहा है, इसके पीछे भू-राजनीतिक तनाव और संस्थागत कमी बड़ी बाधाएं थी। आज, हालांकि, कोरिया समेत दूसरे क्षेत्रीय देशों के पास बहुपक्षवाद को मजबूत करने और रूल बेस्ड ऑर्डर को आगे बढ़ाने की क्षमता है। इस अहम मोड़ पर, कोरिया क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर एक पुल की भूमिका निभाएगा। हम एक मजबूत क्षेत्रीय व्यवस्था को गति देंगे। कोरियाई सरकार भारत समेत क्षेत्रीय भागीदारों के साथ सहयोग करती रहेगी।

हमने इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय बेड़े की समीक्षा ( इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू) और भारत की ओर से आयोजित बहुपक्षीय अभ्यास ‘मिलन’ में हिस्सा लिया था। हम भारत की अगुवाई वाली इंडो-पैसिफिक महासागर पहल में शामिल होने का इरादा रखते हैं। एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक को साकार करने के लिए शांति और समृद्धि जरूरी है। इसके लिए, हम जहाज निर्माण, वित्त, एआई और रक्षा उद्योग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भारत समेत दूसरे भागीदारों के साथ सहयोग को गहरा करेंगे। कोरिया जी20, एपेक और आसियान-कोरिया जैसे मौजूद मैकेनिज्म का भी पूरा उपयोग करेगा। क्लाइमेट चेंज और और अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसे साझा चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करते रहेंगे, साथ ही प्रशांत द्वीप देशों के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करेंगे। कोरिया क्षेत्रीय तनाव को कम करने और द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग दोनों को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है।

अमेरिकी टैरिफ नीति पर उन्होंने कहा कि इसने भारत और दक्षिण कोरिया, दोनों ही पर असर डाला है।

कोरिया और यूएस पिछले वर्ष व्यापार समझौते पर पहुंच पाए क्योंकि दोनों पक्षों ने व्यावहारिक समाधान अपनाए। कोरिया का विनिर्माण क्षेत्र अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग में फिर से जान डालने के लिए अहम योगदान दे सकता है, इसी समझ से दोनों देशों को टैरिफ मुद्दों का हल निकालने में मदद मिली। भारत के पास न केवल एक बड़ा बाजार बल्कि जियो पॉलिटिकल लाभ भी है।ऐसे में केवल बाजार खोलने के फायदे और नुकसान का आकलन करने के बजाय एक ज्यादा प्रभावी रणनीति यह होगी कि वैश्विक व्यापार में भारत अपनी अहम भूमिका को रणनीतिक रूप से सामने रखे।

इसमें शक नहीं कि गंभीर चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, बहुपक्षीय व्यापार सिस्टम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक केंद्रीय स्तंभ रहा है। ऐसे में बदलती दुनिया के मुताबिक नए नियम कायम कर इसकी समावेशिता को सुरक्षित करने की कोशिश करनी होगी। भारत और कोरिया इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। कोरिया उन देशों में है, जिसने बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के तहत आर्थिक विकास हासिल किया है। जबकि भारत अपनी आर्थिक क्षमता के बदौलत नए नियमों को आकार देने के काबिल है। साथ मिलकर, हमारे दोनों देश बहुपक्षवाद को एक नई दिशा दे सकते हैं।

भारत में कोरियाई वेव लगातार बढ़ रही है। दोनों देश इस संदर्भ में पर्यटन, संस्कृति, सिनेमा, संगीत, शिक्षा और जन-जन के संबंधों से जुड़ी इन कड़ियों का किस तरह लाभ उठा सकते हैं, इस प्रश्न के जवाब में कोरियाई राष्ट्रपति ने कहा कि भारत और कोरिया की ओर से साझी तौर पर बनाया गया ‘मेड इन कोरिया’ नेटफ़्लिक्स इंडिया के साप्ताहिक फ़िल्म चार्ट में टॉप पर रहा। इसकी लोकप्रियता दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की संभावनाओं का एक बेहतरीन उदाहरण भी है। भारत दुनिया के सांस्कृतिक उद्योग के हब की तरह उभर रहा है। भारत के पास युवा आबादी, रचनात्मकता और तकनीकी क्षमताएं हैं। पिछले वर्ष, बीटीएस की एजेंसी हाइब ने मुंबई में एक सहायक कंपनी खोली, जो कोरिया के सांस्कृतिक उद्योग के लिए भारतीय बाजार के बढ़ते महत्व का सबूत है। दोनों देशों के पास सांस्कृतिक विरासत, तकनीकी विशेषज्ञता और टैलेंट मौजूद है। कोरिया के राष्ट्रीय संग्रहालय और भारत के प्रस्तावित युगे युगीन राष्ट्रीय संग्रहालय के बीच सहयोग सांस्कृतिक धरोहर को भावी पीढ़ियों के साथ साझा करने का एक नया मॉडल विकसित कर सकता है। – नवभारत टाइम्स से साभार

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