ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना के तहत देश में 50.06 लाख घरों की छत पर सोलर पैनल लग चुके हैं। पर असली बात यह आंकड़ा नहीं है। असली बात यह है कि इस योजना से पहले के पूरे दस साल में सिर्फ़ 7.94 लाख छतों पर पैनल लगे थे। यानी दो साल ने दस साल से छह गुना ज़्यादा काम कर दिया।
रफ़्तार कहां बदली, यह महीनेवार आंकड़ों से साफ़ दिखता है। अक्टूबर 2025 में रोज़ाना औसतन 5,038 पैनल लग रहे थे। जुलाई 2026 में यह संख्या करीब 16,328 रोज़ हो गई — नौ महीने में 3.2 गुना। अकेले जुलाई में 5.06 लाख घर जुड़े, जो योजना का अब तक का सबसे बड़ा महीना है। अभी हर छह दिन में एक लाख नए घर इसमें आ रहे हैं। सीधी बात यह है कि करीब 19 लाख घरों का बिजली बिल अब ज़ीरो आता है, और 12 लाख घर अपनी बची हुई बिजली बेचकर मिलकर करीब ₹421 करोड़ कमा चुके हैं।
छत अब सिर्फ़ छत नहीं: जिस दिन मीटर उल्टा घूमने लगता है, उस दिन से बचत के साथ थोड़ी कमाई भी जुड़ जाती है। 12 लाख घर यह कमाई पा चुके हैं।
सब्सिडी अगर सिर्फ़ पैनल खरीदवाए तो वह खर्च है। पर वही सब्सिडी अगर छत को एक छोटा बिजलीघर बना दे, तो बात दूसरी हो जाती है।
एक नज़र में
• कुल इंस्टॉलेशन: 50.06 लाख घर
• तुलना: योजना से पहले के दस साल में कुल 7.94 लाख
• सबसे बड़ा महीना: जुलाई 2026 — 5.06 लाख घर
• रोज़ाना रफ़्तार: अक्टूबर 2025 में 5,038, जुलाई 2026 में करीब 16,328
• अभी की चाल: हर छह दिन में एक लाख नए घर
• ज़ीरो बिल वाले घर: करीब 19 लाख
• बिजली बेचकर कमाई: करीब 12 लाख घरों ने मिलकर ₹421 करोड़
• सब्सिडी दी गई: ₹28,024 करोड़, सीधे खाते में (डीबीटी)
• योजना का कुल बजट: ₹75,021 करोड़
दरअसल इस योजना की सबसे बड़ी बात तकनीक नहीं, प्रक्रिया है। दस साल तक छत पर सोलर इसलिए नहीं चला कि लोगों को नहीं चाहिए था। वह इसलिए नहीं चला कि रास्ता लंबा था — पहले वेंडर ढूंढो, फिर सामान की जांच करवाओ, फिर बिजली कंपनी में नेट मीटरिंग का आवेदन दो, फिर निरीक्षण का इंतज़ार करो, और उसके बाद सब्सिडी की उम्मीद रखो। इनमें से हर कदम एक जगह थी जहां आदमी हार मानकर लौट जाता था। नई व्यवस्था ने इन सबको एक पोर्टल पर ला दिया और सब्सिडी सीधे आवेदन करने वाले के बैंक खाते में भेजनी शुरू की — अब तक ₹28,024 करोड़ इसी रास्ते से गए हैं। जब छह जगह छोड़ने वाली प्रक्रिया एक जगह की रह जाती है, तो लोग बढ़ते नहीं, लोग टूट पड़ते हैं।
अब आगे की चुनौती भी साफ़ है, और वह पैनल लगने के बाद शुरू होती है। सोलर सिस्टम तीस साल चलने वाली चीज़ है, और अभी इसे लगाने वाला उद्योग नया है। असली ज़रूरत अब तीन चीज़ों की है — छोटे शहरों और कस्बों में मरम्मत करने वाले ट्रेंड टेक्नीशियन, बिजली कंपनियों का ऐसा बिलिंग सिस्टम जो बेची गई यूनिट का हिसाब सही और समय पर दे, और उन घरों के लिए आसान कर्ज़ जिन्हें सब्सिडी के बाद भी बाकी रकम भारी लगती है। बड़ी बात यह है कि ये तीनों क्षमता की दिक्कतें हैं, नीति की नहीं — और क्षमता संख्या के पीछे-पीछे आती है। 50 लाख लगे हुए सिस्टम ही वह आधार हैं जिन पर सर्विस का कारोबार खड़ा होता है। और अगर आपके घर की छत खाली है तो एक बात याद रखिए: सब्सिडी आवेदन करने वाले के खाते में आती है, ठेकेदार के खाते में नहीं। आवेदन सूरत में हो या सीवान में, तरीका एक ही है।














